इंसान या फ़रिश्ता   (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

इंसान या फ़रिश्ता (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, संस्कृति
इंसान था वोह या फ़रिश्ता था कोई देखते ही सजदे में यूँ सर झुक जाये . आवाज़ थी जिसकी शहद सी मीठी जज़्बात के हर रंग में ढल जाये. सादगी,पाकीजगी,इंसानियत की मूरत क्यों ना उसे फिर फ़रिश्ता कहा जाये . यारों का तो यार था,दुश्मनों का भी यार , उसकी मीठी मुस्कान गैरों पर भी जादू कर जाये . दौलत,शोहरत का गुलाम नहीं था वोह दौलत शोहरत खुद जिसकी बांदी बन जाये. पीरों जैसा जीने का अंदाज़ था जिसका बस प्यार ही प्यार अपनी अदा से लुटाता जाए . वतन-परस्ती और सभी मजहबों की इज़्ज़त सभी इंसानों में जिसे बस  खुदा नज़र आये . संगीत का पैगम्बर कहे या कहे तानसेन/बेजुबावरा उसकी तारीफ में वल्लाह ! हर लफ्ज़ कम पड़ जाये. चाहे कितनी सदियाँ गुज़र जाएँ मगर इस जहाँ में…
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नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, शिक्षा, संस्कृति
ये चश्मे चिराग बुझे ,महफ़िल में अँधेरा हो गया, जिंदगी का तार टूट गया और तराना सो गया . अब कहाँ जाए तेरे उम्दा गीतों को चाहने वाले , गीतों का दरवेश /राजकुमार जो खामोश हो गया . जो होता था कभी महफ़िल की जान औ रौनक , वोह अब महफ़िल को सुनी कर छोड़ गया . इंसानी ज़ज्बातों को जिसकी कलम ने यूँ छुआ , के हर इंसान के दिल की आवाज़ वोह बन गया . हिंदी और उर्दू का अनूठा संगम करवाता नीरज, खुद  इश्क-ऐ- हक़ीकी से  एकाकार  हो गया. रहेगी जब तक यह दुनिया ,तेरा नाम अमर रहेगा , तेरे नगमो का रंग इस कदर हमारे जीवन में घुल गया.      
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चीन में  संस्कृत, भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म: डॉ.गुणशेखर

चीन में संस्कृत, भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म: डॉ.गुणशेखर

संस्कृति
चीन में भारतीय भाषाओं विशेष रूप से  हिंदी एवं संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों की रुचि देखते हुए मन गदगद है.यहाँ आज भी संस्कृत और चीनी में द्विभाषी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं.स्वतंत्र रूप से भी संस्कृत की पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं.नीचे कुछ पुस्तकों के विज्ञापन -चित्र उदाहरण के रूप में प्रस्तुत हैं- Sanskrit and Chinese Bilingual Bodhicaryavatara (Chinese Edition) by Huang Bao Sheng (Jan 1, 2012) o     $25.21 Hardcover o    Only 1 left in stock - order soon. o    FREE Shipping on orders over $35 o    Books: See all 17 items     A History of Sanskrit Literature by Arthur A. Macdonell (Oct 1, 2005) o     $21.18 Paperback o    Only 2 left in stock - order soon. o    More Buying Choices - Paperback o    $21.17 new (14 offers) o    $6.30 used (8 offers) o    (1) o    FREE Shipping on orders over…
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लोक संस्कृति और आधुनिकता: डॉ.अमृता सिंह

संस्कृति
लोक संस्कृति और आधुनिकता डॉ.अमृता सिंह कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर, ‘लोक’ शब्द की व्युत्पति संस्कृत के लोक (दर्शन) धातु में ‘घन’ प्रत्यय के योग से हुई है | प्राचीन काल से ही ‘लोक’ शब्द का प्रयोग होता आ रहा है | प्राचीन ग्रंथों – जैसे वेद , शतसाहस्री संहिता, उपनिषद आदि में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग ‘स्थान’ के  लिए किया गया है तो ऋग्वेद में इसका प्रयोग ‘जनसाधारण’ के लिए हुआ है |  वहीं भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, पतंजलि के महाभाष्य, पाणिनि के अष्टध्यायी में यह शब्द वेदेतर, सामान्य जन तथा शास्त्रेतर के लिए प्रयुक्त हुआ है | महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग साधारण जनता के अर्थ में किया है | इस प्रकार ‘लोक’ शब्द का अर्थ जहाँ स्थान के लिए प्रयुक्त होता है, वहां जनसाधारण का भी…
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