ऐ कान्हा  ! बता तू  कहाँ  है  ?  (कविता)

ऐ कान्हा ! बता तू कहाँ है ? (कविता)

कला जगत, कविता
                         हे कान्हा   ! बता  तू   कहाँ  है  ? ,                         तेरे लिए ये  दिल  परेशां है .                         कहाँ  -कहाँ  नहीं   तलाश  किया  तुझे ,                         मंदिर -मस्जिद या  गुरूद्वारे  में  तुझे ,                        कहाँ  है  तेरा ठिकाना ? रहता  तू जहाँ  है.....                         पर्वत  की कन्दराएँ या यमुना  के किनारे ,                        बाग़-बगीचों में  या  खडा  कदम्ब  के सहारे ,                        प्रकृति  के  किस छोर  में  तू   रवां  है  ?......                          बच्चों  में  मासूमियत  रह  कहाँ गयी  ,          …
Read More
इंसान या फ़रिश्ता   (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

इंसान या फ़रिश्ता (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, संस्कृति
इंसान था वोह या फ़रिश्ता था कोई देखते ही सजदे में यूँ सर झुक जाये . आवाज़ थी जिसकी शहद सी मीठी जज़्बात के हर रंग में ढल जाये. सादगी,पाकीजगी,इंसानियत की मूरत क्यों ना उसे फिर फ़रिश्ता कहा जाये . यारों का तो यार था,दुश्मनों का भी यार , उसकी मीठी मुस्कान गैरों पर भी जादू कर जाये . दौलत,शोहरत का गुलाम नहीं था वोह दौलत शोहरत खुद जिसकी बांदी बन जाये. पीरों जैसा जीने का अंदाज़ था जिसका बस प्यार ही प्यार अपनी अदा से लुटाता जाए . वतन-परस्ती और सभी मजहबों की इज़्ज़त सभी इंसानों में जिसे बस  खुदा नज़र आये . संगीत का पैगम्बर कहे या कहे तानसेन/बेजुबावरा उसकी तारीफ में वल्लाह ! हर लफ्ज़ कम पड़ जाये. चाहे कितनी सदियाँ गुज़र जाएँ मगर इस जहाँ में…
Read More
नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, शिक्षा, संस्कृति
ये चश्मे चिराग बुझे ,महफ़िल में अँधेरा हो गया, जिंदगी का तार टूट गया और तराना सो गया . अब कहाँ जाए तेरे उम्दा गीतों को चाहने वाले , गीतों का दरवेश /राजकुमार जो खामोश हो गया . जो होता था कभी महफ़िल की जान औ रौनक , वोह अब महफ़िल को सुनी कर छोड़ गया . इंसानी ज़ज्बातों को जिसकी कलम ने यूँ छुआ , के हर इंसान के दिल की आवाज़ वोह बन गया . हिंदी और उर्दू का अनूठा संगम करवाता नीरज, खुद  इश्क-ऐ- हक़ीकी से  एकाकार  हो गया. रहेगी जब तक यह दुनिया ,तेरा नाम अमर रहेगा , तेरे नगमो का रंग इस कदर हमारे जीवन में घुल गया.      
Read More
भारतीय फ़िल्म गीत-संगीत का अनमोल रतन :  रवींद्र जैन- डॉ. मोहसिन ख़ान

भारतीय फ़िल्म गीत-संगीत का अनमोल रतन :  रवींद्र जैन- डॉ. मोहसिन ख़ान

कला जगत
भारतीय फिल्म संगीत के मैदान में कई संगीतकार, गीतकार और गायकों ने समय के साथ पदार्पण किया और भारतीय फिल्म संगीत को अपनी अनमोल धरोहर देकर अमर हो गए। भले ही वे सशरीर इस नश्वर संसार में न हों, लेकिन उनकी उपस्थिति हर समय कहीं न कहीं निरंतर हमारे आसपास बनी रहती है। ये समस्त कलाकार कभी अपनी चमक खोते नहीं हैं, बल्कि इनकी चमक कभी न डूबने वाले, कभी न टूटने वाले सितारों के समान है, जो दिन में, रात में अपनी आभा लिए झिलमिला रहे हैं। रवींद्र जैन एक ऐसी पक्के साधक वाली शख्सियत का नाम है, जिसमें गीत, शास्त्रीय संगीत, लोकसंगीत और गायन सारी कलाएं और खूबियाँ एकसाथ मुखर हो जाती हैं और जनमानस के बीच पहुँचकर उनके प्रतिनिधि कलाकार का रूप ले लेती है। इस महान…
Read More
बादल सरकार : युगांतकारी रंगकर्मी और उनकी त्रासदी- मुकेश बर्णवाल

बादल सरकार : युगांतकारी रंगकर्मी और उनकी त्रासदी- मुकेश बर्णवाल

कला जगत
किसी भी विशेष क्षेत्र समूह की सांस्कृतिक गतिविधि अपने स्तनीय राजनीतिक, सामाजिक हलचलों से प्रभावित होती है। भारतीय समाज में मौजूद विविधतापूर्ण सांस्कृतिक धाराएँ इस बात की बेहतर ढंग से तसदीक़ करती हैं। भारतीय संस्कृति में निहित इन विविधताओं के बावजूद सत्तर-अस्सी के दशक में भारत के विभिन्न प्रदेशों ने रंगकर्म में ऐसी संभावनाओं को विकसित होते देखा जिसमें ‘भारतीयता’ की गंध‘भारतीय’ रंगमंच जैसी अवधारणों को संभव बनाने की कुव्वत थी। इस दशक ने देश की सभी दिशाओं से ऐसे अव्वल दर्जे के रंग-व्यक्तित्व दिये जिनकी उपलब्धियां उस समय के रांगमंच में धूमकेतु की तरह चमकती हैं। उत्तर से मोहन राकेश, दक्षिण से गिरीश करनाद, पश्चिम से विजय तेंदुलकर, मध्य से हबीब तनवीर; इस सूची में पूर्व से बादल सरकार को शामिल कर लेने से हम सहज ही तब के…
Read More
विकल्प का सांस्कृतिक औजार है नुक्कड़ नाटक: प्रज्ञा

विकल्प का सांस्कृतिक औजार है नुक्कड़ नाटक: प्रज्ञा

कला जगत
प्रसिद्ध केन्याई चिंतक और लेखक न्युगी वा थ्योंगो ने कहा है,‘‘अगर जनता को उसके बुनियादी जनतांत्रिक और मानवीय अधिकार हासिल नहीं होते हैं और इनके लिए अगर हम आवाज नहीं उठाते तो निश्चय ही हम अपने कत्र्तव्य का पालन करने में अक्षम हैं।’’ केन्या की जनता की सांस्कृतिक पहल का बर्बरता से दमन करती सरकार के बारे में अफ्रीका के साम्राज्यवाद विरोधी लेखक थ्योंगो के अनुसार 1977 में कामीरिथु कम्युनिटी एजुकेशन एंड कल्चरल सेंटर लिंगरू के किसानों और मजदूरों ने अपने गांव में एक बहुत बड़ा मुक्तांगन मंच बनाया और वहां हजारों लोगों की मौजूदगी में एक नाटक ‘न्गाहिका न्दींदा’ (आई विल मेरी, ह्वैन आइ वांट) का प्रदर्शन किया। लेकिन केन्याई अधिकारियों ने दखलंदाजी करके इसे फौरन रुकवा दिया। 1982 के आरंभ में इसी दल ने एक और नाटक ‘माइतू…
Read More