राजेंद्र यादव : साहित्य-सरोवर का ‘हंस’- ओमप्रकाश कश्यप

राजेंद्र यादव : साहित्य-सरोवर का ‘हंस’- ओमप्रकाश कश्यप

आलोचना
  ‘‘विडंबना यह है कि नितांत अधार्मिक साधन ही धर्म की रक्षा करते हैं, मानवता को बचाए रखने के लिए निरंकुश अमानवीयता का इस्तेमाल करना पड़ता है, नैतिकता की शुचिता बनाएरखने के लिए न जाने कितनी अनैतिकताओं का सहारा लेना पड़ता है. गांधी जी की ‘गरीबी’ कितनी महंगी पड़ती थी—इसे खुद सुशीला नैयर ने बताया है....सही है कि साध्य ही साधनों को ‘जस्टीफाई करता है, मगर साध्य स्वयं इतना ‘महान’ है कि उसके लिए हर तरह का साधन सही है, तो सवाल उठेगा कि साध्य की महानता तय करने वाले कौन हैं? रावण गलत है, राम सही या कौरव अधार्मिक हैं, पांडव धार्मिक—यह तय करने वाले राम और पांडव ही हैं न, बल्कि उनसे भी ज्यादा उनकी विजय उन्हें सही बनाती है. एक ही धर्म के दो संप्रदाय एक-दूसरे के…
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महाजनी सभ्यता: मुंशी प्रेमचंद [दस्तावेज]

महाजनी सभ्यता: मुंशी प्रेमचंद [दस्तावेज]

आलोचना
(इस लेख में मुंशी प्रेमचंद ने पूंजीवादी व्यवस्था (महाजनी सभ्यता) द्वारा अनिवार्य रूप से पैदा होने वाली व्यक्तिगत स्वार्थ, कपट, लोभ-लालच, बेरोज़गारी, वेश्यावृत्ति, भ्रष्टाचार आदि समस्याओं पर चर्चा की है. साथ ही रूसी क्रांति के बाद वहाँ  की बेहतरीन सामाजिक संरचना की एक झलक भी प्रस्तुत की है.) महाजनी सभ्यता मुज़द: ए दिल कि मसीहा नफ़से मी आयद; कि जे़ अनफ़ास खुशश बूए कसे मी आयद। ( ह्रदय तू प्रसन्न हो कि पीयूषपाणि मसीहा सशरीर तेरी ओर आ रहा है। देखता नहीं कि लोगों की साँसों से किसी की सुगन्धि आ रही है।) जागीरदारी सभ्यता में बलवान भुजाएँ और मजबूत कलेजा जीवन की आवश्यकताओें में परिगणित थे, और साम्राज्यवाद में बुद्धि और वाणी के गुण तथा मूक आज्ञापालन उसके आवश्यक साधन थे। पर उन दोनों स्थितियों में दोषों के साथ कुछ गुण भी थे। मनुष्य के अच्छे…
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समकालीन महिला काव्य-लेखन, स्त्री छवि: मिथक ऒर यथार्थ- दिविक रमेश

समकालीन महिला काव्य-लेखन, स्त्री छवि: मिथक ऒर यथार्थ- दिविक रमेश

आलोचना
  यद्यपि शीर्षक में आए  शब्द अर्थात ’स्त्री छवि’, मिथक’ ऒर ’यथार्थ’ अपने नये से नये अर्थ में विचारणीय हॆं तो भी यह मानते हुए कि अधिकतर उस अर्थ से अनजान नहीं हॆं, अपनी बात रखना चाहूंगा । प्रारम्भ में ही यदि पद्मा सचदेव के हवाले (सबद मिलावा, पृ० 212)  से कहा जाए तो यह जानना भी दिलचस्प होगा कि कविता के क्षेत्र में महिला लेखन पुरुष लेखन की अपेक्षा कम हॆ।  उनके अनुसार,"लड़की कवयित्री हो तो लोग प्रशंसा की नज़र से देखते हॆं । आज तो मॆदान में कवयित्रियां आनी चाहिए । कहानी में जितनी स्त्रियां गतिशील हॆं उतनी कविता में नहीं हॆं ।"कुछ ऎसा ही मत श्रीमती धर्मा यादव ने अपने लेख स्त्री विमर्श ऒर हिन्दी स्त्री लेखन में व्यक्त किया हॆ-"कविता में व्यक्त संवेदना की अपेक्षा स्त्री चेतना की कथा साहित्य में व्यापकता मिलती हॆ ।"(streevimarsh.bolgspot.com) । इसी लेख में उन्होंने नारी मुक्ति के संघर्ष के इतिहास…
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