सब  ठीक  है !  ( हास्य -व्यंग्य कविता)

सब ठीक है ! ( हास्य -व्यंग्य कविता)

कविता, राजनीति, व्यंग्य
                                           देश   की  नय्या  डोल  रही  है ,                                             अराजकता  सर चढ़  के बोल रही है ,                                           महंगाई  ने डाला गले में फंदा,                                           भरष्टाचार ,काला  बाजारी ,घुस खोरी ,                                            बईमानी  फल फुल रही है।                          …
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वायरल हो जाइए बनाम जूता मारो भेजे पर – कुमार मुकुल

वायरल हो जाइए बनाम जूता मारो भेजे पर – कुमार मुकुल

व्यंग्य
कुछ हो नहीं रहा आपसे या जम नहीं रहा या आप बोर हो रहे तो आप वायरल हो जाइए। इसके लिए कुछ खास नहीं करना। आप ऐसे व्‍यक्ति की पहचान कीजिए जो जवाब में जूते ना मार सके। (इस लोकतंत्र को ऐसे लोगों से भरा जा रहा है।) फिर उसे गिन कर कुछ जूते मारिए। फिर जूतों की या उसके जूता खाए चेहरे की तस्‍वीर नेट पर डालिए। और बोलिए कि यह शख्‍स सपने में मेरे महान बाप को गालियां दे रहा था। हो सके तो अपने महान बाप की तस्‍वीर शेयर कीजिए। महान बाप की तस्‍वीर ऐसी बनाइए कि लगे कि जो गालियां दी गयी हैं उसने उनको आहत किया है और अगर आपने कुछ नहीं किया तो वे आत्‍महत्‍या कर लेंगे। अगर महान बाप स्‍वर्ग में हों तो…
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‘एक बुद्ध और’ उर्फ़ ‘खरीदने जाना पमरेनियन’- डॉ. हरीश नवल

‘एक बुद्ध और’ उर्फ़ ‘खरीदने जाना पमरेनियन’- डॉ. हरीश नवल

व्यंग्य
मैं पिछले सोलह वर्षों से एक सरकारी स्कूल में हिंदी मध्यम से अर्थशास्त्र पढ़ा रहा हूँ. हर वर्ष मेरे विद्यार्थी मेरे समक्ष ‘मांग और वितरण’, ‘उत्पादन और विनिमय’ तथा ‘मंदी और लाभांश’ संबंधी अनेक प्रश्न और शंकाएँ रखते है. परंतु मैं स्वयं व्यावहारिक रूप से इन सबसे अनभिज्ञ होने की वजह से कभी भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया हूँ. छोटा सा सरकारी स्कूल है, विद्यार्थियों को तलने के तरीके यहाँ ईज़ाद होते रहते है, जिनका लाभ मैं उठाता रहा हूँ. शायद मेरा यह ज्ञान सदा अल्प रहता यदि मैं पिछले महीने अपने साले गिरीशजी के लिए उनके साथ राजधानी की सड़कों पर कुत्ता ख़रीदने नहीं डोलता. हमारे देश की राजधानी भी बहुत विचित्र  है, जो भी बाहर से आता है, यहाँ से कुछ-न-कुछ ख़रीदना ही चाहता है. भले ही…
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‘फर्जीवाड़ा स्टेशन’ पर खडा देश (व्यंग्य)-फारूक आफरीदी

‘फर्जीवाड़ा स्टेशन’ पर खडा देश (व्यंग्य)-फारूक आफरीदी

व्यंग्य
  हम सब आजकल ‘फर्जीवाड़ा स्टेशन’ पर खड़े है.चारों तरफ लूट मची है. कोई तो है जिन्हें इससे आनंद की अनुभूति हो रही है.व्यक्ति,समाज, देश नामक सभी इकाइयाँ फर्जीवाड़ा कोच में मजे से बैठी यही सब कुछ देखने को अभिशप्त हैं. कोई तो है जो इस उधेड़बुन में है कि लूट का दायरा कैसे बढे. कोई तो है जो इस जुगत में है कि कैसे माल काटा जाये. ऐसा लग रहा है मानो हम इस संसार में माल काटने के लिए ही अवतरित हुए हैं. देश का राजा मौन है और वह दूर देशों का गमन करते हुए अपनी प्रजा को लुटते हुए देख रहा है, संतगण अपने भक्तों को लूट रहे है, बैंक अपने कस्टमर को लूट रहे हैं, नेतागण अपने मतदाता को लूट रहे हैं. दुकानदार अपने ग्राहकों…
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