दास्ताँ-ऐ-दरख्त  (ग़ज़ल)

दास्ताँ-ऐ-दरख्त (ग़ज़ल)

कविता, ग़ज़ल
                        दास्ताँ-ऐ-दरख्त  (ग़ज़ल)                     कल था  इसकी शाखों  पर परिदों का शोर, आज उनका घोंसला  क्यों सुना हो  गया.   खुशियों सी हरियाली और फूलों  से  जज़्बात, फिजा का वोह रंग  क्यों खिज़ा में बदल  गया.   देता था जो  पैगाम  जहाँवालों को  अमन का , आगाज़ उल्फत का क्यों नफरत में बदल गया. निराली  थी जिसकी शान  सारे गुलिस्तान में, आज  उसी के  ज़बीं पर  क्यों  दाग रह गया. हर  आते-जाते  मुसाफिर को साया देने वाला, खुद देखो !  हाय ! क्यों अब सेहरा  में खो गया. कल हँसता था जिस  वादे-सबा से  हिल-मिल, अब उसका  भी इधर क्यों  रुख  ना रह गया  . उम्र  भर  अब   लब  पर  आह  और  अश्क , बस यही  उसके  जीने…
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कटघरे में कानून (ग़ज़ल )

कटघरे में कानून (ग़ज़ल )

कविता, ग़ज़ल
आज एक मुल्ज़िम को नहीं बल्कि , कानून को कटघरे में खड़े हुए मैने देखा . बिखरा हुआ सा वजूद, बेनूर चेहरा , शर्म से सर झुकाते हुए मैने देखा . टुटा -बिखरा फर्श पर पडा हुआ, इन्साफ का तराजू भी मैने देखा . एक बेबस ,गमगीन ,इंसानियत को , रोते-बिलखते ,सिसकते हुए मैने देखा . जो दे रही थी दुहाई खुदा और इंसान को , बेचारी को पत्थरों से सर फोड़ते मैने देखा . बिक चूका था जो कानून दौलत के आगे , उसे  ज़मीर से नज़रें चुराते हुए मैने देखा. आखिरश मौत हो गयी इन्साफ का भी, तभी !! शैतानो पर मंडराती कयामत कोभी  मैने देखा.      
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ज़ख्म -ऐ-  दिल  ….  ग़ज़ल

ज़ख्म -ऐ- दिल …. ग़ज़ल

ग़ज़ल
                     मत   पूछो  कितने  ज़ख्म   खाए  हुए   हैं ,                      हम  तो यारो  हालात   के सताए  हुए  हैं  .                      ज़बीं  पर   क्या   है   लिखा ,नहीं   जानते ,                     हम  तकदीर  को  अपनी  कहाँ  समझ पाए हैं.  ?                     जिंदगी   ने  दिए  हमें  मौके   बे शुमार  मगर   ,                    मंजिल -ऐ- आरजू  लिए  ये कहाँ   भटक  आये  हैं.?              …
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इंसान या फ़रिश्ता   (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

इंसान या फ़रिश्ता (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, संस्कृति
इंसान था वोह या फ़रिश्ता था कोई देखते ही सजदे में यूँ सर झुक जाये . आवाज़ थी जिसकी शहद सी मीठी जज़्बात के हर रंग में ढल जाये. सादगी,पाकीजगी,इंसानियत की मूरत क्यों ना उसे फिर फ़रिश्ता कहा जाये . यारों का तो यार था,दुश्मनों का भी यार , उसकी मीठी मुस्कान गैरों पर भी जादू कर जाये . दौलत,शोहरत का गुलाम नहीं था वोह दौलत शोहरत खुद जिसकी बांदी बन जाये. पीरों जैसा जीने का अंदाज़ था जिसका बस प्यार ही प्यार अपनी अदा से लुटाता जाए . वतन-परस्ती और सभी मजहबों की इज़्ज़त सभी इंसानों में जिसे बस  खुदा नज़र आये . संगीत का पैगम्बर कहे या कहे तानसेन/बेजुबावरा उसकी तारीफ में वल्लाह ! हर लफ्ज़ कम पड़ जाये. चाहे कितनी सदियाँ गुज़र जाएँ मगर इस जहाँ में…
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नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, शिक्षा, संस्कृति
ये चश्मे चिराग बुझे ,महफ़िल में अँधेरा हो गया, जिंदगी का तार टूट गया और तराना सो गया . अब कहाँ जाए तेरे उम्दा गीतों को चाहने वाले , गीतों का दरवेश /राजकुमार जो खामोश हो गया . जो होता था कभी महफ़िल की जान औ रौनक , वोह अब महफ़िल को सुनी कर छोड़ गया . इंसानी ज़ज्बातों को जिसकी कलम ने यूँ छुआ , के हर इंसान के दिल की आवाज़ वोह बन गया . हिंदी और उर्दू का अनूठा संगम करवाता नीरज, खुद  इश्क-ऐ- हक़ीकी से  एकाकार  हो गया. रहेगी जब तक यह दुनिया ,तेरा नाम अमर रहेगा , तेरे नगमो का रंग इस कदर हमारे जीवन में घुल गया.      
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ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़ज़ल
एक दूजे को बस गिराने में लोग मशगूल हैं कमाने में हसरतें भटकती कहाँ तक हैं महफिलों में कभी वीराने में रौनकें, रौनकों के जैसी हैं यार,केवल शराब खाने में वक्त जाया नहीं किया जाता और को बस कि आजमाने में शौक उसका फसल जलाने में मेरी दिलचस्पी है उगाने में जीत जाये तो जीत उसकी है हाथ मेरा मगर हराने में
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रात सँवर जाए तो अच्छा

ग़ज़ल
जुल्फ़ों में ही ये रात गुज़र जाए तो अच्छा। ये स्याह खुली ज़ुल्फ़ बिख़र जाए तो अच्छा।।   इस रात के आग़ोश में इक चाँद खिला है। ऐ चाँद ज़रा रात सँवर जाए तो अच्छा।।   मासूम निगाहों की अदा रोक रही थी। अलमस्त नज़र आज ठहर जाए तो अच्छा।।   वो जाम निग़ाहों से पिलाता है मुझे क्यों। मैं शाम बहकता हूँ असर जाए तो अच्छा।।   आगाज़ हुआ इश्क़ का दीदार हुआ है। इक शौख नज़र दिल में उतर जाए तो अच्छा।।   अन्जाम अग़र इश्क़ है नज़रों का तुम्हारी। नज़रों में ही ये इश्क़ निखर जाए तो अच्छा।।   सुधीर बमोला ऋषिकेश
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ग़ज़ल: रवींद्र श्रीवास्तव

ग़ज़ल: रवींद्र श्रीवास्तव

ग़ज़ल
होने लगा जमीर भी अब तो हलाल है लोगों की भूख का ये अलम है ,ये हाल है कीमत की बात कीजिये, मर्ज़ी बताइये अब झूठ को भी सत्य बनाता दलाल है मजहब की साजिशों में भी,शामिल है मुहब्बत अब हुस्न हो कि इश्क हो, दोनों बवाल है जो दो टके के थे नहीं, लाखों के हो गए ये कुछ नहीं, सियासतों का बस कमाल है जिसने शिकायतें किया, बर्खास्त हो गया रिश्वत लिया , था शख्स जो वह तो बहाल है तहज़ीब खो जवाब की, अब "बेजुबाँ" गई हर इक सवाल के लिए भी इक सवाल है जब तक जुदा जुदा हैं ,कोई भी डरायेगा आओ ,मिला लो हाथ,तो किसकी मजाल है?
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