हिंदी के प्रवासी साहित्य की परम्परा: स्वर्णलता ठन्ना

हिंदी के प्रवासी साहित्य की परम्परा: स्वर्णलता ठन्ना

आलेख
  साहित्य के विशाल वटवृक्ष की अनेक समृद्ध और सशक्त शाखाओं में से एक शाखा प्रवासी साहित्य की भी है। जो दिन-प्रतिदिन अपनी रचनाधर्मिता से हिंदी के साहित्य को सघन बनाने के साथ-साथ पाठक वर्ग को प्रवास की संस्कृति, संस्कार एवं उस भूभाग से जुड़े लोगों की स्थिति से अवगत कराने का कार्य कर रही है। ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ हिंदी साहित्य में जुड़ती एक नवीन विधा एवं चेतना है जो प्रवासियों के मनोविज्ञान से जुड़ी है, जो न केवल एक नई विचारधारा है बल्कि एक नई अंतर्दृष्टि भी है, जिसे अपनी जगह बनाने में पर्याप्त समय लगा है। प्रवासी साहित्य की परम्परा बहुत पुरानी नहीं है, किंतु फिर भी प्रवासी साहित्य अपनी संवेदनात्मक रचनाधर्मिता से साहित्य के क्षेत्र में गहरी जड़े जमा चुका है। भारत से दूर अन्य देशों में…
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में नामवर सिंह और रामस्वरुप चतुर्वेदी द्वारा ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का मूल्यांकन- अनामिका दास

आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में नामवर सिंह और रामस्वरुप चतुर्वेदी द्वारा ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का मूल्यांकन- अनामिका दास

आलेख
  हिंदी के साहित्य और साहित्यकार की चर्चा करना और एक मूल और तटस्थ निष्कर्ष तक पहुँचना, कई मामलों में ठीक उसी प्रकार है जैसे एक समुद्र से मोती ढूंढ कर निकालना| कई पड़ावों पर आकर हमें ऐसा लगने लगता है मानो अब हम लक्ष्य के बहुत करीब हैं मगर खंगालने पर मालूम होता है कि अभी भी कई ऐसे पहलू हैं जिन्हें पढ़ना और जिन-पर शोध करना अत्यंत ही आवश्यक है| हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ते हुए मैंने मुख्य रूप से दो आचार्यों का अध्ययन किया और उन्हें जानने अथवा समझने का प्रयास किया| वे दो आचार्य हैं - आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी दोनों ही साहित्यकार हिंदी साहित्य के प्रमुख बिंदु या यूँ कहें आधार बिंदु हैं| कई विद्वानों द्वारा इन्हें हिंदी साहित्य का स्तम्भ भी…
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आत्मकथा : हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधा- डॉ. प्रमोद पाण्डेय

आत्मकथा : हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधा- डॉ. प्रमोद पाण्डेय

आलेख
  आत्मकथा हिंदी साहित्य लेखन की गद्य विधाओं में से एक है। आत्मकथा यह व्यक्ति के द्वारा अनुभव किए गए जीवन के सत्य तथा यथार्थ का चित्रण है। आत्मकथा के केंद्र में आत्मकथाकार या किसी भी व्यक्ति विशेष के जीवन के विविध पहलुओं तथा क्रिया-कलापों का विवरण होता है। आत्मकथा का हर एक भाग मानव की जिजीविषा तथा हर एक शब्द मनुष्य के कर्म व क्रिया-कलापों से जुड़ा हुआ होता है। "न मानुषात् श्रेष्ठतर हि किंचित्" अर्थात मनुष्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। आत्मकथा के अंतर्गत आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण, आत्मविश्लेषण, आत्माभिव्यक्ति यह आत्मकथा के द्वारा की जाती है। आत्मकथा के अंतर्गत सत्यता का विशेष महत्व होता है। यदि आत्मकथा में सत्यता नहीं होगी तो वह आत्मकथा उत्कृष्ट नहीं माना जाता है। आत्मकथा के अंतर्गत व्यक्तिगत जीवन के विविध पहलुओं, जो कि आत्मकथाकार ने स्वयं भोगा…
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स्त्री विमर्श: हिन्दी साहित्य के संदर्भ में- नेहा गोस्वामी

स्त्री विमर्श: हिन्दी साहित्य के संदर्भ में- नेहा गोस्वामी

आलेख
  प्राचीन भारतीय वाङमय से लेकर आज तक स्त्री विमर्श किसी न किसी रूप में विचारणीय विषय रहा है। “आज से लगभग सवा सौ साल पहले का श्रद्धाराम फिल्लौरी का उपन्यास ‘भाग्यवती’ से लेकर आज तक स्त्री विमर्श ने आगे कदम बढ़ाया ही है, छलांग भले ही न लगायी हो।  अलग-अलग पैमानों पर ही सही, प्रगति हुई है। कैसी प्रगति? केवल सजावटी, बनावटी, दिखावटी या सचमुच की?”(विनय कुमार पाठक, 2009) यह सर्वविदित है कि साहित्य समाज का दर्पण है। किसी भी रचनाकार की रचना में अपने समय काल, उस समय के प्रचलन सिंद्धांतों का समावेश होता है। साहित्य समाज के यथार्थ का बोध कराता है। उपन्यास के माध्यम से रचनाकार अपने युग तथा विशिष्ट काल खंड को विभिन्न चरित्रों, घटनाओं आदि के सयोंजन द्वारा उनकी वास्तविक परिस्थितियों में समग्रता के साथ अभिव्यक्त करता है जिसमें वैयक्तिक अनुभव अपनी समाजिकता के साथ…
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