हिंदी ग़ज़ल परंपरा में त्रिलोचन: निशान्त मिश्रा

हिंदी ग़ज़ल परंपरा में त्रिलोचन: निशान्त मिश्रा

आलेख
हिंदी ग़ज़ल की जो सरिता ‘अमीर खुसरो’ के यहाँ से उद्भावित होती है, वह कबीर, भारतेन्दु, प्रेमघन, प्रसाद और निराला के यहाँ से प्रवाहित होती हुई ‘त्रिलोचन’ तक आती है । त्रिलोचन इस सरिता के बहाव के लिए एक मुकम्मल जमीन का निर्माण करते हैं और ‘गुलाब एवं बुलबुल’ (1956 ई.) इस प्रयत्न का सर्जनात्मक एवं व्यवस्थापक रूप है । इस संग्रह की गज़लों में वह भावभूमि है जो आगे चलकर दुष्यंत आदि गजलकारों के यहाँ पुष्पवित एवं पल्लवित होती है । एक ओर उनकी गलों में जहाँ उर्दू काव्य परंपरा के तत्व – प्रेम, वेदना, उपेक्षा, निजता, अजनबीयत, ऊब इत्यादि देखने को मिलते हैं वहीं दूसरी ओर सांप्रदायिकता विरोध, स्वार्थनिष्ठा विरोध, पर्यावरण चिंता एवं समसामयिक यथार्थ बोध जैसे तत्व भी उनकी गजलगोई में विद्यमान हैं । त्रिलोचन ने संस्कृत,…
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अरुण कमल का वैचारिक गद्य: डॉ. राकेश कुमार सिंह

अरुण कमल का वैचारिक गद्य: डॉ. राकेश कुमार सिंह

आलेख
अरुण कमल समकालीन हिंदी साहित्‍य-परिदृश्‍य पर कवि-आलोचक के रूप में सशक्‍त और लोकप्रिय पहचान रखने वाले महत्‍वपूर्ण रचनाकार हैं। हालांकि वे अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं लेकिन उनका साहित्यिक व्‍यक्तित्‍व हिंदी भाषा में निर्मित हुआ है। यह निर्मिति अकारण नहीं है बल्कि अपनी अभिव्‍यक्तिगत जातीय अस्मिता के बोध का परिणाम है। एक ऐसा रचनात्‍मक संसार जो घर-बाहर की सार्थक बेचैनी का समर्थ उदाहरण है। यह सार्थक बेचैनी जहां उनकी कविता में काव्‍यात्‍मक बोध को सघन, सूक्ष्‍म और अनूठा बनाती है, वहीं उनकी साहित्यिक-दृष्टि को ठोस एवं प्रामाणिक परिप्रेक्ष्‍य प्रदान करती है। इसे हम उनकी दो वैचारिक गद्य की पुस्‍तकों - 'कविता और समय' तथा 'गोलमेज' में देख सकते हैं। कविता और समय - यह उनके आलोचनापरक लेखों का पहला संकलन है। इसमें संकलित लेख विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं एवं विचार गोष्ठियों की उपज…
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भारतीय भाषाओं का हिंदी में अनुवाद : स्वप्न और संकट  (गुजराती के संदर्भ में)- डॉ. नयना डेलीवाला

भारतीय भाषाओं का हिंदी में अनुवाद : स्वप्न और संकट (गुजराती के संदर्भ में)- डॉ. नयना डेलीवाला

आलेख
अनुवाद रचना का पुनर्जीवन है। साहित्य और कला में जीवन के यथार्थ अनुभवों का लेखा-जोखा अभिव्यक्ति पाता है। यूं देखा जाय तो हमारा जीवन राजनीति एवं विचारधाराओं के तहत ही जिया जा रहा है। हमारे आस-पास जो गूंथा-बुना जा रहा है उस प्रभाव से हम अछूते नहीं रह पाते। कला में जो अभिव्यक्त होता है, अनुवाद के द्वारा उसी संवेदना को अन्यान्य तक संप्रेषित किया जा सकता है। भाषा  विचारों की संवाहिका है तो अनुवाद विविध भाषाओं एवं विविध संस्कृतियों से साक्षात्कार करानेवाला साधन। अनुवाद अपने भगीरथ प्रयास से दो विभिन्न एवं अपरिचित संस्कृतियों,परिवेशों एवं भाषाओं की सौंदर्य चेतना को अभिन्न और परिचित बना देता है। पॉल एंजिल का यह कथन पूर्णतया सही है कि--- “ इक्कीसवीं सदी में प्रत्येक देश में दो साहित्य उपलब्ध हो सकेंगे। पहला, उसके अपने…
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हिंदी और राजस्थानी भाषा की ध्वनि व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन: कैलाश चन्द्र

हिंदी और राजस्थानी भाषा की ध्वनि व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन: कैलाश चन्द्र

आलेख
हिंदी एवं राजस्थानी भाषा: संक्षिप्त परिचय हिंदी भारत की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है जिसका क्षेत्र उत्तरप्रदेश , मध्यप्रदेश ,दिल्ली हरियाणा ,बिहार मध्यप्रदेश ,उत्तरांचल ,झारखंड के साथ –साथ अन्य कई प्रदेश हैं | हिंदी भाषा कई बोलियों का समन्वित रूप है जिनमे ब्रज , बांगरू , खड़ी बोली ,राजस्थानी ,बिहारी , भोजपुरी के साथ और भी शामिल है | इसमे सभी बोलियाँ के भाषा तत्त्व शामिल है | इसी में राजस्थानी भाषा भी इसकी एक बोली है | इसका भाषा क्षेत्र सम्पूर्ण राजस्थान प्रदेश के साथ - साथ मध्यप्रदेश एवं तथा भारत के अन्य भागों के साथ - साथ विश्व में भी कई भागों में फैला है | यह भाषा भी कई बोलियों का समन्वित रूप है जिसमे मारवाड़ी .मेवाड़ी , हाड़ोती , जयपुरी / ढूंढाड़ी , मालवी…
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भारत के विकास के लिए भारतीय भाषाऐं जरूरी क्यों?- डा.जोगा सिंह

भारत के विकास के लिए भारतीय भाषाऐं जरूरी क्यों?- डा.जोगा सिंह

आलेख
प्रिय भारतीयो, भारतीय जीवन के बहुत ही महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अंग्रेज़ी भाषा के दखल से भारत को बहुत भारी नुकसान हो रहे हैं।  इस दखल का सबसे बङा कारण कुछ भ्रम हैं जो हमारे दिलो-दिमाग में बस गए हैं, या बसा दिए गए हैं। ये भ्रम हैं: १. अंग्रेजी ही ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और उच्चतर ज्ञान की भाषा है; २. अंग्रेजी ही अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान और कारोबार की भाषा है, और; ३. भारतीय भाषाओं में उच्चतर ज्ञान की भाषाऐं बनने का सामर्थय नहीं है। पर तथ्य बताते हैं कि ये धारणाएं भ्रम मात्र हैं और इनके लिए कोई अकादमिक या व्यवहारिक प्रमाण हासिल नहीँ हें। इस सम्बन्ध में ये तथ्य विचारणीय हैँ: १. २०१२ में विज्ञानों की सकूल स्तर की शिक्षा में पहले ५० स्थान हासिल करने वाले देशों में अंग्रेजी में…
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हिंदी तथा मराठी भाषाओं की ध्वनि व्यवस्था में अंतर: सुषमा लोखंडे

हिंदी तथा मराठी भाषाओं की ध्वनि व्यवस्था में अंतर: सुषमा लोखंडे

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भाषा मानवी व्यवहार का केंद्रीय तंतु एवं संप्रेषण का सर्वाधिक शक्तिशाली माध्यम हैं। मनुष्य चिंतन, मनन तथा अपने दैनिक व्यवहार भाषा के माध्यम से ही करता हैं । इसीलिए भाषा को समाज और संस्कृति का अभिन्न अंग माना गया हैं। बालक बिना किसी औपचारिक शिक्षा के मातृभाषा सीखता हैं। जिसे हम भाषा उपार्जन की प्रकिया कहते हैं । यह प्रकिया सहज स्वाभाविक एवं अनोपचारिक प्रकिया हैं। शिशु परिवार में सहज रूप से भाषा अर्जित करता हैं ।पर अन्य भाषा शिक्षण या भाषा अधिगम एक विशिष्ट प्रक्रिया हैं । यह परिवेश में सीखी जाने वाली विशिष्ट प्रयत्न साध्य प्रक्रिया  हैं । अन्य भाषा अध्येता के लिए मातृभाषा से अलग भाषा हैं।अध्येता अन्य भाषा के रूप में जो भाषा सीख रहा हैं । वह और उसकी मातृभाषा अगर समान स्रोत से आई…
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दलित आत्मकथाएँ और समकालीन परिदृश्य: रंजीत कुमार यादव

दलित आत्मकथाएँ और समकालीन परिदृश्य: रंजीत कुमार यादव

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दलित आत्मकथाएँ और समकालीन परिदृश्य दलित आत्मकथाओं पर जब हम बात करते हैं, तो हमारे सामने यह प्रश्न सहज ही उठ खड़ा होता है कि जब हमारे साहित्य में आत्मकथा लेखन की परंपरा मौजूद थी तब अलग से ‘दलित आत्मकथा’ लिखने की क्या जरूरत पड़ी ? यह सवाल हमारे सामने तब आता है जब हम देखते हैं कि साहित्य में जो कुछ लिखा जा रहा था वह एक विशेष जाति वर्ग के लोगों द्वारा लिखा गया साहित्य है, जिसमें एक वर्ग विशेष की बात की गई है। इन सब सवालों का जवाब मांगती दलित आत्मकथाएं हमारे सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। कहने के लिए हमारा हिंदी साहित्य ओजपूर्ण एवं समृद्ध है लेकिन एक ऐसा  तबका भी था जिसको कहीं भी साहित्य में स्थान नहीं दिया गया, उनको साहित्य के इतिहास से…
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हिन्दुस्तानी अदब के प्रचार-प्रसार में नवल किशोर प्रेस का योगदान: हिमांशु बाजपेयी

हिन्दुस्तानी अदब के प्रचार-प्रसार में नवल किशोर प्रेस का योगदान: हिमांशु बाजपेयी

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हिन्दुस्तानी अदब के प्रचार-प्रसार में नवल किशोर प्रेस का योगदान हिमांशु बाजपेयी शोध सारांश- प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य हिन्दुस्तानी अदब यानी हिन्दी-उर्दू साहित्य के प्रचार प्रसार में मुंशी नवल किशोर प्रेस की भूमिका को तलाशता है. नवल किशोर प्रेस उन्नीसवीं और बीसवीं सदीं में भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशन संस्थानों में से एक थी. 1858 में शुरू होकर ये प्रेस1950 तक लगातार काम करती रही. यूं तो इसने प्रकाशन सम्बन्धी विविध कामों को अंजाम दिया. ब्रिटिश शासन काल में स्टेशनरी और स्कूलबुक की छपाई के ठेके भी इसको मिले. प्रेस ने दुनिया की अनेक भाषाओं में प्रकाशन किया. मगर हिन्दी-उर्दू यानी हिन्दुस्तानी अदब के लिए ये प्रेस ख़ास तौर पर समर्पित थी. हिन्दी-उर्दू सम्बन्धी अपने योगदान के लिए नवल किशोर प्रेस को कालजयी ख्याति मिली. प्रस्तुत शोधपत्र इसी योगदान…
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प्रवासी संसार तथा गिरमिट वैचारिकी:  सारिका जगताप

प्रवासी संसार तथा गिरमिट वैचारिकी:  सारिका जगताप

आलेख
प्रवासी जीवन अपने भिन्‍न और विशिष्‍ट संरचना के कारण विश्‍व में प्रसिद्ध रहा है। विश्‍व के परिदृश्‍य में भारतीय डायस्‍पोरा का अपना एक विशिष्‍ट स्‍थान है। भारतवंशी लोग प्राचीन काल से अपने देश से विश्‍व के विभिन्‍न देशों में जाकर बसे हैं। इस प्रवासन के कारण और परिणाम दोनों भिन्‍न-भिन्‍न है। कारण के रूप में यायावर वृत्ति, रोजगार की खोज, जीवन को समुन्‍नत करने की जिजीविषा तो शामिल है ही। साथही, राजनैतिक और सांस्‍कृतिक कारक भी इसके कारण रहे हैं। परिणाम के रूप में यह वै‍श्विक प्रवासन हमारे सामने उपस्थित है। भारतीय लोग कभी दासों के रूप में, तो कभी अनुबंधित श्रमिकों (गिरमिटिया) कंगनी और मैस्‍त्री प्रथा के रूप में देश से बाहर ले जाए गए। भारतीय डायस्‍पोरा समुदाय अपनी विशिष्‍ट भाषा, रहन-सहन एवं संस्‍कृति के कारण विश्‍व में अपना…
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औरत: एक दृष्टि में (औरत का कोई देश नहीं-तसलीमा नसरीन)- अनुराधा

औरत: एक दृष्टि में (औरत का कोई देश नहीं-तसलीमा नसरीन)- अनुराधा

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  शोध सार पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री मात्र ‘देह’ हैं। इस समाज ने पुरुष को अधिकार सौंपा है जबकि स्त्री को दायित्व का बोझ दिया है। पुरुषों के द्वारा लिखे गए इतिहास में स्त्रियों का स्थान शून्य हैं। अधिकांश स्त्रियाँ शिक्षित होकर भी स्त्री-चेतना से हीन हैं। तसलीमा नसरीन ने विभिन्न नारी-केंद्रित लेखों द्वारा सत्ता, धर्म और लिंग-भेद की राजनीति का खुलासा करते हुए समाज में नारी की वास्तविक स्थिति को उजागर किया है। लेखिका स्वयं स्त्री होने के साथ-साथ मुस्लिम समाज में पैदा होने के कारण स्त्रियों की समस्याओं को गहराई से महसूस करती है। की वर्ड: नारी-स्वाधीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, तसलीमा नसरीन, धार्मिक कट्ठरपंथी, मानवतावाद             ‘औरत का कोई देश नहीं’ तसलीमा नसरीन द्वारा विभिन्न अखबारों में लिखे गए स्तंभों का संकलन है। इसमें तसलीमा नसरीन के…
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विदेशों में हिंदी का स्वरूप वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी की स्थिति के सन्दर्भ में-तेजस पूनिया

विदेशों में हिंदी का स्वरूप वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी की स्थिति के सन्दर्भ में-तेजस पूनिया

आलेख
  विदेशों में हिंदी के स्वरूप को समझने से पूर्व हमें हिंदी के बाजारवाद पर चर्चा करना जरूरी है और यह भी जरूरी है कि बाजार क्या है? बाजार कहते किसे हैं? और बाजारों में बोली जाने वाली भाषा का उससे क्या सम्बन्ध हो सकता है? दरअसल हमारा  समाज और बाजार एक दूसरे से जुड़े है और इनका परस्पर जुड़ना ही एक नई भाषा को जन्म देता है और फिर वह बनती है बाजार की भाषा और यह भाषा ही मनुष्‍य व्‍यवहारों के साथ हर क्षण बदलती रहती है। उसकी यह गतिशीलता ही उसकी जीवन्‍तता है। पिछले एक दशक में पूँजी के असीम विस्‍तार होने के साथ-साथ संचार साधनों के अभूतपूर्व विकास को बढावा देकर जिस तरह विश्‍व बाज़ार बनाया है और उसके माध्यम से जो आर्थिक भूमंडलीकरण की भूमिका…
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समकालीन युग बोध के कवि ‘कुँवर बेचैन’- गीता पंडित

समकालीन युग बोध के कवि ‘कुँवर बेचैन’- गीता पंडित

आलेख
एक ऐसे समय में जब चारों तरफ गहन चुप्पी हो, सन्नाटा बोलता हो, सुनने सुनाने की व्याकुलता समाप्त हो गयी हो | दो कमरों के फ्लैट में सिमटे हुए लोग आस पडौस को भी भूल चुके हों | घर परिवार से भी केवल इमेल के द्वारा या फोन पर बात होती हो तब अगर कुँवर बेचैन की लेखनी यह कहती है कि ‘आप बस इतना ध्यान रखिएगा अपने मुँह में ज़ुबान रखियेगा..!’ तब वह महत्वपूर्ण हो जाती है और बरबस अपनी ओर केवल ध्यान आकर्षित ही नहीं करती बल्कि गंभीरता से हमारे जहन में बैठकर इस समय को बांचने के लिए उकसाती भी है | यह एक ऐसा समय है जिसकी बात करते हुए हाथ काँपने लगते हैं | ज़ुबान लडखडाने लगती है और देह समन्दर बन जाती है |…
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