कथाकार भगवानदास मोरवाल से डॉ. एम. फीरोज अहमद की बातचीत

कथाकार भगवानदास मोरवाल से डॉ. एम. फीरोज अहमद की बातचीत

साक्षात्कार
1- आप अपने जन्म स्थान घर परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में विस्तार से बताइए...? - मेरा जन्म हरियाणा के काला पानी कहे जाने वाले मेवात क्षेत्र के छोटे-से क़स्बा नगीना के एक अति पिछड़े मज़दूर और इस धरती के आदि कलाकार कुम्हार जाति के बेहद निम्न परिवार में हुआ। अपने मेरे घर-परिवार और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा है। अभी हाल में मैं अपने क़स्बे में गया हुआ था, तो संयोग से कुम्हार जाति की वंशावली का लेखा-जोखा रखने वाले हमारे जागा अर्थात जग्गा आ पहुँचे। मैंने जब इनसे अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा, तब इन्होंने कुछ ऐसी जानकारी दी जो मेरे लिए लगभग अविश्वसनीय थीं। जैसे इन्होंने बताया की हमारे मोरवाल गोत्र के पूर्वज उत्तर प्रदेश के काशी के मूल निवासी थे। काशी से…
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श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी से डॉ. वंदना कुमार एवं राजेन्द्र कुमार की बातचीत

श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी से डॉ. वंदना कुमार एवं राजेन्द्र कुमार की बातचीत

साक्षात्कार
‘‘आवारा लड़की को पता ही नहीं था कि आवारा कैसे हुआ जाता है?”- मैत्रेयी पुष्पा शोध-विषय “समकालीन हिंदी लेखिकाओं की प्रतिनिधि आत्मकथाओं में अन्तर्निहित अनुभूतियाँ” के अन्र्तगत अनुशीलन हेतु चयनित आत्मकथा खण्ड-1 ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ तथा खण्ड-2 ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ की रचनाकार हिंदी साहित्य जगत् में नारी-चेतना की सशक्त वाहिका श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी से डॉ. वंदना कुमार एवं राजेन्द्र कुमार की पुरखौती मुक्तांगन, नया रायपुर (छ.ग.) में आयोजित रायपुर साहित्य महोत्सव 2014 में हुई बातचीत के प्रमुख अंश   1. डॉ. वंदना कुमार- आपकी आत्मकथा खण्ड-1 ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ तथा खण्ड-2 ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ के शीर्षक चयन (नामकरण) के क्या कारण रहें हैं, किनसे प्रभावित होकर यह शीर्षक चयन आपने किया; इन शीर्षकों का पाठक द्वारा क्या अर्थ निकाला जावे। शीर्षक से आपका क्या अभिप्राय है ? श्रीमती मैत्रेयी…
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डॉ. सुशीला टाकभौरे जी से राजेन्द्र कुमार की बातचीत

डॉ. सुशीला टाकभौरे जी से राजेन्द्र कुमार की बातचीत

साक्षात्कार
नारी कहीं भी, कभी भी कमजोर नहीं - डॉ. सुशीला टाकभौरे डॉ. वंदना कुमार, शोध-निर्देंशक एवं सहायक प्राध्यापक (हिंदी), शासकीय नागार्जुन स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) के मार्गदर्शन में राजेन्द्र कुमार, शोधार्थी (हिंदी) पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छत्तीसगढ़) द्वारा शोध-विषय “समकालीन हिंदी लेखिकाओं की प्रतिनिधि आत्मकथाओं में अन्तर्निहित अनुभूतियाँ” के अन्र्तगत अनुशीलन हेतु चयनित आत्मकथा ‘शिकंजे का दर्द‘ के रचनाकार समतावादी दलित साहित्यकार के रूप में विख़्यात, नर्मदा-अंचल की बेटी डॉ. सुशीला टाकभौरे जी से बातचीत के प्रमुख अंश 1. राजेन्द्र कुमार- कौसल्या बैसंत्री जी की आत्मकथा तथा आपकी आत्मकथा तीन पीढ़ियों की महिलाओं के जीवन-संघर्ष की कहानी है तथा आप दोनों ने ही तिहरा दंश (गरीबी, जातिवाद, महिला) भोगे हैं। आपकी आत्मकथा, कौसल्या बैसंत्री जी की आत्मकथा से किस प्रकार भिन्न है? डॉ. सुशीला टाकभौरे- कौसल्या बैसंत्री जी…
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वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश जी से लोकमित्र की बातचीत

वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश जी से लोकमित्र की बातचीत

साक्षात्कार
संवाद/साइबर समाज शास्त्र असंतुष्ट समाज की भावनात्मक शरणस्थली है फेसबुक- सूरज प्रकाश सरल, आत्मीय, भावुक, मिलनसार और गर्मजोशी से भरे। यूँ कहिये कि हम जितने अच्छे गुण किसी आदर्श लेखक में तलाशने की फ़िराक में रहते हैं, वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश सर में वो सब जरूरत से ज्यादा ही और छलकते हुए हैं। उनसे मिलने पर उनकी सरलता और सहजता हमें बरबस अपनत्व से भरे पुराने लेखकों की याद दिलाती है। वे हैं भी वरिष्ठ लेखक लेकिन उनकी रचना भूमि न केवल नई बल्कि एक तरह से भविष्य की सर जमीं है। जी, हाँ हाल के पिछले ढाई तीन बरसों में उन्होंने ज्यादातर कहानियां साइबर जगत की पृष्ठभूमि पर लिखी हैं, जो न केवल पाठकों के द्वारा हाथों हाथ ली गयी हैं बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों ने भी उनसे…
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डॉ. श्‍याम सुंदर दुबे जी से जयप्रकाश मानस जी की बातचीत

डॉ. श्‍याम सुंदर दुबे जी से जयप्रकाश मानस जी की बातचीत

साक्षात्कार
ललित निबंध पठकीय एवं समीक्षकीय तैयारी की माँग करता है - डॉ. श्यामसुंदर दुबे सर्जनात्‍मक एवं आलोचनात्‍मक लेखन के क्षेत्र में कार्यरत लोक-मानस के मर्मज्ञ लेखक डॉ. श्‍याम सुंदर दुबे एक महत्‍वपूर्ण हस्‍ताक्षर के तौर पर मौजूदगी दर्ज कराते हैं। डॉ. श्‍याम सुंदर दुबे का जन्म 12 दिसम्बर, 1944 को हुआ। व हिंदी के प्रमुख ललितकारों में एक हैं । कविता, कथा, उपन्‍यास, नवगीत, समीक्षा, आलोचना इनके अध्‍ययन एवं रचनाकर्म की प्रमुख विधाएँ हैं। डॉ. दुबे के लेखन में लोक-परंपरा अपनी सामाजिक और सांस्‍कृतिक छवियों की अंतरंगता के साथ जुड़ी है। इनके ललित निबंधों और कविताओं में लोक का खिलखिलाती हुई दुनिया दिखती है । सभी प्रमुख विधाओं में अब तक डॉ. दुबे की 30 से अधिक पुस्‍तकें प्रकाशित हैं। आपके सर्जनात्‍मक कार्य पर अनेक शोध कार्य भी संपन्‍न हो चुके…
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लन्दन के बहुचर्चित प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा जी से डॉ.सुमन सिंह की बातचीत

लन्दन के बहुचर्चित प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा जी से डॉ.सुमन सिंह की बातचीत

साक्षात्कार
  हम प्रवासी लेखक होने के फायदे भी चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि हमें प्रवासी लेखक न कहा जाय प्रवासी साहित्य जगत का चर्चित, प्रतिष्ठित और बहुपठित नाम है 'तेजेन्द्र शर्मा '। लन्दन में रहकर विगत कई वर्षों से साहित्य-सेवा के साथ-साथ कथा -यूके की स्थापना करके हिन्दी-उर्दू और पंजाबी साहित्य के प्रचार -प्रसार में तेजेन्द्र जुटे हैं। शांति जैसे टी. वी सीरियल के लेखन में भी आपका  योगदान रहा है। लेखन के साथ ही साथ अभिनय, बीबीसी में समाचार वाचन आदि अनेक गतिविधियों से जुड़े रहने वाले, अपराजेय जीवनी शक्ति से ओत-प्रोत, अल्हड़-अलमस्त व्यक्तित्व के स्वामी, तेजेन्द्र शर्मा के व्यक्तित्व-कृतित्व के अन्य अनदेखे पहलुओं को उजागर करने की छोटी सी कोशिश है, डॉ.सुमन सिंह से उनकी यह बातचीत---।   आपके व्यक्तित्व को गढ़ने में आपकी पारिवारिक…
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प्रसिद्ध  साहित्यकार व आलोचक डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय जी से  डॉ. प्रमोद पाण्डेय की बातचीत

प्रसिद्ध साहित्यकार व आलोचक डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय जी से डॉ. प्रमोद पाण्डेय की बातचीत

साक्षात्कार
 “काल के अनंत प्रवाह में कभी-कभी ऐसा अद्भुत क्षण आता है जब काल स्वयं मनुष्य को अपना इतिहास बनाने तथा अपनी नियति का नियंता बनने का अवसर प्रदान करता है।” - डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में हिंदी प्राध्यापक के रूप में कार्यरत प्रसिद्ध साहित्यकार, आलोचक एवं मार्गदर्शक गुरुवर डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय जी के जीवन, व्यक्तित्व तथा साहित्यिक जगत से संबंधित हाल ही में डॉ. प्रमोद पाण्डेय द्वारा की गई बातचीत के कुछ अंश :- १- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आपका जन्म कब और कहाँ हुआ? डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय: मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में 'घोरका तालुकादारी' नामक गाँव में 15 अप्रैल सन् 1968 को हुआ था। मेरा गाँव सई नदी के तट पर स्थित है। प्राकृतिक दृष्टि से बहुत ही रमणीय जगह है।   २- डॉ. प्रमोद पाण्डेय: आप…
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कवि-आलोचक  प्रो. ए. अरविंदाक्षन जी से  डॉ. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत की बातचीत

कवि-आलोचक प्रो. ए. अरविंदाक्षन जी से डॉ. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत की बातचीत

साक्षात्कार
“कविता की संवेदना हमारी  संस्कृति को द्योतित करती है।”     हेब्बारः आज की कविता के विमर्श के संदर्भ में, विशेषकर हिंदी कविता के संदर्भ में समकालीनता की अवधारणा, स्थान, काल के साथ समकालीनता की संपृक्ति पर अस्पष्टता नज़र आती है। आप इस संज्ञा को किस नजरिए से देखते हैं? प्रो. अरविंदाक्षन: सत्तर के दशक के आखिर में हिंदी कविता का तेवर बदलता दिखाई देता है। राजनीतिक क्षेत्र की निरंकुशताओं ने, वैश्विक स्तर पर चल रहे नव उपनिवेशवादी संक्रमण ने प्रौद्योगिक क्षेत्र की तेज़ रफ़्तार ने, पूंजी केंद्रित उदार आर्थिक नीतियों ने सामान्य जीवन को तिमिराच्छादित कर दिया था। इस अंधेरे के विरुद्ध हमें प्रतिक्रियान्वित होना ही था। कविता ने ही नहीं, साहित्य एवं कला के समस्त माध्यमों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। यह बहिरंग प्रतिक्रिया नहीं थी। कविता ने…
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