” उड़न खटोला “

” उड़न खटोला “

कविता
जा रहा था पढ़नें शाला । कंधे पर लटकाकर झोला ।। ठिठक गया था अजी देखकर । नील गगन में उड़न खटोला ।। रंग-विरंगे रंगों से जी । सजा हुआ था उड़न खटोला ।। तेज गति से सर-सर, सर-सर । उड़ रहा था उड़न खटोला ।। सचमुच देखा था मैं उस दिन । सपनें में एक उड़न खटोला ।। प्रमोद सोनवानी "पुष्प" तमनार/पड़िगाँव-रायगढ़ ( छ . ग . ) 496107
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नव भारत का निर्माण: सोनू सहगम

नव भारत का निर्माण: सोनू सहगम

कविता
नव भारत का निर्माण आओ नव भारत का निर्माण करें मन की बात जन-गण से करें आओ नव भारत का निर्माण करें सबका अपना-अपना जिसमें हक़ होगा न हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई,एक राष्ट्र वो होगा आओ सब मिलकर ये शुरुआत करें आओ नव भारत का निर्माण करें आशा हो, विश्वास हो जिसमें जन-जन की बात हो जिसमें आओ सब मिलकर वो स्वर बने आओ नव भारत का निर्माण करें लहराये खुशियाँ, खेत-खलयानों में चिराग जले,अंधेर-खंडहर-वीरानों में आओ सब मिलकर वो लौ तैयार करें आओ नव भारत का निर्माण करें रोजगार भी जहां सबको मिलेगा  देश का हर उज्जवल भविष्य पढ़ेगा आओ सब मिलकर वो पथ तैयार करें आओ नव भारत का निर्माण करें बेटा-बेटी मे कोई फर्क न होगा दोनों का एक सम अधिकार होगा आओ सब मिलकर ये प्रण करें आओ नव…
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पतितता

पतितता

कविता
सौम्य-शिखर प्रकाश का नित-नित दुर्गम्य होय, चहुपाटी चहु दिशाओ में नैतिकता बैठकर रोय, पतन होय स्व-मूल्यों का मूल्य अपर चुकाए , क्षणिक विरल संतुष्टि को कोई निरा पतित हो जाय, गरिमा लक्ष्मण रेखा की धूमिल, क्षीण हुई- हे राम! हत्या, चोरी, बलात्कार दानव बन गया नीतिनिधान।।
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” ऋतुराज का मौसम “

” ऋतुराज का मौसम “

कविता
ऋतु राज का आया मौसम ।। उड़-उड़कर तितली रानी , झूम रही डाली - डाली । बन गई है धरती दुल्हन , अमराई में चलो चलें हम ।।1।। खूब सजे हैं वन-उपवन , महक रहे हैं फूलों के गंध । कोयल रानी कू-कू करके , मिटा रही है सबका गम ।।2।। लदे बौर से बगिया सारी , इसीलिए है लगती प्यारी । इतरायी बुल-बुल रानी , नाच रही वह छम-छमा-छम ।।3।। डॉ.प्रमोद सोनवानी "पुष्प" "श्री फूलेंद्र साहित्य निकेतन" तमनार/पड़िगाँव-रायगढ़ (छ.ग.)भारत, 496107
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” सुना रही है हमें कहानी “

” सुना रही है हमें कहानी “

कविता
फुदक-फुदक कर गीत सुनाती , कोयल जब बगिया में आती । हरी-भरी बगिया को वह तो , अपनें गीतों से महकाती ।।1।। श्यामा-बुलबुल, तितली-भौंरे , नित दिन बगिया में आ जाते । कोयल के संग बड़े मजे से , मिल-जुल अपना रंग जमाते ।।2।। और झिंगुर की सुन शहनाई , नाच रही है मैना रानी । प्रेम-भाव से रहना सीखो , सुना रही है हमें कहानी ।।3।। ✍डॉ.प्रमोद सोनवानी पुष्प श्री फूलेंद्र साहित्य निकेतन तमनार/पड़िगाँव-रायगढ़(छ.ग.)
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शांत

शांत

कविता
 १ -अगर  तुम्हे बहुत दुःख हो तब         जाओ यहाँ से दूर         बसंत में शहर छोड़ गाँव  की         तरफ निकल जाओ        वहां सरसो  के  पीले  भरे  खेतों  में        जाकर बीचो -बीच खड़े हो        और पुरवैया की हल्के -२        झोंकों  को  महसूस  करो        एक पल शरीर को ढीला छोड़ दो        एक  लम्बी सांस लो        एक बार उन फूलों से        अपने दुःख बयां करो        और फिर तेज़ से        अपने प्रिय को बुलाओ        तुम्हे एक अलग शांति महसूस होगी , २ - अगर नहीं हुई  तो  फिर       अपने आँखों को  ढीला छोड़ दो   …
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” बिटिया ”

” बिटिया ”

कविता
                             '' बिटिया ''                                  मैं  जन्मी माँ के आँगन में खुशियों का पैगाम लिए सुन्दर नन्हें हाथों में थामे बाबू जी के अरमान लिए मैं जन्मी माँ के आँगन में।।१।।             जन्म हुआ मेरा मैं  खुश थी  मन में इक  विश्वास लिए प्यार मिलेगा माँ - बाबू का बड़े भाई का स्नेह लिए मैं  जन्मी  माँ के आँगन में।। २।।            बचपन  में माँ का प्रेम मिला  बाबू जी खातिर तरस गई लेकिन भैया का प्रेम मिला तो अखियाँ जैसे बरस गई मैं  जन्मी माँ के आँगन में।।३।।           नन्हें…
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कविता

कविता

कविता
कागज़ के टुकड़ों से प्यार हो गया छंद ,काव्य सृजन अपार हो गया संभाल कर रखता हूँ इन्हें सर्वदा क्योंकि ये ही मेरा संसार हो गया सुख दुख की बातें लिखता रहा राष्ट्र जागरण का विचार हो गया दिल की धकधक हो या नई बात लिखा श्रृंगार तो   असर हो गया कवि राजेश पुरोहित
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