जिस्म

जिस्म

कविता
सुनो ओ  पुरुष !                                                                                                                                                                         तुम्हें  मैं दिखाई देती हूँ  बस एक औरत . तुम्हें मात्र मुझे समझते हो एक जिस्म . मगर  इस जिस्म में एक रूह भी है , एक  जज्बातों से भरा दिल है, एक विचारशील  दिमाग है, मैं एक मात्र जिस्म नहीं , मुझमें है एक पूरा वजूद . मैं  एक इंसान हूँ, तुम्हारी तरह, बल्कि यूँ कहो ,तुमसे बढ़कर. मैं तुमसे किसी मायनो में कम नहीं हूँ. किसी बात में कम नहीं हूँ. शिक्षा -दीक्षा, कला-कौशल , खेल- राजनीति ,वाणिज्य आदि . तुम सब जानते हो. मगर मुझे पहचानते नहीं . तुम मुझे  घूरते हो बेशक , मगर देखते नहीं. शायद तुम देखना चाहते भी नहीं. क्योंकि यदि तुमने मुझे देखा , तो खुद को बहुत छोटा पायोगे. तुम नहीं समझना चाहते मुझे  इंसान .…
Read More
मैं … ( एक गृहणी की डायरी )

मैं … ( एक गृहणी की डायरी )

कविता
मैं  हूँ  नारी , भावनाओं से भरी , आँचल  में ममता और , आँखों में भरे आंसुओं की गगरी . मैं एक  माँ  हूँ , प्रतिपल जो रहे  , अपनी संतान के लिए जीती . उनकी चिंता में घुली-घुली सी , जब तक सुरक्षित घर ना लौट आये , तब तक रहती हूँ सब -कुछ भूली-भूली सी. चाहे कुछ भी मिले संतान से , उपेक्षा /प्यार /सम्मान. और यदि ना भी मिले कुछ , तो भी ! निस्वार्थ सेवा /प्रेम /ममता में सलग्न अपने कर्तव्य  से रहती हूँ बंधी-बंधी सी. मेरी तो बस एक ही आशा , और एक ही अरमां. मेरी संतान  सफलता के शिखर  को छुए,                                                                                                                                                          भले ही फिर शिखर  पर पहुँच कर मुझे भूल जाये . मैं हूँ  एक पत्नी भी . दिल में अगाध पति-प्रेम…
Read More
अनुभूति

अनुभूति

कविता
अस्तित्व... मैंने जब भी सूना है की ईश्वर है, मन की आशाओ ने कुछ और जिया है, हर एक इंसान में महसूस किया है किसी अनजान अस्तित्वको, बातो में निकलती दुवाओ में, कभी माँ की हथेलियों में, पापा के मश्वरो में, भाई के राखी बंधे हाथो मे, बहन की जप्पियो में, भाभी की बातो में दोस्तों की महफ़िलो में, प्यारभरे उन लम्हो में किसी की मुस्कानों में, किसी की आँखों के दर्द में... कुदरत की बनायी सभी रचनाये कर रही हे प्रेरित, उस अस्तित्व की उष्मा को अपने अंदर सहेजकर एक ओर नया जीवन जीने की तमन्ना को जीवित कर लेती हूँँ। -मनीषा 'जोबन'
Read More

डूब गए …

कविता
डूब गए ... तिमिर गहराने लगा एक ख़ामोशी  सांसें लेने लगी तेरे अंदर भी मेरे अंदर भी तैर रहे थे निष्पंद से कुछ स्पर्श तेरे अंदर भी मेरे अंदर भी सुलग रहे थे कुछ अलाव चाहतों की अदृश्य मुंडेरों पर तेरे अंदर भी मेरे अंदर भी डूब गए कई जज़ीरे ख़्वाबों के खामोश से तूफ़ान में तेरे अंदर भी मेरे अंदर भी सुशील सरना
Read More

मानव धर्म बताय दीजिए

कविता
शारदे की पूजा करूँ काम नहीं दूजा करूँ भक्ति ऐसी मेरे हिय में जगाय दीजिए।। साथ दे जो हर घड़ी कभी न अकेला छोड़े धर्म पथ पर कोई वो सहाय दीजिए।। लेखनी का शस्त्र धरूँ अशिक्षा पे वार करूँ। ज्ञान दीप मेरे हिय में जलाय दीजिए।। शिक्षा जो ग्रहण किया सभी में मैं बाँट सकूँ मानव का धर्म हमें बतलाय दीजीए।। #मालतीमिश्रा
Read More

वर्जिन

आधी-आबादी, कविता
मैं वर्जिन हूँ विवाह के इतने वर्षों के पश्चात् भी मैं वर्जिन हूँ संतानों की उत्पत्ति के बाद भी। वो जो तथाकथित प्रेम था वो तो मिलन था भौतिक गुणों का और यह जो विवाह है यह मिलन था दो शरीरों का मैं आज भी वर्जिन हूँ अनछुई स्पर्शरहित। मैं मात्र भौतिक गुण नहीं मैं मात्र शरीर भी नहीं मैं वो हूँ जो पिता के आदर्शों के वस्त्र में छिपी रही मैं वो हूँ जो माँ के ख्वाबों के पंख लगाये उड़ती रही मैं वो हूँ जो पति की जरूरतों में उलझी रही मैं वो भी हूँ जो बच्चों की खुशियों के पीछे दौड़ती रही। मैं अब वर्जिन नहीं रहना चाहती मैं छूना चाहती हूँ खुद को।
Read More
रोज़ा आउसलेण्डर (Rose Ausländer) की दस कविताएँ: अनुवादक-  प्रतिभा उपाध्याय

रोज़ा आउसलेण्डर (Rose Ausländer) की दस कविताएँ: अनुवादक- प्रतिभा उपाध्याय

कविता
रोज़ा आउसलेण्डर (Rose Ausländer) का जन्म 11 मई 1901 को बूकोवीना (वर्तमान उक्रेन) में और निधन 3 जनवरी 1988 ड्यूसलडोर्फ़ (जर्मनी) में हुआI रोज़ा आउसलेण्डर एक जर्मन भाषी यहूदी कवि थीं. उनका अधिकाँश जीवन संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी में निर्वासन में व्यतीत हुआ. उन्होंने लिखा  “शब्द ही उनका असली घर है I” अपनी कविता “मातृभूमि” में उन्होंने राष्ट्रीय पहचान और व्यक्तिगत पहचान को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया है. यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जर्मनी को “पितृभूमि-Vaterland” कहा जाता हैI रोज़ा आउसलेण्डर को उनकी पारदर्शी कविताओं के लिए जाना जाता है, जिसमें उन्होंने संसार के प्राकृतिक आश्चर्य तारों, मधुमक्खियों, फूलों आदि का बखूबी चित्रण किया है , साथ ही साथ द्वीतीय विश्वयुद्ध के अपने अनुभवों का भी वर्णन किया हैI रोज़ा आउसलेण्डर के पास मात्र दो सूटकेस थे,…
Read More
ये भी सुनो

ये भी सुनो

कविता
ये भी सुनो ------ अदना तक तो धनकुबेर है, क्या कहें सरकार की अमर बेल सा पसर गया है, जय हो भ्रष्टाचार की बिल्ली के भाग से छींका टूटा, बन बैठे सरकारी जितना खर्चा हरदिन लेंगे ,आए कर तैयारी कैसे नियम कानून कायदे, साहिब सबसे ऊपर चक्कर लगा लगा के मर गयी,जनता हुई घनचक्कर सबसे पहले अपना घर और अपना पेट भरेंगे बाद अगर कुछ बचा रहा तो जनसेवा कर लेंगे और अगर जो उनसे भिड़े तो जानो शामत आई जिंदा को मुर्दा कर देंगे झेलोगे जग हंसाई देख रहे क्या मूरत बनके खुद तुमने जड़ को सींचा कितना कसैला निकल कर आया फल इस पौधे का अब भी थोड़ा समय है बाकी कर पाओ तो कर लो चलो हमेशा सीधे रस्ते यह बात गांठ में धर लो 🙏🙏🙏🙏🙏🙏 चित्र…
Read More
क्या लिखूं: सपना सक्सेना

क्या लिखूं: सपना सक्सेना

कविता
क्या लिखूं 🌺🌺🌺 बोल मेरे मन क्या लिखूं विषय श्रंगार का अतिरेक या लोचन के अश्रु दाह लिखूं अगम चितेरे की तूलिका के रंगो का सत्कार करूं नमन करूं प्रकृति को या ईश शीश पर हार धरूं तरणी तरंग की अठखेली या कलुष अवरुद्ध प्रवाह लिखूं बलिदानों की श्रद्धा सुमन कि जय का गौरव गान रहे रोता बिलखता बचपन या कि कच्ची सी मुस्कान रहे पनघट वाली बंसी या फिर विरह वेदना आह ! लिखूं बोल मेरे मन क्या लिखूं सपना सक्सेना
Read More
” नई पहचान “

” नई पहचान “

कविता
  नित्य सवेरे तुम जग जाना , धरती माँ को शीश नवाना । प्यारे बच्चों इस दुनियाँ में , मिल-जुलकर पहचान बनाना ।।1।। मात-पिता की सेवा करना , बाधाओं से कभी न डरना । पढ़-लिखकर जीवन में अपनें , मिल-जुलकर पहचान बनाना ।।2।। सच्चाई के पथ पर चलना , भेद-भाव की बात न करना । अपनी मंजिल तक जाकर तुम, मिल-जुलकर पहचान बनाना ।।3।। प्रमोद सोनवानी पुष्प      
Read More
पर्यावरण बचाना है- प्रमोद सोनवानी पुष्प

पर्यावरण बचाना है- प्रमोद सोनवानी पुष्प

कविता
    धरा को स्वर्ग बनाना है , पर्यावरण बचाना है । गाँव-गाँव हर गली-गली में , हमको वृक्ष लगाना है ।।1।। पेड़-पौधे देते हैं जग को , शीतल छाया और दवा । इसीलिये मिल-जुलकर हमको , करना है वृक्षों की सेवा ।।2।। परम हितैषी पेड़ सभी , अब न काटें इसे कभी । मिल-जुलकर इन वृक्षों की , देखभाल करेंगे हम सभी ।।3।। वृक्षारोपड़ करना है , जीवन सुखद बनाना है । प्यारे बच्चों इस दुनियाँ में , पर्यावरण बचाना है ।।4।। प्रमोद सोनवानी पुष्प श्री फूलेंद्र साहित्य निकेतन तमनार/पड़िगाँव-रायगढ़ (छ.ग.) 496107
Read More
मेरे अल्फ़ाज़ खंज़र हो गए हैं- माही

मेरे अल्फ़ाज़ खंज़र हो गए हैं- माही

कविता
मेरे अल्फ़ाज़ खंज़र हो गए हैं किसी दुश्मन बराबर हो गए हैं नहीं महफ़ूज़ अब घर में ही बेटी बहुत ही खौफ़ मंज़र हो गए हैं किसी दरवेश का दिल था दुखाया तभी खारे समंदर हो गए हैं उगाए थे जो गुल हाथों में मैंने मुक़द्दर से वो पत्थर हो गए हैं मुहब्बत की फ़सल फलती नहीं अब दिलों के खेत बंज़र हो गए हैं लगे कूलर घरों की खिड़कियों में परिंदे घर से बेघर हो गए हैं गए थे सूख जो तालाब 'माही' इनायत से समंदर हो गए हैं माही
Read More