मैं और मेरा भारत (कविता )

मैं और मेरा भारत (कविता )

कविता
  मेरी और मेरे भारत की , किस्मत है एक जैसी . कभी उबड़ -खाबड़ रास्तों , कभी समतल मैदान जैसी . कभी जिंदगी के तुफानो में हिचकोले खाती ,तो कभी तुफानो से पार लगती सी . कभी आशा -निराशा में झूलती , कभी आनंद-उत्सव मनाती सी. टूटी हुई नाव कहेंया जर्जर ईमारत , मगर जीने का होंसला रखती सी . कभी आस्तीनों के साँपों से झूझती , तो कभी दुश्मनों का सामना करती . कभी गुज़रे हुए सुनहरे ज़मानो और , गुज़रे हुए अपने प्यारों को याद करती . अब भी हैं कुछ शेष हमनवां ,हमराज़ , जिनके प्यार को संजोये हुए है वोह. दिल टूट चूका है फिर भी ज़िंदा है, टूटे हुए दिल को जोड़े हुए है वोह. अरमां है, चाहतें ,कुछ ख्वाब भी हैं, शेष हैं…
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सब  ठीक  है !  ( हास्य -व्यंग्य कविता)

सब ठीक है ! ( हास्य -व्यंग्य कविता)

कविता, राजनीति, व्यंग्य
                                           देश   की  नय्या  डोल  रही  है ,                                             अराजकता  सर चढ़  के बोल रही है ,                                           महंगाई  ने डाला गले में फंदा,                                           भरष्टाचार ,काला  बाजारी ,घुस खोरी ,                                            बईमानी  फल फुल रही है।                          …
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इंसान या फ़रिश्ता   (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

इंसान या फ़रिश्ता (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, संस्कृति
इंसान था वोह या फ़रिश्ता था कोई देखते ही सजदे में यूँ सर झुक जाये . आवाज़ थी जिसकी शहद सी मीठी जज़्बात के हर रंग में ढल जाये. सादगी,पाकीजगी,इंसानियत की मूरत क्यों ना उसे फिर फ़रिश्ता कहा जाये . यारों का तो यार था,दुश्मनों का भी यार , उसकी मीठी मुस्कान गैरों पर भी जादू कर जाये . दौलत,शोहरत का गुलाम नहीं था वोह दौलत शोहरत खुद जिसकी बांदी बन जाये. पीरों जैसा जीने का अंदाज़ था जिसका बस प्यार ही प्यार अपनी अदा से लुटाता जाए . वतन-परस्ती और सभी मजहबों की इज़्ज़त सभी इंसानों में जिसे बस  खुदा नज़र आये . संगीत का पैगम्बर कहे या कहे तानसेन/बेजुबावरा उसकी तारीफ में वल्लाह ! हर लफ्ज़ कम पड़ जाये. चाहे कितनी सदियाँ गुज़र जाएँ मगर इस जहाँ में…
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नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, शिक्षा, संस्कृति
ये चश्मे चिराग बुझे ,महफ़िल में अँधेरा हो गया, जिंदगी का तार टूट गया और तराना सो गया . अब कहाँ जाए तेरे उम्दा गीतों को चाहने वाले , गीतों का दरवेश /राजकुमार जो खामोश हो गया . जो होता था कभी महफ़िल की जान औ रौनक , वोह अब महफ़िल को सुनी कर छोड़ गया . इंसानी ज़ज्बातों को जिसकी कलम ने यूँ छुआ , के हर इंसान के दिल की आवाज़ वोह बन गया . हिंदी और उर्दू का अनूठा संगम करवाता नीरज, खुद  इश्क-ऐ- हक़ीकी से  एकाकार  हो गया. रहेगी जब तक यह दुनिया ,तेरा नाम अमर रहेगा , तेरे नगमो का रंग इस कदर हमारे जीवन में घुल गया.      
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आजकल बहुत उबने लगी हूँ मैं .. (कविता)

कविता
आजकल बहुत  उबने लगी हूँ मैं , हर दिन ,हर रात ,हर पल से  उबने लगी हूँ मैं. जाने यह सुबह क्यों होती है ? यह रात क्यों  होती है ? कोई उत्साह नहीं ,कोई जोश भी नहीं , अपने उबायु  दिन -रात से उबने लगी हूँ मैं . अपनी दिनचर्या क्या है ,आखिर ! रोज़- रोज़ खाना बनाना ,घर संभालना , आते-जाते  बिना बुलये ,कभी बुलाये गए मेहमानों की सेवा , इन फर्जों /जिम्मेदारिओं  से उबने लगी हूँ मैं. समय ही कहाँ है मेरे पास खुद अपने लिए , और कुछ यदि थोडा सा मिले भी तो , क्या करूँ ? क्या न करू ? कुछ पुस्तकें पढूं ,या टीवी देखूं , समाचार पत्र पढूं , पुस्तकें भी मेरा जी नहीं बहलाती , और  टीवी और समाचार पत्र की …
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जिस्म

जिस्म

कविता
सुनो ओ  पुरुष !                                                                                                                                                                         तुम्हें  मैं दिखाई देती हूँ  बस एक औरत . तुम्हें मात्र मुझे समझते हो एक जिस्म . मगर  इस जिस्म में एक रूह भी है , एक  जज्बातों से भरा दिल है, एक विचारशील  दिमाग है, मैं एक मात्र जिस्म नहीं , मुझमें है एक पूरा वजूद . मैं  एक इंसान हूँ, तुम्हारी तरह, बल्कि यूँ कहो ,तुमसे बढ़कर. मैं तुमसे किसी मायनो में कम नहीं हूँ. किसी बात में कम नहीं हूँ. शिक्षा -दीक्षा, कला-कौशल , खेल- राजनीति ,वाणिज्य आदि . तुम सब जानते हो. मगर मुझे पहचानते नहीं . तुम मुझे  घूरते हो बेशक , मगर देखते नहीं. शायद तुम देखना चाहते भी नहीं. क्योंकि यदि तुमने मुझे देखा , तो खुद को बहुत छोटा पायोगे. तुम नहीं समझना चाहते मुझे  इंसान .…
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मैं … ( एक गृहणी की डायरी )

मैं … ( एक गृहणी की डायरी )

कविता
मैं  हूँ  नारी , भावनाओं से भरी , आँचल  में ममता और , आँखों में भरे आंसुओं की गगरी . मैं एक  माँ  हूँ , प्रतिपल जो रहे  , अपनी संतान के लिए जीती . उनकी चिंता में घुली-घुली सी , जब तक सुरक्षित घर ना लौट आये , तब तक रहती हूँ सब -कुछ भूली-भूली सी. चाहे कुछ भी मिले संतान से , उपेक्षा /प्यार /सम्मान. और यदि ना भी मिले कुछ , तो भी ! निस्वार्थ सेवा /प्रेम /ममता में सलग्न अपने कर्तव्य  से रहती हूँ बंधी-बंधी सी. मेरी तो बस एक ही आशा , और एक ही अरमां. मेरी संतान  सफलता के शिखर  को छुए,                                                                                                                                                          भले ही फिर शिखर  पर पहुँच कर मुझे भूल जाये . मैं हूँ  एक पत्नी भी . दिल में अगाध पति-प्रेम…
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अनुभूति

अनुभूति

कविता
अस्तित्व... मैंने जब भी सूना है की ईश्वर है, मन की आशाओ ने कुछ और जिया है, हर एक इंसान में महसूस किया है किसी अनजान अस्तित्वको, बातो में निकलती दुवाओ में, कभी माँ की हथेलियों में, पापा के मश्वरो में, भाई के राखी बंधे हाथो मे, बहन की जप्पियो में, भाभी की बातो में दोस्तों की महफ़िलो में, प्यारभरे उन लम्हो में किसी की मुस्कानों में, किसी की आँखों के दर्द में... कुदरत की बनायी सभी रचनाये कर रही हे प्रेरित, उस अस्तित्व की उष्मा को अपने अंदर सहेजकर एक ओर नया जीवन जीने की तमन्ना को जीवित कर लेती हूँँ। -मनीषा 'जोबन'
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डूब गए …

कविता
डूब गए ... तिमिर गहराने लगा एक ख़ामोशी  सांसें लेने लगी तेरे अंदर भी मेरे अंदर भी तैर रहे थे निष्पंद से कुछ स्पर्श तेरे अंदर भी मेरे अंदर भी सुलग रहे थे कुछ अलाव चाहतों की अदृश्य मुंडेरों पर तेरे अंदर भी मेरे अंदर भी डूब गए कई जज़ीरे ख़्वाबों के खामोश से तूफ़ान में तेरे अंदर भी मेरे अंदर भी सुशील सरना
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मानव धर्म बताय दीजिए

कविता
शारदे की पूजा करूँ काम नहीं दूजा करूँ भक्ति ऐसी मेरे हिय में जगाय दीजिए।। साथ दे जो हर घड़ी कभी न अकेला छोड़े धर्म पथ पर कोई वो सहाय दीजिए।। लेखनी का शस्त्र धरूँ अशिक्षा पे वार करूँ। ज्ञान दीप मेरे हिय में जलाय दीजिए।। शिक्षा जो ग्रहण किया सभी में मैं बाँट सकूँ मानव का धर्म हमें बतलाय दीजीए।। #मालतीमिश्रा
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वर्जिन

आधी-आबादी, कविता
मैं वर्जिन हूँ विवाह के इतने वर्षों के पश्चात् भी मैं वर्जिन हूँ संतानों की उत्पत्ति के बाद भी। वो जो तथाकथित प्रेम था वो तो मिलन था भौतिक गुणों का और यह जो विवाह है यह मिलन था दो शरीरों का मैं आज भी वर्जिन हूँ अनछुई स्पर्शरहित। मैं मात्र भौतिक गुण नहीं मैं मात्र शरीर भी नहीं मैं वो हूँ जो पिता के आदर्शों के वस्त्र में छिपी रही मैं वो हूँ जो माँ के ख्वाबों के पंख लगाये उड़ती रही मैं वो हूँ जो पति की जरूरतों में उलझी रही मैं वो भी हूँ जो बच्चों की खुशियों के पीछे दौड़ती रही। मैं अब वर्जिन नहीं रहना चाहती मैं छूना चाहती हूँ खुद को।
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रोज़ा आउसलेण्डर (Rose Ausländer) की दस कविताएँ: अनुवादक-  प्रतिभा उपाध्याय

रोज़ा आउसलेण्डर (Rose Ausländer) की दस कविताएँ: अनुवादक- प्रतिभा उपाध्याय

कविता
रोज़ा आउसलेण्डर (Rose Ausländer) का जन्म 11 मई 1901 को बूकोवीना (वर्तमान उक्रेन) में और निधन 3 जनवरी 1988 ड्यूसलडोर्फ़ (जर्मनी) में हुआI रोज़ा आउसलेण्डर एक जर्मन भाषी यहूदी कवि थीं. उनका अधिकाँश जीवन संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी में निर्वासन में व्यतीत हुआ. उन्होंने लिखा  “शब्द ही उनका असली घर है I” अपनी कविता “मातृभूमि” में उन्होंने राष्ट्रीय पहचान और व्यक्तिगत पहचान को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया है. यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जर्मनी को “पितृभूमि-Vaterland” कहा जाता हैI रोज़ा आउसलेण्डर को उनकी पारदर्शी कविताओं के लिए जाना जाता है, जिसमें उन्होंने संसार के प्राकृतिक आश्चर्य तारों, मधुमक्खियों, फूलों आदि का बखूबी चित्रण किया है , साथ ही साथ द्वीतीय विश्वयुद्ध के अपने अनुभवों का भी वर्णन किया हैI रोज़ा आउसलेण्डर के पास मात्र दो सूटकेस थे,…
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