दास्ताँ-ऐ-दरख्त  (ग़ज़ल)

दास्ताँ-ऐ-दरख्त (ग़ज़ल)

कविता, ग़ज़ल
                        दास्ताँ-ऐ-दरख्त  (ग़ज़ल)                     कल था  इसकी शाखों  पर परिदों का शोर, आज उनका घोंसला  क्यों सुना हो  गया.   खुशियों सी हरियाली और फूलों  से  जज़्बात, फिजा का वोह रंग  क्यों खिज़ा में बदल  गया.   देता था जो  पैगाम  जहाँवालों को  अमन का , आगाज़ उल्फत का क्यों नफरत में बदल गया. निराली  थी जिसकी शान  सारे गुलिस्तान में, आज  उसी के  ज़बीं पर  क्यों  दाग रह गया. हर  आते-जाते  मुसाफिर को साया देने वाला, खुद देखो !  हाय ! क्यों अब सेहरा  में खो गया. कल हँसता था जिस  वादे-सबा से  हिल-मिल, अब उसका  भी इधर क्यों  रुख  ना रह गया  . उम्र  भर  अब   लब  पर  आह  और  अश्क , बस यही  उसके  जीने…
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ईश्वर की खोज (कविता)

ईश्वर की खोज (कविता)

कविता
मैं  तो नहीं हूँ मंदिर -मस्जिद , ना गिरजाघर न गुरुद्वारों में . क्योंकि  भक्ति नहीं  यहाँ  व्यापार होता है .. मैं तो नहीं हूँ  धार्मिक गुरु,  मुल्ला , पादरी ,ज्ञानी ,और पंडितों के स्थानमें. धर्म का  नहीं  यहाँ व्यभिचार का प्रचार होता है.     मैं  तो नहीं हूँ  इंसानों में , बच्चे ,बूढ़े या  युवा ,किशोर , सभी के भीतर  पाप  /कुटिलता का अन्धकार है ...     हाँ  ! मैं  कभी था सारी प्रकृति में, इस पृथ्वी के  कण-कण में,जड़-चेतन में. मगर प्रदुषण से अब  सारा सरोबर  है. ....     मैं हूँ तो धर्म -ग्रंथों में, कुरान ,बाईबल , गीता में, वेदों , पुराणों ,शास्त्रों में , मगर इन्हें  पढने /समझने की  किसको दरकार है?     वैसे  तो मैं बिकता हूँ दुकानों में, तस्वीर या…
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कटघरे में कानून (ग़ज़ल )

कटघरे में कानून (ग़ज़ल )

कविता, ग़ज़ल
आज एक मुल्ज़िम को नहीं बल्कि , कानून को कटघरे में खड़े हुए मैने देखा . बिखरा हुआ सा वजूद, बेनूर चेहरा , शर्म से सर झुकाते हुए मैने देखा . टुटा -बिखरा फर्श पर पडा हुआ, इन्साफ का तराजू भी मैने देखा . एक बेबस ,गमगीन ,इंसानियत को , रोते-बिलखते ,सिसकते हुए मैने देखा . जो दे रही थी दुहाई खुदा और इंसान को , बेचारी को पत्थरों से सर फोड़ते मैने देखा . बिक चूका था जो कानून दौलत के आगे , उसे  ज़मीर से नज़रें चुराते हुए मैने देखा. आखिरश मौत हो गयी इन्साफ का भी, तभी !! शैतानो पर मंडराती कयामत कोभी  मैने देखा.      
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ऐ कान्हा  ! बता तू  कहाँ  है  ?  (कविता)

ऐ कान्हा ! बता तू कहाँ है ? (कविता)

कला जगत, कविता
                         हे कान्हा   ! बता  तू   कहाँ  है  ? ,                         तेरे लिए ये  दिल  परेशां है .                         कहाँ  -कहाँ  नहीं   तलाश  किया  तुझे ,                         मंदिर -मस्जिद या  गुरूद्वारे  में  तुझे ,                        कहाँ  है  तेरा ठिकाना ? रहता  तू जहाँ  है.....                         पर्वत  की कन्दराएँ या यमुना  के किनारे ,                        बाग़-बगीचों में  या  खडा  कदम्ब  के सहारे ,                        प्रकृति  के  किस छोर  में  तू   रवां  है  ?......                          बच्चों  में  मासूमियत  रह  कहाँ गयी  ,          …
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टूटना

Uncategorized, कविता
[contact-form][contact-field label="Name" type="name" required="true" /][contact-field label="Email" type="email" required="true" /][contact-field label="Website" type="url" /][contact-field label="Message" type="textarea" /][/contact-form] टूटना कुछ चीजें अक्सर टूट जाया करती हैं जैसे टूट जाते हैं खिड़कियों के काँच जैसे टूट जाते हैं किमती कप और प्यालियाँ जैसे टूट जाते हैं डालियों से हरे पत्ते जैसे टूट जाया करती हैं आसमान से बिजलियाँ वैसे ही कुछ टूट जाता है इंसान इंसान का टूटना काँच, कप, पत्ते या कि बिजलियों जैसा नहीं है क्योंकि जब चीजें टूटती हैं तो दूसरी मिलने या जुड़ने की सम्भावना भी की जा सकती है लेकिन जब इंसान टूटता है तो उसके टूटने का दुख उसके अंतःकरण में घर कर जाता है जिसे मिटा पाना सम्भव तो होता है लेकिन बहुत ही मुश्किल भी l
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मैं और मेरा भारत (कविता )

मैं और मेरा भारत (कविता )

कविता
  मेरी और मेरे भारत की , किस्मत है एक जैसी . कभी उबड़ -खाबड़ रास्तों , कभी समतल मैदान जैसी . कभी जिंदगी के तुफानो में हिचकोले खाती ,तो कभी तुफानो से पार लगती सी . कभी आशा -निराशा में झूलती , कभी आनंद-उत्सव मनाती सी. टूटी हुई नाव कहेंया जर्जर ईमारत , मगर जीने का होंसला रखती सी . कभी आस्तीनों के साँपों से झूझती , तो कभी दुश्मनों का सामना करती . कभी गुज़रे हुए सुनहरे ज़मानो और , गुज़रे हुए अपने प्यारों को याद करती . अब भी हैं कुछ शेष हमनवां ,हमराज़ , जिनके प्यार को संजोये हुए है वोह. दिल टूट चूका है फिर भी ज़िंदा है, टूटे हुए दिल को जोड़े हुए है वोह. अरमां है, चाहतें ,कुछ ख्वाब भी हैं, शेष हैं…
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सब  ठीक  है !  ( हास्य -व्यंग्य कविता)

सब ठीक है ! ( हास्य -व्यंग्य कविता)

कविता, राजनीति, व्यंग्य
                                           देश   की  नय्या  डोल  रही  है ,                                             अराजकता  सर चढ़  के बोल रही है ,                                           महंगाई  ने डाला गले में फंदा,                                           भरष्टाचार ,काला  बाजारी ,घुस खोरी ,                                            बईमानी  फल फुल रही है।                          …
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इंसान या फ़रिश्ता   (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

इंसान या फ़रिश्ता (अमर गायक स्व. मुहम्मद रफ़ी साहब की पुण्यतिथि पर विशेष)

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, संस्कृति
इंसान था वोह या फ़रिश्ता था कोई देखते ही सजदे में यूँ सर झुक जाये . आवाज़ थी जिसकी शहद सी मीठी जज़्बात के हर रंग में ढल जाये. सादगी,पाकीजगी,इंसानियत की मूरत क्यों ना उसे फिर फ़रिश्ता कहा जाये . यारों का तो यार था,दुश्मनों का भी यार , उसकी मीठी मुस्कान गैरों पर भी जादू कर जाये . दौलत,शोहरत का गुलाम नहीं था वोह दौलत शोहरत खुद जिसकी बांदी बन जाये. पीरों जैसा जीने का अंदाज़ था जिसका बस प्यार ही प्यार अपनी अदा से लुटाता जाए . वतन-परस्ती और सभी मजहबों की इज़्ज़त सभी इंसानों में जिसे बस  खुदा नज़र आये . संगीत का पैगम्बर कहे या कहे तानसेन/बेजुबावरा उसकी तारीफ में वल्लाह ! हर लफ्ज़ कम पड़ जाये. चाहे कितनी सदियाँ गुज़र जाएँ मगर इस जहाँ में…
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नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

नीरज की याद में … ( ग़ज़ल )

कला जगत, कविता, ग़ज़ल, शिक्षा, संस्कृति
ये चश्मे चिराग बुझे ,महफ़िल में अँधेरा हो गया, जिंदगी का तार टूट गया और तराना सो गया . अब कहाँ जाए तेरे उम्दा गीतों को चाहने वाले , गीतों का दरवेश /राजकुमार जो खामोश हो गया . जो होता था कभी महफ़िल की जान औ रौनक , वोह अब महफ़िल को सुनी कर छोड़ गया . इंसानी ज़ज्बातों को जिसकी कलम ने यूँ छुआ , के हर इंसान के दिल की आवाज़ वोह बन गया . हिंदी और उर्दू का अनूठा संगम करवाता नीरज, खुद  इश्क-ऐ- हक़ीकी से  एकाकार  हो गया. रहेगी जब तक यह दुनिया ,तेरा नाम अमर रहेगा , तेरे नगमो का रंग इस कदर हमारे जीवन में घुल गया.      
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आजकल बहुत उबने लगी हूँ मैं .. (कविता)

कविता
आजकल बहुत  उबने लगी हूँ मैं , हर दिन ,हर रात ,हर पल से  उबने लगी हूँ मैं. जाने यह सुबह क्यों होती है ? यह रात क्यों  होती है ? कोई उत्साह नहीं ,कोई जोश भी नहीं , अपने उबायु  दिन -रात से उबने लगी हूँ मैं . अपनी दिनचर्या क्या है ,आखिर ! रोज़- रोज़ खाना बनाना ,घर संभालना , आते-जाते  बिना बुलये ,कभी बुलाये गए मेहमानों की सेवा , इन फर्जों /जिम्मेदारिओं  से उबने लगी हूँ मैं. समय ही कहाँ है मेरे पास खुद अपने लिए , और कुछ यदि थोडा सा मिले भी तो , क्या करूँ ? क्या न करू ? कुछ पुस्तकें पढूं ,या टीवी देखूं , समाचार पत्र पढूं , पुस्तकें भी मेरा जी नहीं बहलाती , और  टीवी और समाचार पत्र की …
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जिस्म

जिस्म

कविता
सुनो ओ  पुरुष !                                                                                                                                                                         तुम्हें  मैं दिखाई देती हूँ  बस एक औरत . तुम्हें मात्र मुझे समझते हो एक जिस्म . मगर  इस जिस्म में एक रूह भी है , एक  जज्बातों से भरा दिल है, एक विचारशील  दिमाग है, मैं एक मात्र जिस्म नहीं , मुझमें है एक पूरा वजूद . मैं  एक इंसान हूँ, तुम्हारी तरह, बल्कि यूँ कहो ,तुमसे बढ़कर. मैं तुमसे किसी मायनो में कम नहीं हूँ. किसी बात में कम नहीं हूँ. शिक्षा -दीक्षा, कला-कौशल , खेल- राजनीति ,वाणिज्य आदि . तुम सब जानते हो. मगर मुझे पहचानते नहीं . तुम मुझे  घूरते हो बेशक , मगर देखते नहीं. शायद तुम देखना चाहते भी नहीं. क्योंकि यदि तुमने मुझे देखा , तो खुद को बहुत छोटा पायोगे. तुम नहीं समझना चाहते मुझे  इंसान .…
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मैं … ( एक गृहणी की डायरी )

मैं … ( एक गृहणी की डायरी )

कविता
मैं  हूँ  नारी , भावनाओं से भरी , आँचल  में ममता और , आँखों में भरे आंसुओं की गगरी . मैं एक  माँ  हूँ , प्रतिपल जो रहे  , अपनी संतान के लिए जीती . उनकी चिंता में घुली-घुली सी , जब तक सुरक्षित घर ना लौट आये , तब तक रहती हूँ सब -कुछ भूली-भूली सी. चाहे कुछ भी मिले संतान से , उपेक्षा /प्यार /सम्मान. और यदि ना भी मिले कुछ , तो भी ! निस्वार्थ सेवा /प्रेम /ममता में सलग्न अपने कर्तव्य  से रहती हूँ बंधी-बंधी सी. मेरी तो बस एक ही आशा , और एक ही अरमां. मेरी संतान  सफलता के शिखर  को छुए,                                                                                                                                                          भले ही फिर शिखर  पर पहुँच कर मुझे भूल जाये . मैं हूँ  एक पत्नी भी . दिल में अगाध पति-प्रेम…
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