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द्रोपदी का रुदन भस्म हुआ है गौरव कुल का मामा शकुनि के पासों में , पांडव वीरता धुली जा रही बीच सभा उपहासों में , खड़ी हुई है द्रोप सुता अथाह हृदय में पीर लिये , पूछ रही एक एक से मानो नयन क्रोध का नीर लिये , हे !तात कहो हे! मात कहो भीष्म पितामह मौन हो क्यों , कहां गया आशीष दिया जो मान हो कुल का सुखी रहो , हे !आर्य पुत्र पांडव वीरों हे मेरे प्राणाधार कहो , झुके हुए क्यों मस्तक ऐसे मुझे देखकर उत्तर दो, किसने दिया अधिकार तुम्हें क्यों लक्ष्मण रेखा पार गये पल भर के अभिमान में जो मेरा जीवन हार गये विवाह बेदी पर लिए गए जो वचन वो एक एक भूल गये , प्रेम नेह तो बात बड़ी है मानवता…
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द्रोपदी का रुदन भस्म हुआ है गौरव कुल का मामा शकुनि के पासों में , पांडव वीरता धुली जा रही बीच सभा उपहासों में , खड़ी हुई है द्रोप सुता अथाह हृदय में पीर लिये , पूछ रही एक एक से मानो नयन क्रोध का नीर लिये , हे !तात कहो हे! मात कहो भीष्म पितामह मौन हो क्यों , कहां गया आशीष दिया जो मान हो कुल का सुखी रहो , हे !आर्य पुत्र पांडव वीरों हे मेरे प्राणाधार कहो , झुके हुए क्यों मस्तक ऐसे मुझे देखकर उत्तर दो, किसने दिया अधिकार तुम्हें क्यों लक्ष्मण रेखा पार गये पल भर के अभिमान में जो मेरा जीवन हार गये विवाह बेदी पर लिए गए जो वचन वो एक एक भूल गये , प्रेम नेह तो बात बड़ी है मानवता…
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जाने क्यूं ? खिलाफत के डर से टोकता बहुत है , ज़माना कदमों को रोकता बहुत है .... देने को जवाब है मेरे पास मगर , कमबख्त ये दिल सोचता बहुत है ..... परदा करते हो आईने से ,कर लो ! तन्हाई में गुनाह कचोटता बहुत है .... दान जप योग किसी काम के नही , ठुकराया हुआ भूखा कोसता बहुत है ..... तूफान में तो खिल लेता गुल मगर डाली का झिटकना तोड़ता बहुत है ।।
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बड़ी चाह थी बड़ी चाह थी कोई होता सुन लेता जो हाले दिल कभी कभी ही सही मगर दर्द से राहत जाती मिल ढूंढ सके ना कोई अपना रात में ना ही उजालों में टूट टूट के बिखर के रह गए सिमट के रह गए छालों में अब ना मुझको पा सकेगी मेरी बेवफा परछाई लौटा कर वापस देती हूं सौगात जो जग से पाई
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इतना करो उपकार प्रभु 🙏 काश शब्द रोटी बन जाते और स्याही दूध की धार प्रभु , मेरी कविताएं बन जाती किसी जीवन का आधार प्रभु ..... कलम से झरते ईंट और पत्थर किसी सिर पर तो छत हो जाती , नन्हीं कलियां घायल ममता चैन की नींद तो सो पाती , भावनाओं को सिल सिल कर कर दो आंचल के तार प्रभु .... छंदों गीतों की धाराओं में शोक संताप जो बह जाते , जीवन से भागे जीवन कुछ जीवन का सुख पा जाते, बस इतना सा उपकार करो कब मांगा ये संसार प्रभु ..... सपना सक्सेना ग्रेटर नोएडा
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इतना करो उपकार प्रभु 🙏 काश शब्द रोटी बन जाते और स्याही दूध की धार प्रभु , मेरी कविताएं बन जाती किसी जीवन का आधार प्रभु ..... कलम से झरते ईंट और पत्थर किसी सिर पर तो छत हो जाती , नन्हीं कलियां घायल ममता चैन की नींद तो सो पाती , भावनाओं को सिल सिल कर कर दो आंचल के तार प्रभु .... छंदों गीतों की धाराओं में शोक संताप जो बह जाते , जीवन से भागे जीवन कुछ जीवन का सुख पा जाते, बस इतना सा उपकार करो कब मांगा ये संसार प्रभु ..... सपना सक्सेना ग्रेटर नोएडा
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क्या बोलूं कैसे सुनाऊं कथा मैं अपने भारत देश महान की , लगा रही है लंका खादी गौरव की सम्मान की । गिरा तरीका बोलचाल का भूले सारे शिष्टाचार , जनता भौंचक समझ न पाए माननीयों का यह व्यवहार । क्या मंत्री क्या संतरी बंधु पद की गरिमा भूल गए , सभ्यता नाम की चीज नही बातों बातों में कबूल गए ,। किसी को बोलें चोर हठेला कभी किसी को चौकीदार कोई पप्पू तो कोई पागल रोज तमाशा रोज बाजार खुद को देश का सेवक कहते दुनिया को रूप दिखा रहे ना बढ़ते ना बढ़ने देते एक दूजे को गिरा रहे आदी हो गए दीवाने हैं खुदगर्जी की दलदल के बेशर्मी से फूल रहे हैं ना इस दल ना उस दल के त्रस्त हो गई जनता भाई दम है तो…
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क्या बोलूं कैसे सुनाऊं कथा मैं अपने भारत देश महान की , लगा रही है लंका खादी गौरव की सम्मान की । गिरा तरीका बोलचाल का भूले सारे शिष्टाचार , जनता भौंचक समझ न पाए माननीयों का यह व्यवहार । क्या मंत्री क्या संतरी बंधु पद की गरिमा भूल गए , सभ्यता नाम की चीज नही बातों बातों में कबूल गए ,। किसी को बोलें चोर हठेला कभी किसी को चौकीदार कोई पप्पू तो कोई पागल रोज तमाशा रोज बाजार खुद को देश का सेवक कहते दुनिया को रूप दिखा रहे ना बढ़ते ना बढ़ने देते एक दूजे को गिरा रहे आदी हो गए दीवाने हैं खुदगर्जी की दलदल के बेशर्मी से फूल रहे हैं ना इस दल ना उस दल के त्रस्त हो गई जनता भाई दम है तो…
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आशा जीवन के इस महाकुंभ में आशाओं का साथ ना छूटे , मन का दर्पण उजला रखना मुसकानों की परी ना रूठे .... दुख की काली बदली से मत घबराना रातों में , कितनी भी हो कठिन डगर रहे आस का दामन हाथों में ... बाल उमंग से स्वागत करना नित नई नवेली भोर का , पंख पसारे पंछी बनकर पीछा करो नभ छोर का ..... चलते रहना ही जीवन है विजयी को आराम नहीं , मानव रूप है सबसे पावन रुकना इसका काम नहीं । सपना सक्सेना ग्रेटर नोएडा
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आशा जीवन के इस महाकुंभ में आशाओं का साथ ना छूटे , मन का दर्पण उजला रखना मुसकानों की परी ना रूठे .... दुख की काली बदली से मत घबराना रातों में , कितनी भी हो कठिन डगर रहे आस का दामन हाथों में ... बाल उमंग से स्वागत करना नित नई नवेली भोर का , पंख पसारे पंछी बनकर पीछा करो नभ छोर का ..... चलते रहना ही जीवन है विजयी को आराम नहीं , मानव रूप है सबसे पावन रुकना इसका काम नहीं । सपना सक्सेना ग्रेटर नोएडा
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कलम इतिहास गढ़ता हूं तकदीर रचता हूं बेमिसाल ईजाद हूं बस छोटा दिखता हूं जिधर चल दूं जमाना चलता है अपनी आहट से धड़कन लिखता हूं ना आंखे हैं न जुबान फिर भी हर शय पर गिरफ्त रखता हूं तुम ही रखो शौक हथियार का कलम हूं ! तेज धार रखता हूं जिद पर आ जाऊं तो कदमों में ले आऊं प्यार से खरीदो कौड़ी में बिकता हूं । सपना सक्सेना स्वरचित
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कलम इतिहास गढ़ता हूं तकदीर रचता हूं बेमिसाल ईजाद हूं बस छोटा दिखता हूं जिधर चल दूं जमाना चलता है अपनी आहट से धड़कन लिखता हूं ना आंखे हैं न जुबान फिर भी हर शय पर गिरफ्त रखता हूं तुम ही रखो शौक हथियार का कलम हूं ! तेज धार रखता हूं जिद पर आ जाऊं तो कदमों में ले आऊं प्यार से खरीदो कौड़ी में बिकता हूं । सपना सक्सेना स्वरचित
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