ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़ज़ल
एक दूजे को बस गिराने में लोग मशगूल हैं कमाने में हसरतें भटकती कहाँ तक हैं महफिलों में कभी वीराने में रौनकें, रौनकों के जैसी हैं यार,केवल शराब खाने में वक्त जाया नहीं किया जाता और को बस कि आजमाने में शौक उसका फसल जलाने में मेरी दिलचस्पी है उगाने में जीत जाये तो जीत उसकी है हाथ मेरा मगर हराने में
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ग़ज़ल: रवींद्र श्रीवास्तव

ग़ज़ल: रवींद्र श्रीवास्तव

ग़ज़ल
होने लगा जमीर भी अब तो हलाल है लोगों की भूख का ये अलम है ,ये हाल है कीमत की बात कीजिये, मर्ज़ी बताइये अब झूठ को भी सत्य बनाता दलाल है मजहब की साजिशों में भी,शामिल है मुहब्बत अब हुस्न हो कि इश्क हो, दोनों बवाल है जो दो टके के थे नहीं, लाखों के हो गए ये कुछ नहीं, सियासतों का बस कमाल है जिसने शिकायतें किया, बर्खास्त हो गया रिश्वत लिया , था शख्स जो वह तो बहाल है तहज़ीब खो जवाब की, अब "बेजुबाँ" गई हर इक सवाल के लिए भी इक सवाल है जब तक जुदा जुदा हैं ,कोई भी डरायेगा आओ ,मिला लो हाथ,तो किसकी मजाल है?
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