‘तुम मुझे भूल जाओ’ – कविता (दिनेश कुमार)

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तुम मुझे भूल जाओ उन्हें यह कहना कितना सहज लगता है कि तुम मुझे भूल जाओ बगैर यह बिचार किए ही कि किसी को भूलना कितना कष्टप्रद होता है वह कैसे कह सकते हैं कि कि मैं उन्हें भूल जाउं शायद इसलिये कि मैं एक मुफ़लिस हूँ शायद इसलिये कि मैं उनकी प्रतिष्ठा के समान नहीं हूँ शायद इसलिये कि मैं उनका सजातीय नहीं हूँ शायद इसलिये कि मैं उसके जैसा नहीं जिसकी वह प्रत्याशा करते हों यह भी हो सकता है कि उसे भय हो अपने अतीत में गुज़रे वक्त का मिले हो कुत्सित प्रवृत्ति के लोग जो ज़िन्दगी के लिए सबक बन गए हों जब भी मैं उससे भावनात्मक रुप से जुड़ने की कोशिश कर करता हूँ तो वह कहता है कि मत सोचा करो बहुत तकलीफ़देह होगा…
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टूटना

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[contact-form][contact-field label="Name" type="name" required="true" /][contact-field label="Email" type="email" required="true" /][contact-field label="Website" type="url" /][contact-field label="Message" type="textarea" /][/contact-form] टूटना कुछ चीजें अक्सर टूट जाया करती हैं जैसे टूट जाते हैं खिड़कियों के काँच जैसे टूट जाते हैं किमती कप और प्यालियाँ जैसे टूट जाते हैं डालियों से हरे पत्ते जैसे टूट जाया करती हैं आसमान से बिजलियाँ वैसे ही कुछ टूट जाता है इंसान इंसान का टूटना काँच, कप, पत्ते या कि बिजलियों जैसा नहीं है क्योंकि जब चीजें टूटती हैं तो दूसरी मिलने या जुड़ने की सम्भावना भी की जा सकती है लेकिन जब इंसान टूटता है तो उसके टूटने का दुख उसके अंतःकरण में घर कर जाता है जिसे मिटा पाना सम्भव तो होता है लेकिन बहुत ही मुश्किल भी l
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