बड़ी चाह थी

बड़ी चाह थी कोई होता
सुन लेता जो हाले दिल
कभी कभी ही सही मगर
दर्द से राहत जाती मिल
ढूंढ सके ना कोई अपना
रात में ना ही उजालों में
टूट टूट के बिखर के रह गए
सिमट के रह गए छालों में
अब ना मुझको पा सकेगी
मेरी बेवफा परछाई
लौटा कर वापस देती हूं
सौगात जो जग से पाई


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