राम बनो

मात पिता के वचन निभाओ
निज शीश झुका वनवास चुनो ,
दहन चले हो करने रावण
उससे पहले तुम राम बनो….

राजमहल के सुख बिसराओ
नव चेतन का निर्माण करो ,
पंथ निहारे कोई दुर्बल
इन पाषाणों में प्राण भरो,
मूक-बधिर मत बनकर बैठो
उठ पापी से संग्राम बुनो …..

सबका हो सम्मान बराबर
किसी शील पर प्रहार न हो ,
कैसी भी हो विकट घड़ी
ये लक्ष्मण रेखा पार ना हो ,
असुर न पलने पाये भीतर
सत्संग बाण अविराम गुनो ….


सपना सक्सेना
ग्रेटर नोएडा

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