वाह री वर्दी


अंधी गूंगी बहरी वर्दी ,
सोई ठहरी ठहरी वर्दी ।

निर्धन का तो महाकाल है ,
धनवानों की चेरी वर्दी ।

कानूनों को जेब में रखती
हत्यारों की प्रहरी वर्दी ।

रौब और खनक की कायल ,
ना तेरी ना मेरी वर्दी ।

उम्मीदों के दीए बुझा दो ,
काली घोर अंधेरी वर्दी ।

मानवता की नमी नदारद ,
लपट भरी दोपहरी वर्दी ।

कैसे साया बने किसी का ,
आखिर वर्दी ठहरी वर्दी ।
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सपना सक्सेना
स्वरचित

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