बोलो कैसे गया विवेक ?
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पूछे जनता उत्तर दो, सीधा-सादा प्रश्न है एक
बुद्धि हीन हे वर्दीधारी, बोलो कैसे गया विवेक ?

क्या सड़के हैं नागिन जैसी, या रात मैं उतरी बला
या धुंध धी ताकत वाली, कुछ नही कैसे पता चला

खुले आम घूमे अपराधी, संग सुरताल मिलाते हो
निष्क्रिय जंग लगे से पड़े नज़र तुम आते हो

आम आदमी सीधा साधा ,दाल रोटी में पागल जो
रात बिरात भटकता दर दर, आतंकी तुम्हे लगता वो

सारी ताकत झोंक दी उसपर, अपना बल दिखलाने में
कैसे रक्षक तुम जनता के, बेहतर पागलखाने में

ना कर्तव्य का बोध तुम्हें, मानवता कहां आये फेंक
बुद्धिहीन हे वर्दीधारी, बोलो कैसे गया विवेक ?

सपना सक्सेना
स्वरचित

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