मैं  तो नहीं हूँ मंदिर -मस्जिद ,

ना गिरजाघर न गुरुद्वारों में .

क्योंकि  भक्ति नहीं  यहाँ  व्यापार होता है ..

मैं तो नहीं हूँ  धार्मिक गुरु,  मुल्ला ,

पादरी ,ज्ञानी ,और पंडितों के स्थानमें.

धर्म का  नहीं  यहाँ व्यभिचार का प्रचार होता है.

 

 

मैं  तो नहीं हूँ  इंसानों में ,

बच्चे ,बूढ़े या  युवा ,किशोर ,

सभी के भीतर  पाप  /कुटिलता का अन्धकार है …

 

 

हाँ  ! मैं  कभी था सारी प्रकृति में,

इस पृथ्वी के  कण-कण में,जड़-चेतन में.

मगर प्रदुषण से अब  सारा सरोबर  है. ….

 

 

मैं हूँ तो धर्म -ग्रंथों में,

कुरान ,बाईबल , गीता में,

वेदों , पुराणों ,शास्त्रों में ,

मगर इन्हें  पढने /समझने की  किसको दरकार है?

 

 

वैसे  तो मैं बिकता हूँ दुकानों में,

तस्वीर या मुर्तिओं के रूप में.

उत्सवों में मुझे  घर लाया जाता है बड़ी ख़ुशी से ,

और उसके बाद  मेरा स्थान  ह्रदय नहीं ,नदी- नाले  और सागर  है..

 

 

 

जब  सुख  / ऐश्वर्य होता  है मनुष्य के  जीवन में ,

तब भूल जाता है मुझे वोह ऐसे समय में .

मगर जब आये कोई बुरी घड़ी ,

तो मुझ पर  आक्षेप  क्यों ?

 

 

तुम मुझे  ढूढ़ते हो दर-बदर ,

केवल  अपने स्वार्थ के लिए.

मगर मुझे  ढूढा नहीं अपने अंतर्मन में.

मैं  तो  हूँ अब भी वही  ,सदा के लिए .

मैं  तो रहता हूँ वास्तव में ,

तुम्हारी सच्ची श्रद्धा ,आस्था और भक्ति में .

एक बार  झाको तो सही  अपनी  आत्मा /अंतर्मन में ,मेरा वहीँ पर घर है .

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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