धरा पुकारती

प्रदूषण की मार से
धरती हुई बेहाल
कौन सुने, किससे कहे
अपने दिल का हाल
हरियाली सब लील गये
पथरीले जंगल
गहराते ही जा रहे
आफत के बादल
तकनीकों के मोह में
ऐसा फंसा संसार
जहरीली हवा हुई
कीच नदी की धार
आबादी का बोझ बढ़ा
हुए खजाने खाली
त्राहि-त्राहि सृष्टि करे
देख अपनी बदहाली
सुखपूर्वक जीना हो
जो मानव जीवन
शुद्ध हवा और पानी का
मिलकर करो प्रयत्न
कचरा करकट दूर रखो
पानी में न बहाओ
रहे कहीं न धरा रीती

हरियाली उपजाओ।

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