आज एक मुल्ज़िम को नहीं बल्कि ,

कानून को कटघरे में खड़े हुए मैने देखा .

बिखरा हुआ सा वजूद, बेनूर चेहरा ,

शर्म से सर झुकाते हुए मैने देखा .

टुटा -बिखरा फर्श पर पडा हुआ,

इन्साफ का तराजू भी मैने देखा .

एक बेबस ,गमगीन ,इंसानियत को ,

रोते-बिलखते ,सिसकते हुए मैने देखा .

जो दे रही थी दुहाई खुदा और इंसान को ,

बेचारी को पत्थरों से सर फोड़ते मैने देखा .

बिक चूका था जो कानून दौलत के आगे ,

उसे  ज़मीर से नज़रें चुराते हुए मैने देखा.

आखिरश मौत हो गयी इन्साफ का भी, तभी !!

शैतानो पर मंडराती कयामत कोभी  मैने देखा.

 

 

 

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