गीत

कभी बंद कभी हड़तालें कैसी लूट मचाई रे
पिसता है हर बार गरीब मेरे मालिक राम दुहाई रे

कभी अन्न तो कभी सब्जियां
कचरे में फिकवाते हैं
दूध का दरिया खुलेआम
सड़कों पर बहाते हैं
बूंद बूंद को बच्चे तरसे इनको लाज ना आई रे

जब मन चाहा राह रोक दी
संपत्ति का नुकसान किया
जान माल की हानि इतनी
करके तुमको मिला है क्या
जोश जोश में खेल बिगाड़ा बात समझ भी न आई रे

मेहनत की रोटी का बंधु
ऐसे मत अपमान करो
कुनीति के जाल में फंसकर
ना अपनो को परेशान करो
जियो चैन से जीने भी दो छोटी उमरिया पाई रे …..

सपना सक्सेना
ग्रेटर नोएडा

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