अल्फाज

बांट रहे हो जाति धर्म में मानव के सम्मान को ,
सत्ता सुख के लिए बिकाऊ कैसे तुम इंसान हो …..

कल तक जिसके गीत सुनाए
चरणों में सिर डाल दिया …
आज उसी के नाम का सिक्का
चौराहे पर उछाल दिया …
किसी एक के रहे कभी ना जग ज़ाहिर बेईमान हो
सत्ता सुख ………..

भूखी प्यासी बेबस जनता
कैसे कैसे बहकाते हो…
कभी आरक्षण कभी कीमतें
नित नई आग लगाते हो….
काठ की हांडी एक बार ही भूल गए ..नादान हो
सत्ता सुख …………

अपनी करनी याद नही
दूजे के दोष गिनाने में….
लगा दिया है बल सारा
तीन को पांच बनाने में …..
जिसकी खातिर चुने गए उसी से बस अंजान हो
सत्ता सुख…….

सपना सक्सेना
ग्रेटर नोएडा

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