टूटना

कुछ चीजें
अक्सर टूट जाया करती हैं
जैसे टूट जाते हैं
खिड़कियों के काँच
जैसे टूट जाते हैं
किमती कप और प्यालियाँ
जैसे टूट जाते हैं
डालियों से हरे पत्ते
जैसे टूट जाया करती हैं
आसमान से बिजलियाँ
वैसे ही कुछ
टूट जाता है इंसान
इंसान का टूटना
काँच, कप, पत्ते या कि
बिजलियों जैसा नहीं है
क्योंकि जब चीजें टूटती हैं
तो दूसरी मिलने या जुड़ने की
सम्भावना भी की जा सकती है
लेकिन जब इंसान टूटता है
तो उसके टूटने का दुख
उसके अंतःकरण में घर कर जाता है
जिसे मिटा पाना सम्भव तो होता है
लेकिन बहुत ही मुश्किल भी l

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