ये चश्मे चिराग बुझे ,महफ़िल में अँधेरा हो गया,

जिंदगी का तार टूट गया और तराना सो गया .

अब कहाँ जाए तेरे उम्दा गीतों को चाहने वाले ,

गीतों का दरवेश /राजकुमार जो खामोश हो गया .

जो होता था कभी महफ़िल की जान औ रौनक ,

वोह अब महफ़िल को सुनी कर छोड़ गया .

इंसानी ज़ज्बातों को जिसकी कलम ने यूँ छुआ ,

के हर इंसान के दिल की आवाज़ वोह बन गया .

हिंदी और उर्दू का अनूठा संगम करवाता नीरज,

खुद  इश्क-ऐ- हक़ीकी से  एकाकार  हो गया.

रहेगी जब तक यह दुनिया ,तेरा नाम अमर रहेगा ,

तेरे नगमो का रंग इस कदर हमारे जीवन में घुल गया.

 

 

 

Leave a Reply

WordPress spam blocked by CleanTalk.