जाने कैसे होंगे वो लोग
जो अपना घर छोड़ जाते है
हरी भरी वादियों से भरा
अपना वतन छोड़ जाते है

देखता हूँ जब उजड़े गॉवो को
जाने क्यों आता है रोना
पता नही क्यो हमेशा
याद आता है गॉव का कोना

जब सोचता हूँ गॉव को छोड़ने
वालो के बारे में
एक ही सवाल आता है मन में
बार बार
आखिर क्यों गॉव छोड़ जाते है लोग

आपने इन्ही सवालो की खोज में
शोक संतप्त मैं
मिलता हूँ गॉव को छोड़कर आये
रामू से , मोहन से और बूढ़े काका से
देखता हूं उनका उदास चेहरा
आँशु से भारी डबडबायी आँखे

धूल भरे गर्द में खाँसते
कराहते बोलते है
बूढे काका – कौन चाहता है ?
छोड़कर आना अपना
घर , बार और द्वार

जीवन की आस
पानी की प्यास और
भूख से कुलबुलाते पेट की आवाज
मजबूर करती है हमें
छोड़ने को अपना
घर , गॉव और देश

सुनकर उनकी बात
गहरे , कही गहरे
सोच मे डूब जाता हूँ मैं
घर , गॉव से दूर होते समाज के
बारे में सोचता हूँ

भूख के लिए वो सिर्फ अपना घर नही छोड़ते
छोड़ते है आपनी भाषा
भुल्ला भुल्ली का प्यार
और गॉव का हर त्योहार
छोड़ते है वो
अपने रीति रिवाज
धाप की ताल और ढोलक का धाप

आखिर क्यों नही करती सरकार कुछ ऐसा
ना छोड़ना पड़े हमें अपना गॉव
अपने रीति रिवाज ??
आखिर क्यों नही करता कोई
ऐसा
की फिर से आ सके मेरे गॉव में खुशहाली
फिर मना सके हम अपने दोस्तों संग दीवाली
आखिर क्यों ?

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