आलोचना साहित्य की धड़कन कही जाती है और उस आलोचना की प्रत्यालोचना किसी बर्फीले पहाड़ की चढ़ाई से कम साहसिक नहीं होती । मैंने इसी प्रत्यालोचना रूपी पहाड़ पर चढने की कोशिश की है । मेरी दृष्टि में डॉ रामविलास शर्मा के तीन केन्द्र दिखाई पड़ते हैं -पहला,किसी के साहित्य की आलोचना ;दूसरा, किसी साहित्यिक धाराप्रवाह या उस युग की साहित्यिक उपलब्धियों की आलोचना;तीसरा, इतिहास और परंपरा को केन्द्र में रखकर जनवादी दृष्टि से समाज और साहित्य की तर्कोचित आलोचना । डॉ रामविलास शर्मा के आलोचना साहित्य में ये तीनों ही बिन्दु कहीँ -न-कहीं से आपस में परस्पर अनुस्यूत हैं । मैंने पाया है कि डॉ रामविलास शर्मा का आलोचक व्यक्तित्व मार्क्सवादी मान्यताओं को उसकी कट्टरता में स्वीकार नहीं करके उसकी सहजता को स्वीकार कर चलने के पक्ष में है और इस कारण उनका ऐसा आलोचना साहित्य उठे हुए और उठते हुए अनेक विवादों और विसंगतियों को स्वतः शांत कर देता है । इस दृष्टि से उनका आलोच्य विषय का विश्लेषण आमतौर पर देखी जाने वाली जनवाद के अंतर्द्वंद्व और अंतर्विरोध से मुक्त है । वह ऐतिहासिक दृष्टि को संगति प्रदान करने के पक्ष में है , अंतहीन राजनैतिक दृष्टि के ऊहापोह से मुक्ति पाने के पक्ष में है ।
– डॉ यशवंत कुमार दास

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