आजकल बहुत  उबने लगी हूँ मैं ,

हर दिन ,हर रात ,हर पल से  उबने

लगी हूँ मैं.

जाने यह सुबह क्यों होती है ?

यह रात क्यों  होती है ?

कोई उत्साह नहीं ,कोई जोश भी नहीं ,

अपने उबायु  दिन -रात से उबने लगी हूँ मैं .

अपनी दिनचर्या क्या है ,आखिर !

रोज़- रोज़ खाना बनाना ,घर संभालना ,

आते-जाते  बिना बुलये ,कभी बुलाये गए मेहमानों की सेवा ,

इन फर्जों /जिम्मेदारिओं  से उबने लगी हूँ मैं.

समय ही कहाँ है मेरे पास खुद अपने लिए ,

और कुछ यदि थोडा सा मिले भी तो ,

क्या करूँ ? क्या न करू ?

कुछ पुस्तकें पढूं ,या टीवी देखूं ,

समाचार पत्र पढूं ,

पुस्तकें भी मेरा जी नहीं बहलाती ,

और  टीवी और समाचार पत्र की  रोज़-रोज़ की अपराधिक

/घोटालों की  ख़बरों से उबने लगी हूँ मैं.

मुझे तो अपने आस-पास के लोगों से ही कोफ़्त होने लगी है

कितने ज़ायेदा  खुश्क हैं, और ज़रूरत से ज़ायेदा व्यवहारिक भी .

ना निष्कपट ,निस्वार्थ प्रेम ,लगाव और अपनापन ,

ना   ही मुलाक़ात में  वोह गर्म जोशी .

ऐसे खुश्क ,कठोर , व्यवहारिक लोगों से ,

उबने लगी हूँ मैं.

क्या करें आखिर इस जिंदगी का ?

जो एक ही धूरी  पर घूम रही है.

ना किसी किस्म का बदलाव  ना इश्वरिये चमत्कार ,

बस खुद को किसी तरह खिंच रही है.

अपने को ज़बरदस्ती लादे हुए  क्यों?

अंततः अपनी इस उबायु जिंदगी से ही उबने लगी हूँ मैं.

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