सुनो ओ  पुरुष !

                                                                                                                                                                        तुम्हें  मैं दिखाई देती हूँ  बस एक औरत .

तुम्हें मात्र मुझे समझते हो एक जिस्म .

मगर  इस जिस्म में एक रूह भी है ,

एक  जज्बातों से भरा दिल है,

एक विचारशील  दिमाग है,

मैं एक मात्र जिस्म नहीं ,

मुझमें है एक पूरा वजूद .

मैं  एक इंसान हूँ, तुम्हारी तरह,

बल्कि यूँ कहो ,तुमसे बढ़कर.

मैं तुमसे किसी मायनो में कम नहीं हूँ.

किसी बात में कम नहीं हूँ.

शिक्षा -दीक्षा, कला-कौशल ,

खेल- राजनीति ,वाणिज्य आदि .

तुम सब जानते हो.

मगर मुझे पहचानते नहीं .

तुम मुझे  घूरते हो बेशक ,

मगर देखते नहीं.

शायद तुम देखना चाहते भी नहीं.

क्योंकि यदि तुमने मुझे देखा ,

तो खुद को बहुत छोटा पायोगे.

तुम नहीं समझना चाहते मुझे  इंसान .

तुम नहीं देखना चाहते  मुझे अपने से आए बढ़ता हुआ .

तभी तुमने कई ज़मानों से मेरे लिए  साजिशों का जाल बिछाया.

कभी चरित्र  पर दोष लगाकर ,

तो कभी  समाज की  बेड़ियों में मुझे बंधवाया.

घर की चार-दिवारी मैं, काल-कोठरी में बंद करवाया ,

क्योंकि तुमने मुझे समझा बस  कमज़ोर ,लाचार औरत ,

जिसपर कोई सितम बरपाया जा सकता ही.

तुमने समझ मुझे एक जिस्म.

जिसे अपनी हवस पूरी करने का साधन  बनाया जा सकता है.

औरत चाहे किसी भी उम्र की हो ,

उसे  इस्तेमाल करके ,क्षत -विक्षत करके ,

अधमरी अवस्था में नाले/नदी  में फेंका जा सकता है  .

अपने गुनाहों से छुटकारा पाने  केलिए ,

हर तरह से एक औरत का वजूद ख़त्म किया जा सकता है.

सच में पुरुष !  हम तुम्हें मान गए .

तुम ईमान से किस हद तक गिर सकते हो ,

हम जान गए.

तुम  भले  ही  पहले कभी थे,दम्भी ,पाखंडी,लालची, धोखेबाज़,

और शैतान .

मगर तुमने इस  नए युग में कर लिया बहुत विकास .

इंसान से  हैवान ,.. दरिन्दे… वेह्शी … खूंखार भेड़िया !

क्या खूब किया तुमने विकास .

बधाई हो ! की तुम्हारी  गन्दी / ओछी /घिनोनी सोच को

बदलनेवाला अब तक पैदा नहीं हुआ.

कयामत तक तुम हमें समझते  रहोगे हमें मात्र जिस्म.

अपनी क्षणिक मगर प्रचंड  दरिंदगी/बलात्कार  को  अंजाम देने हेतु केवल साधन मात्र.

एक निरीह , भाग्यहीन ,कमज़ोर, लाचार  जिस्म .

 

 

 

 

 

 

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