मैं … ( एक गृहणी की डायरी )

मैं … ( एक गृहणी की डायरी )

कविता
मैं  हूँ  नारी , भावनाओं से भरी , आँचल  में ममता और , आँखों में भरे आंसुओं की गगरी . मैं एक  माँ  हूँ , प्रतिपल जो रहे  , अपनी संतान के लिए जीती . उनकी चिंता में घुली-घुली सी , जब तक सुरक्षित घर ना लौट आये , तब तक रहती हूँ सब -कुछ भूली-भूली सी. चाहे कुछ भी मिले संतान से , उपेक्षा /प्यार /सम्मान. और यदि ना भी मिले कुछ , तो भी ! निस्वार्थ सेवा /प्रेम /ममता में सलग्न अपने कर्तव्य  से रहती हूँ बंधी-बंधी सी. मेरी तो बस एक ही आशा , और एक ही अरमां. मेरी संतान  सफलता के शिखर  को छुए,                                                                                                                                                          भले ही फिर शिखर  पर पहुँच कर मुझे भूल जाये . मैं हूँ  एक पत्नी भी . दिल में अगाध पति-प्रेम…
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दूर नहीं

दूर नहीं

लघुकथा
    मालिनी शाम के भोजन की तैयारी करके बाल्कनी में बैठकर बाजू के पैड पर बने घौंसले में से उड़ाउड़ कर रहे पक्षी के बच्चे देख मुस्कुरा उठी।फिर सोचने लगी,ये तो प्रकृति का नियम है बड़े होते ही बच्चे उड़कर अपना नया जहॉं बसा लेते है।लेकिन, उसका घौसला तो छोटा है इसलिए ....यहाँ तो इतना बड़ा घर है ,बेटा पढाई के बाद अमरीका में ही सेट हो गया और बेटी ससुराल में है। डोरबेल की आवाज़ आयी और जल्दी से दरवाज़ा खोलते ही सामने उसके पति सोमन को एक हाथ मे बैग और मिठाई लिए मुस्कुराता हुआ खड़ा देख फिर पुलकित हो गयी। "देखो,मेरा रिपोर्ट क्लियर है तो ये पिस्ता डायमंड केक आज जमकर खानेवाला हुँ,तुम्हारी ये आयुर्वेदिक दवाइयाँ भी लाया हुँ" थोड़ी देर दोनों बातें करते बैठे रहे,…
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अनुभूति

अनुभूति

कविता
अस्तित्व... मैंने जब भी सूना है की ईश्वर है, मन की आशाओ ने कुछ और जिया है, हर एक इंसान में महसूस किया है किसी अनजान अस्तित्वको, बातो में निकलती दुवाओ में, कभी माँ की हथेलियों में, पापा के मश्वरो में, भाई के राखी बंधे हाथो मे, बहन की जप्पियो में, भाभी की बातो में दोस्तों की महफ़िलो में, प्यारभरे उन लम्हो में किसी की मुस्कानों में, किसी की आँखों के दर्द में... कुदरत की बनायी सभी रचनाये कर रही हे प्रेरित, उस अस्तित्व की उष्मा को अपने अंदर सहेजकर एक ओर नया जीवन जीने की तमन्ना को जीवित कर लेती हूँँ। -मनीषा 'जोबन'
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समझौता

समझौता

कहानी
समझौता अभी तो सुबह के ८-३० हुए थे। जल्दी तैयार होकर नित्या एक्स्ट्रा क्लास के लिए अपनी कार लेकर निकल ही रही थी कि रीमा आंटी और उनकी बड़ी बहूॅं सब्जी ले रहे थे ,उनको 'गुड़ मोर्निग' कहकर बातें करने खड़ी रही। ' क्यों आज जल्दी जा रही हो? " हां, ट्राफीक की वजह से पहूॅंचने में शायद देर हो जाये, एक्स्ट्रा क्लास ऐटेन्ड करनी है। ' 'अब ओर कितना पढोगी? शादी करनी है कि नहीं?' कहेते हूऐ रीमा आंटी हँसते देख रही थी। और हॅंसकर बाय कहते हूऐ वापस आगे जाते हुऐ सोचने लगी, लडकियों के बारे में सबको शादी की ही फिक्र लगी रहेगी है, मम्मी भी सब की बातें सुनकर यही फिक्र में रहती है कि अच्छे लड़के हाथ से निकल जायेंगे, नित्या को पता था कि…
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जनकृति (बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका) का नवीन अंक प्रकाशित

जनकृति (बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका) का नवीन अंक प्रकाशित

पत्रिकाएँ
आप सभी मित्रों को हर्ष के साथ सूचित किया जाता है कि जनकृति (बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका) का नवीन अंक प्रकाशित कर दिया गया है. यह अंक आप नीचे दिए लिंक पर जाकर प्राप्त कर सकते हैं- [https://drive.google.com/…/1JExTtHt_UAYwGw1DzJlf86dyjBqlSP…/] इस अंक में आप विविध क्षेत्रों के नवीन विषयों को पढ़ सकेंगे. पत्रिका में साहित्यिक रचनाओं के साथ साहित्य, कला, मीडिया, शिक्षा, इतिहास, राजनीति इत्यादि से जुड़े विषयों के साथ-साथ समसमायिक विषयों पर भी लेख एवं शोध आलेख पढ़ सकते हैं. कृपया अंक की सूचना को अपने मित्रों तक भी पहुंचाएं ताकि अधिकाधिक लेखकों को मंच का लाभ मिल सके. इसके अतिरिक्त यदि आप पत्रिका में लिखना चाहते हैं तो हमें यूनिकोड फॉण्ट में jankritipatrika@gmail.com पर मेल करें. आप यदि शोध आलेख संबंधी नियम एवं अन्य कोई भी जानकारी चाहते हैं तो www.jankritipatrika.inपर…
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