ललित निबंध पठकीय एवं समीक्षकीय तैयारी की माँग करता है – डॉ. श्यामसुंदर दुबे

सर्जनात्‍मक एवं आलोचनात्‍मक लेखन के क्षेत्र में कार्यरत लोक-मानस के मर्मज्ञ लेखक डॉ. श्‍याम सुंदर दुबे एक महत्‍वपूर्ण हस्‍ताक्षर के तौर पर मौजूदगी दर्ज कराते हैं। डॉ. श्‍याम सुंदर दुबे का जन्म 12 दिसम्बर, 1944 को हुआ। व हिंदी के प्रमुख ललितकारों में एक हैं । कविता, कथा, उपन्‍यास, नवगीत, समीक्षा, आलोचना इनके अध्‍ययन एवं रचनाकर्म की प्रमुख विधाएँ हैं। डॉ. दुबे के लेखन में लोक-परंपरा अपनी सामाजिक और सांस्‍कृतिक छवियों की अंतरंगता के साथ जुड़ी है। इनके ललित निबंधों और कविताओं में लोक का खिलखिलाती हुई दुनिया दिखती है । सभी प्रमुख विधाओं में अब तक डॉ. दुबे की 30 से अधिक पुस्‍तकें प्रकाशित हैं। आपके सर्जनात्‍मक कार्य पर अनेक शोध कार्य भी संपन्‍न हो चुके हैं। डॉ. दुबे को उनके रचनात्मक साहित्यिक अवदान के लिए मध्‍य प्रदेश साहित्‍य अकादेमी ने बालकृष्‍ण शर्मा ‘नवीन’ एवं आचार्य नंददुलारे वाजपेयी पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया है। इसके अतिरिक्‍त इन्‍हें अखिल भारतीय डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत पुरस्‍कार, छत्‍तीसगढ़ का सृजन सम्‍मान एवं श्रेष्‍ठ कला आचार्य सम्‍मान प्राप्‍त है। डॉ. श्‍याम सुंदर दुबे को उनकी विशिष्‍ट साहित्यिक सेवाओं के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान के सुब्रह्मण्‍य भारती पुरस्‍कार से भी पुरस्‍कृत किया जा चुका है । वे संप्रति मुक्तिबोध साहित्य सृजन पीठ डॉ. हरिसिंह गौर विश्विद्यालय सागर के निदेशक के पद पर कार्यरत हैं ।

उनसे लुप्तप्रायः किन्तु हिंदी की महत्वपूर्ण विधा पर लंबी बातचीत की है युवा कवि, ललित निबंधकार और समीक्षक जयप्रकाश मानस ने : संपादक

 

मानस – आपकी रचनाधर्मिता का प्रेरक तत्व क्या है? ललित निबंध के साथ कई विडम्बनाएँ रही हैं- अल्पसंख्यक पाठक, प्रकाशन हेतु पत्रिका संपादक का अपना पूर्वाग्रह, समीक्षकों एवं कतिपय महापुरुष साहित्यकारों की घनघोर उपेक्षा । इतनी सारी चुनौतियों के बावजूद आप ललित निबंध से कैसे जुड़े ?

 दुबे जी – मेरी रचना का प्रेरक तत्व मनुष्य और प्रकृति के बीच समाया वह सौंदर्य है, जिसमें अपनी संपूर्ण दुर्बलताओं में भी मनुष्य सुंदर लगता है । क्योंकि वह यह जानता है कि इन दुर्बलताओं से उसे कैसे मुक्त होना है । प्रकृति के आंतरिक सत्य को कैसे अन्वेषित करके अपने समूचे विकास के लिए उसे अंगीकार करना है, सृष्टि की संवेदना प्रणाली में मनुष्य की सत्यान्वेषी दृष्टि ने जो कुछ भी तलाशा है वह मुझे प्रेरणा देता है ।

ललित निबंध के पाठक ज़रूर सीमित संख्या में हैं, संपादकों और समीक्षकों के पूर्वाग्रह और उपेक्षाएँ भी इस विधा के लोकव्यापीकरण में बाधक तत्व हैं, फिर भी ललित निबंध लिखा जा रहा है । इधर ललित निबंध के लेखकों की संख्या बढ़ी है । यह विधा कभी भी लोकप्रिय विधा की तरह प्रतिष्ठित नहीं रही है । यही इसकी ताकत भी है । ललित निबंध पाठकीय और समीक्षकीय तैयारी की माँग करता है । इसे पढ़ने के लिए संस्कार सिद्ध होना ज़रूरी है । जाहिर है कि ललित निबंध का आस्वादन पाठकीय विदग्धता की उत्तरोत्तरता पर निर्भर है । इधर जन साहित्य के जनरुचि प्रधान लेखन में ही लोगों की रुचि समाप्त हो रही है। तब ललित निबंध की पाठक संख्या का और सीमित होना चिंतनीय नहीं है । संपादक और समीक्षक ललित निबंध की पाठकीय क्षमताओं से अप्रभावित नहीं रह सकते हैं । फिर इनके पूर्वाग्रह और इनकी उपेक्षायें ललित निबंध के प्रति ही क्यों ? समस्त रचनात्मक अवदा के प्रति इनकी शिविरबद्धता है । हाँ, ललित निबंध के रचनाकार की अपनी कुछ सीमाएँ और कमजोरियाँ भी हैं- अन्यथा ‘तुलसी साँचे सूर को बैरी करत बखान ।’

ललित निबंध एक ऐसी विधा है जो अपनी क्षमता के बल पर सबके सिर पर बोलने लगती है । मैं ललित निबंध के इसी सर्वोत्तम को पाने की चेष्टा में संलग्न हूँ । फिर मैं समीक्षकों और संपादकों की चिंता क्यों करूँ ?  उन्हें मेरी रचनाएँ पसंद आती हैं तो मैं अपनी रचनात्मकता के प्रति आश्वस्त होता हूँ । पाठकों की विरलता भी उस समय नहीं सालती जब एक समझदार पाठक की कभी जानदार प्रतिक्रिया प्राप्त हो जाती है । मैं निबंध की अनेक भंगिमाओं में ललित की तलाश के लिए भी क्रियाशील हूँ । इसलिए मुझे नहीं लगता कि पाठकीय प्रतिक्रियाओं की कोताही मेरे सामने है । चुनौतियाँ ही तो लेखन को माँजती हैं । मैं सतत हूँ संपूर्ण नहीं । इसलिए शक्ति अर्जित करता रहता हूँ और लेखन के नये आयामों से जुड़ने की चेष्टा करता रहता हूँ । उसका आनंद भी लेता हूँ ।

 मानस – आप जिस साँस्कृतिक चेतना को अपना प्रतिपाद्य बनाते हैं वे लोक, आंचलिकता या लोक धर्म के विषय हैं । आप अपने ललित निबंधों को अन्य ललित निबंधकारों से कैसे भिन्न देखते हैं ? इन दिनों आप नया क्या रच रहे हैं ?

 दुबे जी – मेरी सांस्कृतिक चेतना का निर्माण लोक की संवेदना और लोक के व्यवहार के बीच से ही हुआ है । पारिवारिक पृष्ठभूमि वैदिक पंरपरा की थी और मेरा मानस – लोक की गिरफ्त में था । इसलिए आधारभूमि तो आर्षचेतना से उर्वर रही, किन्तु लोक का पादप ही इस पर उत्फुल्ल हुआ ।

लोक मेरे ललित निबंधों की आंतरिक शक्ति है । मैंने लोक को सीधे-सीधे नहीं लिया है । उसकी निरंतर अमृता शक्ति को अपनी समसायिकता की प्राण-उर्जा बनाकर ही ग्रहण किया है । इसलिए लोक मेरे निबंधों में आख्यान के बतौर नहीं शक्ति संधान की तरह आया है । जीवन के शाश्वत की तलाश मैंने लोक के भीतर से ही की है । मेरे ललित निबंध अन्य निबंधकारों से क्या भिन्नता रखते हैं, ये बताना मेरे लिए कठिन है । प्रयास यही रहा है कि पंरपरा में प्रविष्ठि ही नहीं पाऊँ, उसे प्रेरित भी करूँ । आधुनिक संवेदना जो हमारी भारतीय दृष्टि में समाहित होने के लिए एक आक्रमण की तरह उद्यत है को कैसे भारतीय रुख में ढालूँ और उसे अपनी तरह प्रयोजनीय बनाऊँ । ये मेरी रचनात्मकता कशमकश का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यही शायद मुझे अन्य निबंधकारों से विलगाने का जरिया बन जाए । फिलवक्त तो मैं इस कोशिश में हूँ कि भीड़ में एक टमकता हिस्सा ज़रूर बनूँ । मेरे संग्रह गिनती में अधिक नहीं हैं लेकिन जो हैं उनमें मेरा विकसित स्वरूप ही संग्रहित है । इस विकास में वे स्फुरणाएँ भी सक्रिय हैं जो मुझे अपने समय के ललित निबंधकारों से कुछ भिन्न बनाती हैं । जैसे भाषिक स्तर पर मैंने संप्रेषणीयता की ताकत को अपनी ताकत बनाना चाहा है । कविता बनते जा रहे ललित निबंध की भाषा को आमफहम बोलचाल की भाषा देने की चेष्टा मेरी प्राथमिकी रही है । इसलिए ललित निबंधों की रचना रुक-रुककर ही होती है । गोया निबंध लिखता ही रहता हूँ और जो भी निबंध लिखता हूँ उसे ललित बनाने की कोशिश की गुंजिश बनाकर ही चलता हूँ ।

 मानस – ललित निबंध को आप किन शब्दों में परिभाषित करना चाहेंगे ? कोई इसे व्यक्तिव्यंजक निबंध कहता है, कोई रम्य रचना । आपका व्यक्तिगत अभिमत क्या है ?

 दुबे जी –  अब ललित निबंध नाम ही सार्थक और सर्वस्वीकृत है । इसलिए अन्य नामों के पचड़े में न तो पड़िए न ही उसे बहस का विषय बनाइए । निबंध वैसे ही परिभाषाओं में अटने वाला कभी नहीं रहा । ललित निबंध तो और अड़ियल है । इसे बाँधकर रखना संभव नहीं है । मानसिक ऊर्जा को एक संक्षिप्त गद्य रचना में अनेक विधा भंगिमा की तरह समेटकर उत्तेजक भावप्रवणता में जिस रचनात्मकता को पकाया जाकर आविष्कृत किया जाता है, वही ललित निबंध है । व्यक्ति व्यंजकता निबंध का एक लक्षण है । ललित निबंध में वह समाहित है । ललित निबंध न केवल रम्य है और न केवल व्यक्ति व्यंजक । वह व्यक्ति की सीमाओं का उन्मुखीकरण भी है और रम्य का विलोमी जुगुप्सा प्रेरक भी । उसकी हजार रंगतें हैं इसलिए उसे ललित ही कहा जा सकता है । ललित में चेतना का सौंदर्य समाहित है । वह रूढ़ अर्थों में ललित नहीं है । इस सौंदर्य में तमाम तरह के जीवन-बोध है जो अपनी कहन में क्रोधित, संबोधित, अनुरंजित करने की क्षमताएँ रखता है ।

मानस – हिन्दी ललित निबंधों की परंपरा को आप किस रूप में देखते हैं ?

दुबे जी – हिन्दी ललित निबंधों की पंरपरा एक तरह से निबंध की ही परंपरा है । भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग की निबंधात्मक रचनाएं ललित निबंध का मुकम्मल प्रस्थान हैं । भाषा भंगिमा, विषय-वस्तु का जितना प्रीतिकर, उत्तेजक और व्यापक रुप भारतेन्दु युग ने निबंध को दिया, बाद का निबंध उससे भी और अपनी पंरपरा से भी विमुख होता गया और सिमटता गया । यहीं से तथा इसी स्खलन से पाठक की संलग्नता भी निबंध से कम हुई । बाद में ललित निबंध भाषा के लौह कवच में आत्मालाप का सांस्कृतिक प्रलाप बनता रहा है । यदि व्यंग्य और संस्मरणपरक विस्तार को भी ललित निबंध में अवकाश दिया जाता रहता तो ललित निबंध का आज अलग व्यक्तित्व होता । अब यदि ललित निबंध की सीमाओं में इस विस्तार को नहीं लिया गया तो ललित निबंध स्थगित विधा बन जाएगी ।

 मानस – ललित निबंध में कितना ललित और कितना निबध होता है ?  अवधारणाओं को स्पष्ट कीजिए ना ।

दुबे जी – ललित निबंध में ललित और निबंध को विलगाकर नहीं देखा जा सकता है । जो स्पष्ट करता है कि ‘ललित’ निबंध का विशेषण नहीं है स्वयं संज्ञा है किंतु ललित शब्द-कोषीय अर्थ में यहाँ अर्थ नहीं देता वह एक तरह का जीवन बोध है । इस जीवन बोध में जीवन के प्रति आसक्ति और जीवन की सुंदरता का आभास ही अधिक है । जीवन की मूल्यवत्ता और जीवन की अर्थवत्ता ही ललित का केंद्रीय प्रयोजन है ।

 मानस – निबंध और ललित निबंध के मध्य आप विभाजन की कैसी रेखा खींचना चाहेगे ?

 दुबे जी – ज्ञानतंत्र और सूचनात्मक श्रेणी में आने वाले निबंधों से, ललित निबंध जीवन-ऊष्मा से परिप्लावित अपनी संवेदनात्मक भाषा में विचार की संप्रेषणीयता के केन्द्र में है ।

 मानस – ललित निबंधकार होना नास्टेलजिक होना भी होता है । प्रगतिकामी (?) आलोचकों के प्रश्न पर आपका जबाब क्या होगा ?

 दुबे जी – ललित निबंधकार नास्टेलजिक होगा तो कल रोएगा-गाएगा । आह-वाह में फँसा रहेगा । नास्टेलजिक हुए बिना रचना संभव ही नहीं होती है किंतु यह नास्टेलजिक आत्मरक्षण का आधार नहीं होना चाहिए । अतीतजीवी वृद्ध होते हैं । बालक और युवा भी नास्टेलजिक होते हैं । उनकी ऊर्जा अतीत की स्मृतियों को लाँघती भी हैं । अपने को निरंतर अतिक्रांत करने की ताकत ही रचना को रचना बनाती है । कौन-सी रचना है जो नास्टेलजिक न पालती हो । कथा-कविता सभी में यह होता है किंतु रचना के विभिन्न स्तरों पर वह सक्रिय होते भी दिखता नहीं है । यही तो मिथक है जो छिपा रहकर भी अपने अनंत अर्थ खोलता है । नास्टेलजिया ऊपर आया और आह-वाह में बदला । प्रगतिकामी भी नास्टेलजिया को जीते ही हैं । बिना इसके कुछ प्रगति नहीं है ।

 मानस – संस्कृत के कुछ श्लोक, लोक के कुछ छंद, ग्राम्य-स्मरण, कुछ निजी या आत्मीय प्रसंग, कुछ सरल उद्धरण और कुछ सरस उदाहरण के संग्रह-संयोजन को ललित निबंध का फ़ार्मूला बनाने के आरोप लगते रहें हैं, क्या इनके अलावा ललित निबंध रचा जा सकता है ?

 दुबे जी – ललित निबंध के लिए जो कच्चा माल आपने परिगणित किया है, वह दरअसल कच्चा माल ही है । उसे पक्का बनाने का दायित्व तो ललित निबंधकार पर जाता है । भानुमति का कुनबा जोड़कर ललित निबंध नहीं रचा जा सकता है । इधर यह प्रवृति ललित निबंध की हानि ही दर्शाती है । ललित निबंध की व्यास शैली कथावाचक की शैली नहीं है । कोई भी रचना फ़ार्मूला में जीवित नहीं रहती है वह मर जाती है । तमाम तरह की सामग्री ललित निबंध को अपेक्षित है । उसे अपनी कद-काठी में लाने के लिए तमाम तरह की काँट-छाँट करना पड़ेगी ताकि वह मिश्रण न होकर यौगिक बन जाए । ललित निबंध में विद्वत्ता प्रदर्शन दोष है- जो विद्वान थे वे यह भी जानते थे कि विद्वत्ता को कैसे गलाया जाता है । जब विद्वत्ता गलती है तब उसे सम्हालने के लिए व्यक्तित्व की द्रोणी अपेक्षित होती है । कमजोर व्यक्तित्व इस गलन को नहीं थाम सकते हैं । अब विद्वानों का टोटा है और ललित निबंधकार अपने को गलाना नहीं जान पा रहे हैं । जो थोड़ा बहुत गल पा रहे हैं उनमें उसके धारण की क्षमता भी प्रश्नांकित है । इसलिए कच्चामाल कच्चा माल जैसा रचना में दिखता रहता है । ललित निबंध इसीलिए जटिल रचना विधा है ।

 मानस – ललित निबंध एक स्वतंत्र विधा है पर इसमें काव्य की विभिन्न विधाओं की उपस्थिति संभव है । यह ललित निबंध का सामर्थ्य है या भटकाव ?

 दुबे जी – ललित निबंध में कविता की मात्रा बढ़ जाने पर वह कविता ही हो जाता है । यह ललित निबंध के लिए खतरा है । अक्सर पहले कविता लिखने वाले या समांतर क्रम में कविता लिखने वाले ही आज के ललित निबंधकार अधिक हैं । इसलिए कविता की खींचतान ललित निबंध में हो जाती है । जबकि कविता की कल्पना और कविता की आशक्ति ललित निबंध में गुपचुप तरीके से यदाकदा आना चाहिए, कविता ललित निबंध के स्वर्णाभूषण का सुहाग बनकर आए तो ललित निबंध का वैचारिक जोड़ अपनी रसमयता से निबंध की समग्रता में उचट्टा नहीं दे पाएगा । यदि निबंध कविता बन रहा है तो वह निबंध हो ही नहीं सकता है । यह निबंध की सामर्थ्य कदापि नहीं है । फिर तो कविता ही लिखी जाना चाहिए, निबंध के स्थान पर ।

 मानस – ललित निबंधों में विभिन्न विधाओं के समन्वय की सहमति के बाद भी गुलाबराय, दिनकर, विनोबा भावे, वियोगी हरि आदि के निबंध का जिक्र सामान्यतः क्यों नहीं होता ?

 दुबे जी – गुलाबराय, दिनकर, विनोबा भावे, वियोगी हरि की गणना होना चाहिए । विनोबा भावे को मराणी में सक्रिय व्यक्तित्व मानकर छोड़ा जा सकता है किन्तु अन्य तीन तो ज़रूर लिये जाना चाहिए । इनमें ललित निबंध के लक्षण हैं । इन्हें छोड़कर ललित निबंध की परंपरा को नहीं समझा जा सकता है ।

मानस – ललित निबंधों के मूल विषयों में लोक भी है । फिर ललित निबंधकारों के यहाँ व्यंग्य को लेकर कोई परहेज भी नहीं, ऐसे में क्या लोक-यथार्थ को व्यंग्य विधा में अभिव्यक्त करने वाले य़था- परसाई, शरद जोशी आदि की रचनाओं को ललित निबंधों की परिधि में नहीं समेटा जा सकता है ?

दुबे जी – व्यंग्य विधा को ललित निबंध में समेट लेने पर व्यंग्यकार क्या करेंगे ? वे अभी अपनी स्वतंत्र इयत्ता के लिए जद्दोजहद कर रहें हैं । वे ललित निबंध में आना ही नहीं चाहेंगे । हाँ, ललित निबंधकार अपनी सीमाओं में उन्हें खोल सकता है । किन्तु व्यंग्य ललित निबंध में एकदम खुला हुआ नहीं है । व्यंग्य सपाट भी होता है जो केवल अपने सर्वांग में व्यंग्य ही होता है । कभी-कभी अपनी निर्लज्जता में वह बखिया की जगह चमड़ी भी उधेड़ जाता है । असल व्यंग्य अपनी मारक शक्ति में क्रूर और अचूक होता है । वह केवल व्यंग्य होता है कुछ और नहीं । ललित निबंध इस तेवर में नहीं आ सकता है । इसलिए हरिशंकर परसाई और शरद जोशी में ललित के लक्षण मिल सकते हैं किन्तु वे ललित निबंधकार नहीं हो सकते हैं । उनकी शैली और कहन की सूक्ष्मता लेकर ललित निबंध बढ़े तो उसकी सामाजिक स्वीकृति बढ़ेगी । इस ज़मीन पर ललित निबंध अपनी रूढ़ि को भंग कर सकता है ।

 

मानस – ललित निबंधकार की सामान्य रचना प्रक्रिया पर आपकी टिप्पणी क्या होगी ? इसमें हिन्दी समाज, उसकी संस्कृति, उसकी विकृति या नित बदलती दुनिया की क्या भूमिका होती है ? क्या इस रचना प्रक्रिया को हम श्यामसुंदर दुबे की रचना प्रक्रिया मान सकते हैं, या आपकी रचना प्रक्रिया कुछ भिन्न है ?

दुबे जी – ललित निबंधकार की रचना प्रक्रिया उसकी जीवन शैली है । वह छद्म नहीं पाल सकता है । जैसा जीवन वैसा लेखन । इसका कारण यह है कि ललित निबंध स्व और पर का साझा आस्वादन है । न केवल साझा आस्वादन बल्कि स्व को बार-बार रीता करना भी है । अपने को जितना रीता करते जाओगे उतना ‘पर’ उमड़-उमड़कर आपके भीतर भरता जाएगा । जब यह छलकने लगे तब ललित निबंध होता है । यह आत्मव्यंजकता निरंतर अपने को पर से भरते जाने वाली है । ललित निबंध यदि विचार बनाकर पूर्ण तैयारी के आधार पर लिखा जाएगा तो वह विमर्श बन जाएगा । ललित निबंध में ध्रुव विषय होता है किन्तु यह इतना घुल जाता है कि वह अवांतर से भी झलक मारता रहता है । भाषा की लय में विषय का विलयन अपनी अभिव्यक्ति प्रणाली को पा लेना है । इसमें संस्कृति, विकृति और कृति सभी का इस तरह समावेश होता है कि उसके भीतर हम अपने समय-सत्य को पा सकें । इसीलिए ललित निबंध पलायन नहीं बल्कि समय का सामना है । बदलती दुनिया को ललित निबंध यदि नहीं दे पाया तो वह जीवंत कैसे रह सकेगा ?  मेरी रचना प्रक्रिया भी यही है । कभी कोई घटना, चरित्र, विचार या भाव जब गहरा ताप देने लगता है तब व्यक्तित्व में जो रीतने का विस्फार होता है उसमें तमाम जहान के आवर्त-विवर्त उठने लगते हैं । यह आवर्त-विवर्त न जाने कितने संस्कारों के उफान होते हैं । स्वयं पता नहीं चलता, लेखनी की नोक पर वह भी आ जाता है जो शायद बुलाने पर भी न आता । अब चूँकि रचना प्रक्रिया नितांत निजी चीज़ है इसलिए दूसरों की क्या है, नहीं कह सकता । कमोवेश सबकी यही होती होगी । चूँकि मैं ललित निबंध के साथ और कई विधाओं में लिखता हूँ इसलिए मैं यह भी कह सकता हूँ कि रचना प्रक्रिया मेरे तईं विधागत कर्म ही है । लगभग सभी रचनाकर्म एक-सी ही यातना, एक-से ही आनंद से उपजते हैं ।

 मानस – समकालीन हिन्दी ललित निबंध का शिल्पगत एवं भावगत चरित्र कैसा है ? आप इन्हें किस दृष्टि से देखते हैं । ललित निबंध का इतिहास लेखन अभी शेष है । आप चरित्रगत विशेषताओं के आधार पर इन्हें कैसे विभाजित करना चाहेंगे ? कुछ महत्वपूर्ण संभावनाशील रचनाकारों के विषय में कहना चाहेंगे ?

 दुबे जी – समकालीन हिन्दी ललित निबंध का शिल्पगत और भावगत चरित्र बहुत अच्छा नहीं है । ललित निबंध को किसी भी रूप में आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है । पुराने को भी साधा नहीं जा पा रहा है । कमजोर हाथों में ललित निबंध की लगाम है । मैं स्वयं अपने ललित निबंधों से असंतुष्ट हूँ । मैं ललित निबंध को डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र और डॉ. कुबेरनाथ राय की गिरफ्त से निकालना चाहता हूँ । उसे इनकी गिरफ्त से निकलता देखना चाहता हूँ । किन्तु इनसे निकलना तो दूर रहा इन तक अनुकरण के आधार पर भी पहुँचना संभव नहीं लगता है । शिल्प के नाम पर लिजलिजे पदबन्धों और बासी भाषा के करतब ही अधिक हैं । मुझे तो रीतिकाल के उस कवि की पंक्ति याद आती है जिसने कविता करने वालों को उत्तेजित करते हुए कहा था कि कविता कुछ टोटकों के सहारे नहीं चलती है । ‘लोगन कवित्त कीबौ खेलि करि जान्यौ है ।’

ललित निबंध में चाहे जो घुस रहा है । पाँचवा सवार बनने के लिए । इधर आप नज़र डालें तो प्रायः सभी विधाओं के शिल्प में कितना बन-बिगड़ रहा है । कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक में शिल्प कितना बदल रहा है- शिल्प का ढ़ाँचा बदलना भाई ! अपने को तोड़कर अपनी ही पुनर्रचना है । अंतर्ध्वंस से ही पुनर्नवा होने की संभावनाएँ बनती हैं । ललित निबंधकार बनना शौकिया होकर मजमा लगाने जैसा धंधा नहीं है । ललित निबंध के इतिहास का लेखन विधा की स्वतंत्र सत्ता पर निर्भर होता है । ललित निबंध स्वतंत्र सत्ता प्राप्त विधा है, स्फुट इतिहास लेखन हो रहा है । पहले रचनात्कता विकसित हो, इतिहास तो आ ही जाएगा । रचनात्मकता का विकास ही तो इतिहास बनाता है । कुछ अच्छे रचनाकार निबंध के इस हिस्से में क्रियाशील हैं । डॉ. श्रीराम परिहार, डॉ. अष्टभुजा शुक्ल, आप स्वयं सभी लोग अच्छा कर रहे हैं । संभावनाएँ इसलिए नज़र आ रही हैं कि ये सभी आत्मालोचन करना जानते हैं । इनमें ललित निबंध को कुछ नया देने का संकल्प है । यह तो समय ही बताएगा कि ये क्या दे पाये । इन्हें बहुत हिम्मत चाहिए अन्यथा ललित निबंध एक खाऊ ब्लेक होल है । सब गुड़गप्प होते जाएँगे । अब जैसी तैयारी ललित निबंध लेखन के लिए चाहिए उससे भिन्न भी सोचना पड़ेगा । मसलन अपनी भाषा, अपनी अभिव्यक्ति और अपने विषय चयन पर पुनर्दृष्टि डालना ही पड़ेगी ।

 मानस – ललित निबंध पर आरोप है कि उसकी प्रकृति हिन्दूवादी है । प्रगतिशील (?) विविध जुमलों से खिल्ली उड़ाते हैं ? आप उन्हें कैसे निरुत्तर करना चाहेंगे ?

 दुबे जी – ललित निबंध हिन्दूवादी है- इससे न मैं सहमत हूँ और न ही अन्य जन । ललित निबंध के लिए मनुष्य मात्र ही लक्ष्य है । उसकी संपूर्णता को परिलक्षित करना ही ललित निबंध का ध्येय है । औसत चिंतन वाले तो हर एक की खिल्ली उड़ाते हैं । मैं नहीं समझता कि प्रगतिशील जो सच्चे अर्थों में साहित्य के मर्म को जानते हैं ललित निबंध की खिल्ली उड़ाएँगे । जो खिल्ली उड़ाते हैं वे मेरी दृष्टि में चिंतनीय नहीं हैं । ललित निबंधकार को अपने रचनात्मक क्षमता से ही उन्हें निरुत्तर करना है । ललित निबंधकार इनके प्रति उत्तरदायी ही कहाँ हैं ?

मानस – क्या कारण है कि ‘अक्षत’ के अलावा हिन्दी में ललित निबंधों की श्रीवृद्धि के लिए कोई सार्थक अभियान नहीं दिखाई देता ? बड़े साहित्यिक प्रतिष्ठानों में इसे लेकर असहनीय चुप्पी है । शिक्षा के पाठ्यक्रमों में भी पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय प्रभृति विशिष्ट ललित निबंधकारों के अलावा अन्य निबंधकारों को समादृत नहीं किया जाता ।

दुबे जी – ‘अक्षत’ को परिदृश्य पर इसीलिए लाया गया था कि ललित निबंध और नवगीत जैसी अलक्षित विधाओं को मंच दिया जा सके । ‘अक्षत’ ने यह जोखिम उठाया और उठा रहा है । वातावरण बन रहा है । रचनात्मकता का अभाव है । यदि रचनात्मकता प्रबल रहेगी तो ‘अक्षत’ की भूमिका पुरस्सर करने में कोर-कसर नहीं लगाएगी । ललित निबंध को ‘अक्षत’ जैसा मंच लोक-जन तक ले जा रहा है । प्रबुद्धों की छोड़िए, यदि हमने उस लोकजन तक अपनी पैठ बना ली जिसे तुलसी, सूर, कबीर, कालीदास और घाघ-भंडुरी अभी भी याद है तो ललित निबंध का यह फैलाव होगा । नयी पीढ़ी के लिए अपनी रिक्थ से परिचित कराने का यह एक तरीका भी रहेगा । ‘अक्षत’ यह कर रहा है और भी पत्रिकाएँ ललित निबंध प्रकाशित कर रही हैं । बड़े साहित्यिक प्रतिष्ठान ललित निबंध की बात क्यों करेंगे ? उनके लाभ-लोभों का ललित निबंध भरण-पोषण कैसे कर पाएगा । ललित निबंधकारों में उदासीनता है । नकार की प्रवृति है । असंगठन है । इसी वजह से मुझे इस विधा की शक्ति पर विश्वास भी है । ये साहित्य की राजनीति की शिकार विधा नहीं है । इसलिए इसमें साधना करना आसान है । साधना को खंडित करने के अवसर इसमें कम ही हैं । बस कष्ट-कसाले सहकर भी इसमें दमखम आजमाने की ज़रूरत है । शिक्षा संस्थानों में अनुदारमना लोग बैठे हैं इसलिए पाठ्यक्रमों में नये का आना संभव नहीं है । शिक्षा से जुड़े लोग पढ़ना-लिखना छोड़कर सभी धंधे कर रहे हैं । उन्हें तो पता ही नहीं है कि क्या-क्या लिखा जा रहा है । पुराने संकलनों की भूमिका उनकी उपजीव्य है । उसी में कुछ जोड़-घटाकर तैयार कर देते हैं । शिक्षा में आने पर भी कौन सुरखाव के पर लग जाएँगे ? मैं जानता हूँ कि साहित्य का स्नातकोत्तर छात्र डॉ. द्विवेदी, डॉ. मिश्र या डॉ. राय के एक भी निबंध का नाम कायदे से नहीं जानता । पाठ्यपुस्तकें कौन पढ़ता है ? फिर नाम जुड़े या न जुड़े, क्या फर्क पड़ता है ?  समूचे साहित्य की चिंता होना चाहिए कि साहित्यकारों की गुटबाजी, लड़ाई-झगड़े ने साहित्य को कहाँ पटक दिया है ? कविता कहानी में कुछ नया जुड़ता रहता है । ललित निबंध में यदि ज्ञाता लोगों को काम मिले तो शायद त्रयी के बाद कुछ और संख्या बढ़े । मैं आशान्वित हूँ कि पुराना कब तक लोग ढोते रहेंगे । नया कुछ ऐसा हो जो जोड़े जा सकने योग्य हो तो ज़रूर जुड़ेगा ।

मानस- ऐसे समय में जब उत्तरआधुनिकता के संजालों से सारे समाज के साथ पढ़ा-लिखा तबका भी निरंतर फँसता चला जा रहा है, उधर साहित्यिक कर्म के लिए चुनौतियाँ भी जटिलतम होती चली जा रही हैं, अल्पसंख्यक रचनाकारों की इस पवित्र विधा के भविष्य को लेकर क्या किया जा सकता है ?

दुबे जी – ललित निबंध आज के लिए अनुकूल विधा है । इतने तनावों के बीच इस विधा की मूल्यवत्ता स्पष्ट है । साहित्य हाशिये में है, सच है । किन्तु इसके बिना रहा भी नहीं जा सकता है । हमारे यहाँ उत्तरआधुनिकता एक फतवा मात्र है उसके लक्षण नहीं है । साहित्य भी रहेगा और उसके लेखक भी रहेंगे । ललित निबंध अपनी अल्पसंख्यक उपस्थिति में भी महत्वपूर्ण रहेगा । रचना की दक्षता ही अल्पता को तोड़कर व्यापकता प्रदान करेगी ।

 

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