हिंदी ग़ज़ल की जो सरिता ‘अमीर खुसरो’ के यहाँ से उद्भावित होती है, वह कबीर, भारतेन्दु, प्रेमघन, प्रसाद और निराला के यहाँ से प्रवाहित होती हुई ‘त्रिलोचन’ तक आती है । त्रिलोचन इस सरिता के बहाव के लिए एक मुकम्मल जमीन का निर्माण करते हैं और ‘गुलाब एवं बुलबुल’ (1956 ई.) इस प्रयत्न का सर्जनात्मक एवं व्यवस्थापक रूप है । इस संग्रह की गज़लों में वह भावभूमि है जो आगे चलकर दुष्यंत आदि गजलकारों के यहाँ पुष्पवित एवं पल्लवित होती है । एक ओर उनकी गलों में जहाँ उर्दू काव्य परंपरा के तत्व – प्रेम, वेदना, उपेक्षा, निजता, अजनबीयत, ऊब इत्यादि देखने को मिलते हैं वहीं दूसरी ओर सांप्रदायिकता विरोध, स्वार्थनिष्ठा विरोध, पर्यावरण चिंता एवं समसामयिक यथार्थ बोध जैसे तत्व भी उनकी गजलगोई में विद्यमान हैं ।

त्रिलोचन ने संस्कृत, प्राकृत, अँग्रेजी और फारसी के साथ ही भारत की प्रांतीय भाषाओं का भी अध्ययन किया था । वे ‘गालिब’ की बोली और भाषा से जुड़ाव महसूस करते थे और उनकी गज़लों की सादगी और खरेपन से प्रभावित भी थे । साथ ही वे यह भी स्वीकार करते थे कि – “हिंदी में उर्दू ग़ज़लों के असर से ही ग़ज़ल लिखना चालू हुआ है ।” 1. उनकी गज़लों में इस प्रभाव को बखूबी लक्षित किया जा सकता है । उनकी ग़ज़लों की गहरी वेदना, करुणा, उदासी एवं संप्रेषणीयता पाठकों को सम्मोहित कर देती है । उनका कोमल हृदय जब प्रेम की पीर को प्रस्तुत करता है तो तन्हा दिल का दर्द उभरकर सामने आ जाता है । शायर का अकेलापन पाठक के अकेलेपन से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । त्रिलोचन की ग़ज़ल ‘फिर तेरी याद जो’ का प्रारंभिक शेर है –

“फिर तेरी याद जो कहीं आई नींद आने को थी नहीं आई ” 2.

इस अशरार में निजता है और इस निजता में वेदना है । यह वेदना सहसा ही हृदय को चीर देती है और मन सहज ही इसकी पीड़ा से एकात्मीभूत हो जाता है । अर्थात् वेदना जितनी शायर की है उतनी ही उस पाठक की भी है जो प्रेम मार्ग का पथिक है । ‘यह दिल क्या है’ शीर्षक ग़ज़ल का एक शेर है कि –

“मेरा दुख सुना चुप रहे फिर व’ बोले कि यह राग पहले का गाया हुआ है ” 3.

अर्थात् प्रेम मार्ग का पथिक इस विरह-जनित पीड़ा का अनुभव पहले से भी करता रहा है और अपने स्वरों में अपनी माशूका या मोहब्बत को याद करता भी रहा है । सबके हृदय की पीड़ा और स्वर समान ही थे और इस राग का दर्द एक जैसा सर्वत्र विद्यमान है । यह जो समग्र मानव अनुभूतियों को अपनी गज़लों में बयां करने की कला उनमें है, वह गज़लों में एक कसाव और पाठकों में एक दुर्निवार सम्मोहन को जन्म देती है ।

ऐसा इसलिए भी है कि उनकी गज़लों का धरातल सिर्फ प्रेम की पीर तक ही सीमित नहीं है अपितु उन सामान्य प्रयत्नों और अनुभूतियों का भी है जो जीवन के यथार्थ परिवेश की उपज हैं । उनकी गज़लों में जो आपबीती का सिलसिला चलता है, वह उनकी वास्तविक जिंदगी का ही बयान है । महज छः वर्ष की उम्र में पिताजी का देहावसान हो जाना, बारह वर्ष की ही उम्र में वैवाहिक जीवन का बोझ उठाना, वर्ण-व्यवस्था की दुरूहता के कारण शिक्षा से वंचित किया जाना, शिक्षा प्राप्ति हेतु तरह-तरह के कष्ट उठाना और जीविकोपार्जन के लिए दर-दर भटकना इत्यादि ने न केवल त्रिलोचन को पीड़ित किया अपितु जीवन की विषमताओं से रूबरू भी करवाया । इस स्वानुभूत जीवन की विषमता और संघर्ष को उन्होंने ‘विरोधाभास’ शीर्षक सानेट में कुछ इस प्रकार आत्मव्यंजित किया है –

“एक विरोधाभास त्रिलोचन है । मैं उसका रंग-ढंग देखता रहा हूँ, बात कुछ नई नहीं मिली है । घोर निराशा में भी मुसका कर बोला, कुछ बात नहीं है अभी तो कई और तमाशे मैं देखूँगा । मेरी छाती वज्र की बनी है, प्रहार हो, फिर प्रहार हो, बस न कहूँगा, अधीरता है मुझे न भाती, दुख की चढ़ी नदी का स्वाभाविक उतार हो ।” 4.

इस तरह वे अपने आत्मसंघर्ष एवं पीड़ा को स्वरबद्ध करते हैं, साथ ही दर्द से टकराते भी हैं । पीड़ा से पलायन की प्रवित्ति उनमें नहीं है और न ही अधीर होने की । कारण यह है कि वे दर्द को आत्मा का प्रसार करने वाला और दूसरों से जोड़ने वाला मानते हैं । उनकी दृष्टि में जीवन सुख-दुख का संगम है इसलिए दुख को जिंदगी में सहर्ष स्वीकार करना चाहिए । यह व्यक्ति को माँजता है । जीवन और उसमें सहभागियों की वास्तविक पहचान करवाता है । ‘कहूँ क्या अब’ शीर्षक ग़ज़ल के दो शेर हैं –

“जो तेरे लिए एक हो के खड़े थे, गए वे कहाँ और किधर कैसे कैसे त्रिलोचन तुम्हें देख कर आज समझा, कि कविता में आया असर कैसे कैसे ।” 5.

यह असर जीवन की विषमताओं से जूझते हुए और दर्द से टकराते हुए उन्होंने अर्जित किया था । किशोरावस्था में जहाँ शिक्षा के अर्जन के लिए लगातार संघर्ष जारी रहा, वहीं युवावस्था में जीविकोपार्जन के लिए संघर्षरत रहना पड़ा । इस क्रम में परिवार से दूरी जहाँ उन्हें सालती रही, वहीं जीवन की विषमताएँ उन्हें खंगालती रहीं । किन्तु न तो वे टूटे और न ही निराश हुए अपितु उनका मनोबल और भी दृढ़ हुआ –

“बिस्तरा है, न चारपाई है ज़िंदगी ख़ूब हमने पाई है …………………………… ठोकरें दर ब दर की थीं, हम थे कम नहीं हमने मुँह की खाई है ” 6.

इस आत्मव्यंजकता में सहज ही उस दृढ़ मनोबल को लक्षित किया जा सकता है जो जीवन की पीड़ा को स्वाभिमान और अल्हड़ मस्ती के साथ बयां करता है । उनके लिए पीड़ा न तो आदमी को हमेशा के लिए तोड़ने वाली होती है और न ही समाज से काटने वाली होती है । अपितु समाज और जीवन से जोड़ने वाली होती है । उन्होंने गरीबी और अंधविश्वास के बीच जीती-मरती ग्रामीण जनता की मानवता को न केवल पहचाना अपितु उस मानवता को एक अक्षय प्रेरणा के रूप में अपने हृदय में सँजोया भी । यही संवेदनशीलता उन्हें समाज के ताप से रूबरू करवाती है और वे लिखते हैं कि –

“न पूछो यहाँ ताप की क्या कमी है सभी का हृदय उस में ताया हुआ है” 7.

इस प्रकार उनके साथ-साथ उनके समाज का जीवन भी उनकी गज़लों में अभिव्यक्त होता गया है । उनकी गज़लों की यह विशेषता है कि उनमें हर तरह के संवेदन अभिव्यक्त हैं । यदि उर्दू ग़ज़ल परंपरा के अनुसार आत्माभिव्यंजना और आत्मपरकता है तो सामाजिक यथार्थ और ताप के स्वर भी विद्यमान हैं । वे विकास और आधुनिकता के नाम पर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के थोपे जाने और उसकी प्रवित्तियों के संदर्भ में सजग थे । नेहरू के लिए भले ही बाँध आधुनिक भारत के मंदिर रहे हों किंतु त्रिलोचन के लिए ये भावी पीढ़ियों के भविष्यभक्षक ही थे । धरती से प्रेम करने वाले और ग्रामीण जीवन के सजग चितेरे इस गजलकार ने औद्योगिक क्रांति के अंतर्विरोधों को उद्घाटित करते हुए लिखा कि –

“तुम को जीवन पसंद हो तो करो कुछ ऐसा, जिस से जीवन में जगत को हराभरा देखो” 8.

क्योंकि पूंजीवादी शक्तियाँ देश के विकास के नाम पर समस्त जैविक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करती रही हैं । फलस्वरूप नदियों पर अमर्यादित बाँध बनाने के कारण जहाँ वे सूख रहीं हैं वहीं अंधाधुंध खनिज खनन के फलस्वरूप पहाड़ों-पठारों का भूस्खलन भी तेजी से हो रहा है । बादल फटने और बाढ़ की घटनाएँ तो आम हो गयी हैं । ऐसे में जीवन कैसे सुरक्षित रह पाएगा । हरियाली से विहीन होते जंगल, सूखती हुई नदियाँ, प्रदूषित होती हवा और तपता हुआ मौसम, क्या पृथ्वी पर जीवन को बहुत दिनों तक कायम रहने देगा ? इसी भाव को त्रिलोचन ने उपर्युक्त शेर में संवेदनशीलता और गंभीरतापूर्वक अभिव्यक्त किया है । आगे चलकर इस विडंबना की सच्चाई से भी वे पाठकों को रूबरू करवाते हुए लिखते हैं कि –

“वसुधा कुटुंब है अजी कहने की बात है आपस की दुश्मनी ने मुझे यह पता दिया” 9.

बेहद ही अवलोकनीय और प्रासंगिक विचार है गजलकार का । जिस समाज में भाई-भाई के बीच दो इंच की जमीन को लेकर रार-तकरार जारी हो, वहाँ सम्पूर्ण धरा ही अपना घर है, जैसी अवधारणा क्या हास्यास्पद प्रतीत नहीं होती ? दरअसल, यह भूमंडलीकरण के नाम पर भू-मंडीकरण की विचारधारा है । जो एक छोटे से पूंजीपति वर्ग को तो जीवन की सर्वभूत सुविधा का भोगी बनाती है वहीं दूसरी ओर बहुसंख्यक पूंजीहीन वर्ग को ताप के ताए हुए दिन में बसर करने को मजबूर करती है । इन विकट होती परिस्थितियों के संदर्भ में ही त्रिलोचन लिखते हैं कि –

“कमाता एक था, परिवार पूरा चैन करता था अकेले का भी जीवन अब तो दूभर होता जाता है” 10.

इस दूभर होते जीवन से त्रिलोचन का बखूबी साबका हुआ था । पहले तो शिक्षा अर्जन के क्रम में आजमगढ़, दिल्ली एवं पंजाब तक देशाटन किया और ट्यूशनों के सहारे शिक्षा अर्जित की । तत्पश्चात आजीविका अर्जित करने के लिए पुनः देशाटन का क्रम शुरू हुआ । इस क्रम उन्हें दर-दर भटकना पड़ा । पहले सौराष्ट्र गए और वहाँ ‘झबेरचन्द्र मेघाणी’ के मार्गदर्शन में पत्रकारिता शुरू की । फिर 1940-42 के आसपास काशी में ‘श्रीपतराय’ के प्रकाशन में निकलने वाली ‘हंस’ और ‘कहानी’ पत्रिकाओं में काम किया । इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘आज’, ‘जनवार्ता’, ‘समाज’, ‘प्रदीप’, ‘चित्ररेखा’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में भी जीविकोपार्जन हेतु काम किया । इस प्रकार जीविकोपार्जन का संघर्ष प्रायः बना रहा और तरह-तरह के पापड़ बेलने पड़े । ‘कहूँ क्या अब’ शीर्षक ग़ज़ल में त्रिलोचन लिखते हैं कि –

“कहूँ क्या अब आया इधर कैसे कैसे, भटक कर शहर से शहर कैसे कैसे” 11.

यह मात्र त्रिलोचन के जीवन का ही भटकाव नहीं है अपितु उस बहुसंख्यक आबादी का सच है जो असमानता आधारित नीतियों की भेंट चढ़कर दर-ब-दर की ठोकरें खाने को अभिशप्त है । देश के विकास के नाम पर होने वाले विस्थापन के पीड़ितों के जीवन का तो यह कटु सत्य है । उन्हें पहले तो पुनर्वास और मुआवजे के लिए तत्पश्चात रोजगार के लिए दर-ब-दर की ठोकरें खानी ही पड़ती हैं । इस प्रकार त्रिलोचन के व्यक्तिगत जीवन का सच भी समष्टिगत जीवन की अनुभूतियों का मार्मिक बयान बनकर उनकी गज़लों में अभिव्यक्त हुआ है । इसलिए व्यक्तिगत होते हुए भी वह समाज का आख्यान है –

“रंग कुछ ऐसा रहा और मौज कुछ ऐसी रही, आपबीती भी मेरी वह समझे कोई वाद था” 12.

इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कहें तो जगत और जीवन का प्रेमी, यह गजलकार, हिन्दी ग़ज़ल परंपरा में रचनात्मक पहल के साथ उपस्थित होता है । त्रिलोचन ने उर्दू में न लिखकर हिंदी में ग़ज़लें लिखीं और हिंदी ग़ज़ल को वह सामर्थ्य प्रदान किया कि वह उर्दू ग़ज़ल के समक्ष अपने को स्थापित कर सके । ख्याल के बयान में वह लुफ्त और मिज़ाज हो के उर्दू भाषा का अभाव न खटके । ग़ज़ल का फार्म इस्तेमाल करने के साथ ही उन्होंने ऐसे शब्दों का चुनाव एवं प्रयोग अपनी गज़लों में किया है जो ख्याल को ग़ज़ल का मिज़ाज पूरी तरह दे सके । बावजूद इसके – “अनेक स्थानों पर शब्दों का गठन ढीला पड़ जाता है और कविता केवल कथन बनकर रह जाती है । कहीं-कहीं लय और छंद में ऊबड़-खाबड़पन जान पड़ता है और कहीं-कहीं सरल शब्दों की पीठ पर कोई भारी-भरकम शब्द आकर उक्ति की कमर तोड़ देता है । लेकिन त्रिलोचन की सफलता इसमें है कि अपनी अधिकांश पंक्तियों में वे इन दोषों से बच सके हैं । उन्होंने ग़ज़ल की अनेक परम्पराओं को ग्रहण करते हुए भी उसे आधुनिक जीवन का माध्यम बनाया है ।” 13.

अतः यह कहा जा सकता है कि त्रिलोचन के पूर्व की हिंदी ग़ज़ल परंपरा को अपने लिए जिस उपयुक्त जमीन की तलाश थी, वह त्रिलोचन के यहाँ आकर उसे प्राप्त होती है । हालांकि यह जमीन अभी पकती हुई अवस्था में ही थी जिसे पूर्ण परिपक्वत्ता दुष्यंत के यहाँ आकर प्राप्त हुई । बावजूद इसके उनकी ग़ज़लगोई में वह भावभूमि है जो आगे के ग़ज़लकारों को रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करती है । वे प्रेम और सौंदर्य के साथ-साथ मानवीय सरोकारों के भी प्रतिबद्ध ग़ज़लकार हैं । इस प्रकार प्रेम और सौंदर्य के इस अदीब ने व्यक्ति और समाज की पीड़ा की न केवल अभिव्यक्ति की अपितु हिंदी ग़ज़ल का ध्यान युगीन विषम एवं त्रासद परिस्थितियों की ओर भी आकर्षित किया ।

संदर्भ ग्रंथ सूची :

  1. विवेक, ज्ञानप्रकाश (2006), हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा, पंचकूला, हरियाणा ग्रंथ अकादमी, पृष्ठ संख्या – 59.
  2. त्रिलोचन (2009), बात मेरी कविता, नयी दिल्ली, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 47.
  3. त्रिलोचन (2009), बात मेरी कविता, नयी दिल्ली, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 44.
  4. त्रिलोचन (2004), ताप के ताए हुए दिन, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 49.
  5. त्रिलोचन (2009), बात मेरी कविता, नयी दिल्ली, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 50.
  6. संपादक, सलिल, सुरेश (2010), त्रिलोचन : चुनी हुई कविताएँ, दिल्ली, मेघा बुक्स, पृष्ठ संख्या – 353.
  7. त्रिलोचन (2009), बात मेरी कविता, नयी दिल्ली, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 44.
  8. त्रिलोचन (2009), बात मेरी कविता, नयी दिल्ली, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 49.
  9. त्रिलोचन (2009), बात मेरी कविता, नयी दिल्ली, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 48.
  10. संपादक, सलिल, सुरेश (2010), त्रिलोचन : चुनी हुई कविताएँ, दिल्ली, मेघा बुक्स, पृष्ठ संख्या – 363.
  11. त्रिलोचन (2009), बात मेरी कविता, नयी दिल्ली, किताबघर प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 50.
  12. संपादक, सलिल, सुरेश (2010), त्रिलोचन : चुनी हुई कविताएँ, दिल्ली, मेघा बुक्स, पृष्ठ संख्या – 365.
  13. संपादक, गोबिन्द प्रसाद (1994), त्रिलोचन के बारे में, नयी दिल्ली, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ संख्या – 73.

निशान्त मिश्रा

शोधार्थी,

हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग

म. गां. अं. हिं. वि. वर्धा, महाराष्ट्र – 442001 9580660400, 9527530688

ई. मेल – nishant11mishra@gmail.com

चित्र साभार: देशबंधु 

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