अरुण कमल समकालीन हिंदी साहित्‍य-परिदृश्‍य पर कवि-आलोचक के रूप में सशक्‍त और लोकप्रिय पहचान रखने वाले महत्‍वपूर्ण रचनाकार हैं। हालांकि वे अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं लेकिन उनका साहित्यिक व्‍यक्तित्‍व हिंदी भाषा में निर्मित हुआ है। यह निर्मिति अकारण नहीं है बल्कि अपनी अभिव्‍यक्तिगत जातीय अस्मिता के बोध का परिणाम है। एक ऐसा रचनात्‍मक संसार जो घर-बाहर की सार्थक बेचैनी का समर्थ उदाहरण है। यह सार्थक बेचैनी जहां उनकी कविता में काव्‍यात्‍मक बोध को सघन, सूक्ष्‍म और अनूठा बनाती है, वहीं उनकी साहित्यिक-दृष्टि को ठोस एवं प्रामाणिक परिप्रेक्ष्‍य प्रदान करती है। इसे हम उनकी दो वैचारिक गद्य की पुस्‍तकों – ‘कविता और समय’ तथा ‘गोलमेज’ में देख सकते हैं।

कविता और समय – यह उनके आलोचनापरक लेखों का पहला संकलन है। इसमें संकलित लेख विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं एवं विचार गोष्ठियों की उपज हैं। उन्‍होंने इन लेखों को अपनी किसी विशेष योजना के तहत नहीं लिखा बल्कि इन्‍हें ‘समय-समय पर प्राप्‍त आदेशापूर्ति’ के परिणामस्‍वरूप लिखा। इस संकलन से अध्‍ययनगत साक्षात्‍कार करने पर समकालीन काव्‍य-परिदृश्‍य के प्रत्‍यक्ष एवं अप्रत्‍यक्ष स्‍वरूप और संवेदना से परिचित होने में सहूलियत मिलती है। इस पुस्‍तक के लेख ‘आलोचनात्‍मक निबंध’ और ‘टिप्‍पणियां’ शीर्षक से दो भागों में विभाजित हैं। पहले भाग में कुछ महत्‍वपूर्ण रचनाकारों पर स्‍वतंत्र लेख शामिल हैं। ये लेख आमतौर पर ‘उनकी पुस्‍तकों की समीक्षा और रचनाओं के विवेचन’ के क्रम में विकसित हुए हैं। इन रचनाकारों में- निराला, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, फ़ैज, हरिशंकर परसाई, विजयदान देथा, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, मलयज, केदारनाथ सिंह, परमानंद श्रीवास्‍तव और डॉ. नामवर सिंह हैं।

इस पुस्‍तक का दूसरा भाग साहित्‍य और उसमें भी विशेषतौर पर ‘कविता के विभिन्‍न पक्षों एवं प्रश्‍नों’ पर केन्द्रित है। इसमें कुछ प्रश्‍नोत्‍तर एवं वक्‍तव्‍य भी शामिल हैं। इस भाग की पहली टिप्‍पणी ‘कविता का आत्‍मसंघर्ष’ काव्‍य-प्रक्रिया के दौरान एक रचनाकार के अपने आप से संघर्ष करने की प्रक्रियापर प्रकाश डालता है। इस आत्‍मसंघर्ष के प्रारंभ के बारे में उनकी मान्‍यता है कि ”बाह्य के साथ संघर्ष से आत्‍मसंघर्ष शुरू होता है। बिना बाह्य संघर्ष के आत्‍मसंघर्ष हो ही नहीं सकता। क्‍योंकि मनुष्‍य इस समाज में रहता है। प्रकृति के साथ उसका एक संबंध होता है और धीरे-धीरे वहां से लेकर अब तक मनुष्‍य का जो विकास हुआ है इसमें बहुत तरह के संघर्ष होते जा रहे हैं। इसलिए सबसे पहले आत्‍मसंघर्ष की शुरूआत बाह्य के साथ हमारे संघर्ष से होती है। बहुत बार यह संघर्ष जानबूझकर नहीं होता है, अनजाने होता है और वह चलता रहता है।”[1] इस तरह कवि के आत्‍मसंघर्ष की शुरूआत बाह्य के साथ संघर्ष करते हुए उसके अभ्‍यांतरीकरण से होती है। इस बाह्य संघर्ष से ही कविता की तमाम प्रविधियां, टेकनीक, शब्‍द आदि संचालित होते हैं। एक प्रकार से बाह्य संघर्ष का विस्‍तृत रूप है आत्‍मसंघर्ष जो अभ्‍यांतरीकरण की प्रक्रिया के बाद उचित बिंब, प्रतीक और शब्‍दों का चयन करने के बाद एक विशिष्‍ट फार्म में अपनी समग्रता के साथ प्रकट होता है।

कविता के आत्‍मसंघर्ष पर विचार करते हुए वे जहां काव्‍य रचना-प्रक्रिया की गहरी विवेचना प्रस्‍तुत करते हैं, वहीं रचना के प्रति समालोचना की जनतांत्रिक-दृष्टि पर विचार करते हुए उनका कहना है कि ”यदि ‘समालोचना के जनतंत्र’ का कोई अर्थ है तो यही कि कलाकृति को ही हमारे सभी मूल्‍यांकनों का प्राथमिक आधार होना चाहिए। दुर्भाग्‍यवश कई बार कलाकृति की उपेक्षा हो जाती है और अतिरिक्‍त प्रसंगों के आधार पर निर्णय ले लिए जाते हैं। होना यह चाहिए कि आलोचक निपुण सर्जन की तरह जीवन की एक-एक शिरा की रक्षा करते हुए अपने ध्‍येय तक पहुंचे। जो कुछ भी विकारग्रस्‍त हो उसे निर्ममता से काट दे लेकिन जीवनवाही शिराएं अक्षत रहें।”[2] इन अर्थों में वे समालोचना को पाठकेंद्रित लेकिन पूर्वाग्रहमुक्‍त-दृष्टि की देन मानते हैं जो कलाकृति की संरचनात्‍मक जटिलता को परखते हुए उसकी सार्थकता की पहचान करती है।

इस क्रम में अगले दो लेखों पर नजर डाली जाए तो ‘इधर की हिंदी कविता’ और ‘इधर की कविता के कुछ लक्षण’ दो अलग-अलग दशकों की कविता की समकालीनता को विवेचित करने वाली टिप्‍पणियांहैं। पहली टिप्‍पणीमें सत्‍तर से अस्‍सी के दशक के बीच के कवियों की कविताओं के लक्षणों को स्‍पष्‍ट करने की कोशिश की गई है। इस दशक की कविताओं को उनकी पिछली पीढ़ी से भिन्‍न बताते हुए उनका मानना है कि ”सबसे पहली बात तो यह है कि इन कवियों का राजनीतिक दृष्टिकोण ज्‍यादा संतुलित है। उनमें न तो वह (उग्रपंथी प्रवृत्ति) है जो अपने समय को ठीक-ठीक समझने में हमेशा बाधक होती है, न ही वह निराशा और निषेध की प्रवृत्ति जो अंतत: व्‍यक्तित्‍व के सिकुड़ते जाने से उत्‍पन्‍न होती है। पिछलेदिनों ये दोनों प्रवृत्तियां लगभग समान रूपसे हावी रहीं और कई बार तो एक-दूसरे के पूरक का काम करती रहीं।”[3] इसीलिए वे इस दौर के कवियों की कवि‍ताओं में विशाल भारतीय जीवन के दृश्‍य देखते हैं। ये कविताएं उन्‍हें सिर्फ ‘स्‍टेटमेंट’ नहीं लगतीं बल्कि व्‍यापक जीवन के दृश्‍य से साक्षात्‍कार कराने के कारण ‘सुगठित और विस्‍तृत’ बिंबों की काव्‍यात्‍मक श्रृंखला बनाती है जो ‘सौंदर्य,उर्वरता और जीवन के रहस्‍यों को व्‍यक्‍त’ करती हुई दिखाई देती हैं।

इसी तरह की भिन्‍नता को वे इस दौर के कवियों के भाषिक दृष्टिकोण, कविता की सामाजिक भूमिका एवं साहित्‍य में विचारधारात्‍मक-दृष्टि के रूप में देखते हैं। उन्‍हें इस दौर के कवियों की भाषा बहुविध उपयोग की भाषा लगती है वहीं कविता की सामाजिक भूमिका के प्रति ज्‍यादा आश्‍वस्‍त दिखते हैं क्‍योंकि ये कवि उन्‍हें ‘मार्क्‍सवादी विचारधारा से संपन्‍न दिखते हैं। वे इस विचारधारा के अभाव में किसी कवि को आज के दौर का सजग एवं समर्थ कवि के रूप में नहीं देखते। इसी वजह से ही ‘मानव संस्‍कृति और समस्‍त जीवन को नष्‍ट करने वाली पूंजीवादी व्‍यवस्‍था का विरोध महत्‍वपूर्ण’ हो सकता है जो कि साहित्‍य और समाज के सभी स्‍तर पर आज की सबसे बड़ी जरूरत है। दूसरी टिप्‍पणी नवें दशक के कवियों एवं उनकी कविता के सामान्‍य लक्षणों का आकलन है। इस दौर की कविता का सबसे ज्‍यादा ध्‍यान खींचने वाला पक्ष उन्‍हें उसका अ-राजनीतिक स्‍वरूप लगता है। इन कविताओं में वे नयापनएवं खुलापन तो पाते हैं लेकिन उनके अ-राजनीतिक रूप में कोई बड़े आशय या चिंता का अभाव पाते हैं। उनकी दृष्टि में ”इधर की कविताएं अधिकांशत: छोटे-छोटे विषयों और आशयोंकी कविताएं हैं। स्थिर, शांत और सौम्‍य। घर-परिवार-गृहस्‍थी-प्रकृति-लोकजीवन के सुकोमल दृश्‍य और बिंब जो दृश्‍य-पटल पर जरा सा ठहरकर विसर्जित हो जाते हैं, इधर की कविता में लगातार बढ़ गए हैं। कह सकते हैं कि कविता ज्‍यादा घरेलू और फालतू हो गई है। एक सीमा तक यह अच्‍छा है, लेकिन यदि यही मुख्‍य कर्तव्‍य बन जाए तो अधिक से अधिक कनिष्‍ठ कविता (माइनर पोएट्री) का सृजन हो सकता है। उससे आगे नहीं।”[4] इस तरह की कविताओं में ‘लोकरंग, लोकभाषा के शब्‍द और मुहावरे तथा लय का अनापेक्षित उपयोग’ होता है जिससे कविता के जीवन संपन्‍न होने का बस भ्रम बनता है।

इधर की कविताओं की दूसरी कमी की तरफ भी संकेत करते हुए उनका कहना है कि ”पिछली कोटि की कविताएं यदि ‘लोक-रंग’ से ग्रस्‍त हैं तो इस कोटि की कविताएं ‘शहरी सिन्‍थेटिक पेंट’ से। यह एक दूसरी अति है। यहां शब्‍द-प्रयोग, बिंब आदि चौंकाने वाले और छकाने वाले मिलते हैं। कविता बुझौवल या पहेली बन जाती है। एक हल्‍का-फुल्‍का रूख पूरी कविता में व्‍याप्‍त होता है। ऊपर से यह भ्रम भी होता है कि कवि को बहुत कुछ कहना है, कोई भारी बात कहनी है; लेकिन अंतत: पूरी कविता ‘विट’ पर आश्रित होती है।”[5] कविता की ये दो अतियां उनके हिसाब से इस बात का द्योतक है कि समकालीन हिंदी कविता ’जीवन की जटिलता में, जीवन के अंतर्विरोधों में प्रवेश करने’ की कोशिश नहीं कर पा रही है। एक तरीके का ‘रचनात्‍मक संकोच’ इस दौर की कविता में उन्‍हें दिखाई देता है। सिर्फ जीवन-अनुभव के कुछ ही प्रसंग बार-बार रूपांतरित होकर कविता का निर्माण कर रहे हैं।

आज और पिछले दो दशकों की कविता के सामान्‍य-लक्षणों की पहचान करने के साथ-साथ वे साहित्‍य के समान्‍य-लक्षणों की पहचान का प्रयास भी करते हैं। उनके लिए साहित्‍य सिर्फ शब्‍द भर नहीं है बल्कि इससे कुछ अतिरिक्‍त है जिसमें शब्‍द की व्‍यंजना-शक्ति का विशेष उपयोग होता है। इसीलिए ”साहित्‍य का आधार मूलत: मनुष्‍य का भाव-जगत है। साहित्‍य हमारे मन के बारे में, हमारे स्‍वयं एवं स्‍व से संबंध के बारे में, हमारे और बाकी सबके संबंध के बारे में है, हम सबके बाकी संपूर्ण प्रकृति-ब्रह्मांड के संबंध के बारे में है। साहित्‍य की नाभि मनुष्‍य का मन है। उसी के ताल में वह सब कुछ को देखता है।”[6] चूंकि साहित्‍य मनुष्‍य के स्‍वभाव की रचनात्‍मक अभिव्‍यक्ति है इस कारण ‘प्रत्‍येक जाति का अपना साहित्‍य होगा जो सार्वभौमिक होते हुए भी उस जाति विशेष के स्‍वभाव’ को व्‍यक्‍त करेगा। उसमें भाषा, भाव और जाति की अभिव्‍यक्ति ‘एक स्‍थान विशेष व काल विशेष में’ होगी।

साहित्‍य का अन्‍य सामान्‍य लक्षण है कि अपना विशिष्‍ट स्‍वभाव होने के कारण उसका स्‍वायत्‍त संसार होता है जिसके अंदर ही वह अपने महत्‍व को मनुष्‍य -जीवन में प्रमाणित कर पाता है। उनकी माने तो ”साहित्‍य बिल्‍कुल अपने समाज के, अपने समय के बारे में होते हुए भी कुछ ऐसे मूल्‍यों तक, कुछ ऐसे अनुभवों तक हमें ले जाता है जो हर काल के लिए लगभग एक ही होते हैं जैसे कि आदमी का शरीर।”[7] साहित्‍य की श्रेष्‍ठता को वे इसीलिए मनुष्‍य के चरम स्‍वभाव की सूक्ष्‍म पहचान और सार्थक अभिव्‍यक्ति से जोड़कर देखते हैं। साहित्यिक संरचना की इस प्रक्रिया में निहित-निहितार्थों को मानवीय संदर्भ में समझनेपर ही साहित्‍य द्वारा सामाजिक परिवर्तन संभव है जो प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष किसी रूप में घटित हो सकता है। साहित्‍य द्वारा आज तक के सामाजिक-परिवर्तन ‘जो मात्रात्‍मक’ रूप में व्‍यापक नहीं है लेकिन ‘गुणात्‍मक रूप में गहरा असर डालने वाला रहा है’ को वे इसी रूप में देखते हैं।

साहित्‍य के स्‍वभाव और उससे होने वाले सामाजिक-परिवर्तन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालने के बाद ‘पारचून’ नाम से टिप्‍पणी ‘कवि और कविता’ पर बेहद रोचक ढंग से की गई है। इस टिप्‍पणी का शीर्षक ही दिलचस्‍प है – पारचून। उन्‍हें कविता पारचून की दुकान की तरह लगती है जहां ‘ढेर-ढेर चीजें, बेइंतहा सृष्टि की अद्भुत नुमाइश आदि उपलब्‍ध होती हैं। वे इस टिप्‍पणी में कवि और उसकी कविता का पाठक से संबंध काफी जटिल और अंतर्विरोधों से भरा हुआ मानते हैं। कभी पाठक को कवि की कोई रचना पसंद आती है कभी नहीं। अगर पाठक को कवि की हर बाद वाली रचना पहली रचना से कमजोरलगे तो उनकी दृष्टि में इसके दो कारण हो सकते हैं –”एक तो यह कि पाठक का जीवन-अनुभव, जीवन-दृष्टि तथा सौंदर्याभिरुचि कवि से भिन्‍न, विकसित और श्रेष्‍ठ है। यानी कि पाठक ने तो हर तरह से अपना विकास किया पर कवि पिछड़ गया। दूसरी अवस्‍था में ठीक उल्‍टा होगा। यानी कि कवि की जीवन-दृष्टि, जीवन-अनुभव सौंदर्यमान सब बदलते गए, श्रेष्‍ठतर होते गए। जबकि पाठक अपने पूर्वस्‍थान पर जड़ीभूत रह गया।”[8] इन दोनों तर्कों से हम कवि और पाठक के संबंधों का एक पूर्वानुमान लगा सकते हैं जो इन दोनों में से किसी के पक्ष को सही साबित कर सकता है।

हमेशा से कविता में शब्‍दों के व्‍यापक इस्‍तेमाल की बात होती रही है। आमतौर पर यह कहा भी जाता है कि जो सबसे ज्‍यादा नए-नए शब्‍दों और मुहावरों का इस्‍तेमाल कविता में करता है, वह समर्थ कवि है। यह बात एक हद तक सही है लेकिन अतिव्‍यापकता का एकतरफा आरोप कवि की असमर्थता साबित करने के लिए नहीं लगाया जा सकता है। इस धारणा पर उनका तर्क है कि ”जैसे हिंदी में चालीस एक स्‍वर-व्‍यंजन मिलकर सारी भाषा बनाते हैं वैसे ही थोड़े से शब्‍द सब कुछ कह सकते हैं जैसे कि कैलिडिस्‍कोप (एक विज्ञान-खिलौना) में चूड़ी के तीन-चार टुकड़ों से सैकड़ों आकृतियां बनती-बिगड़ती हैं, हर आकृति दूसरे से भिन्‍न। एक कवि नए शब्‍द तो गढ़ नहीं सकता, वह केवल नए सयोग, नए संघटन, नए रिश्‍ते ढूंढता-बनाता है। कविता शब्‍दों में नहीं, शब्‍दों के आपसी संयोग में होती है। जैसे कुछ ही तत्‍वों से यह सारा भौतिक जगत बना है वैसे ही कुछ थोड़े से शब्‍दों से सारा कुछ बन सकता है- जरूरत है उस कीमियागिरी की, छड़ी घुमाने की।”[9]

शब्‍द का अर्थ और यथार्थ से संबंध का मामला हमेशा से कवियों की चिंता का विषय रहा है। इस संदर्भ में उनकी चिंता और पक्ष यह है कि ”क्‍या यह संभव है कि हम शब्‍दों का व्‍यवहार तो करें पर इस तरह कि उनके साथ बाहर की दुनिया की धूल, यथार्थ की धूल अंदर न आवे। यानी शब्‍द कोई स्‍पष्‍ट अर्थ न दे – उनका बाहर के संसार से कोई संबंध न हो, हो भी तो धुंधला अस्‍पष्‍ट, अपने ही झूले में झूलते धीरे-धीरे घूमरी खाते, संज्ञान खोते। ……मुश्किल यह है कि सभी कला-माध्‍यमों में शब्‍द ही ऐसे हैं जो यथार्थ की हस्‍त रेखाओं की तरह जीने को अभिशप्‍त हैं। कविता के शब्‍द यथार्थ के संपूर्ण भार को वहन करते हुए ही भारहीन होते हैं जैसे जल में पूरा निमग्‍नहोकर ही देह का भार न्‍यूनतम होता है, जैसे बाह्य स्‍पेस में वस्‍तुएं भार खो देती हैं।”[10]

इस तरह वे कविता में उपयोगिता के हिसाब से छंद और तुक के प्रयोग पर भी बल देते हैं। उनके अनुसार कविता में ”तुक लिखने की उब को कम करता है। शब्‍दों के नए संबंध ढूंढ लाता है। ……छंद कविता की रैखिक गति को चक्रीय बनाता है, यानी धारा में भंवर। छंद अप्रत्‍याशित का हेतु है। बहुत दिलचस्‍प है कि छंद यानी लय-पद्धति ही कविता को ठोस पदार्थ होने से बचाती है, कार्य-कारण संबंधों से परे ले जाती है और यथार्थ के अधिनायकत्‍व से कुछ मुक्ति भी देती है।”[11]

हालांकि इन दोनों पर अधिकार रखने और इनका उपयोग करने भर से वे किसी को समर्थ और सार्थक कवि नहीं मानते बल्कि स्‍व-अर्जन से प्राप्‍त की गई कवि-दृष्टिको ही ज्‍यादा महत्‍व देते हैं।

वे कविता और गीत के विभाजन से भी सहमत नहीं दिखते। उन्‍हें यह बात सही नहीं लगतीकि गीत को कविता से अलग करके देखा जाए,’मानों गीत कविता नहीं है’; या ‘गेय होने से कोई शब्‍द-समूह गीत’ बन जाएगा। उनकी समझ में कविता और गीत में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। उनका इस विषय पर मत है कि ”गीत लिखने की न्‍यूनतम अहर्ता कविता लिखना है। दुख की बात है कि खराब गद्यकार अच्‍छा कवि बन जाता है और खराब कवि अच्‍छा गीतकार। जबकि गीत लिख पाना साधना की चरम परिणति है। हर कविता की इच्‍छा अंतत: गीत बन जाना है। क्‍योंकि वही संगीत के सबसे पास का बिंदु है – दो देहों के बीच बस एक स्‍पंदित जीवंत भीति। इस भीति तक पहुंचना ही कविता का ध्‍येय है और श्रेय भी।”[12] इस स्‍तर तक आकर भाषा, उनकी नजर में : ‘सारे स्‍थूल अर्थ’ छोड़ देती है और अपने को वस्‍तु तथा पदार्थ से पृथककर केवल आभासों का सहारा लेते हुए उस भाव-दशा को व्‍यक्‍त करती है ‘जिसमें पूरी जीवन-स्थिति’ अंतत: विलीन होती है।

कवि और कविता में आस्तिकता और नास्तिकता के साथ-साथ कविता के स्‍वभाव की चर्चा भी वे समस्‍त हिंदी काव्‍य-साहित्‍य के संदर्भ में करते हैं। इस बारे में उनकी धारणा है कि ”कविता प्राथमिकत: और अंतत: इहलौकिक ही है, होगी। लेकिन कवि या तो आस्तिक होगा या नास्तिक या इन दोनों में से कुछ नहीं। परंतु धर्मनिरपेक्षता की कोई कोटि वहां नहीं होगी। आस्तिक या नास्तिक होना कहीं बहुत गहरे कवि के दर्शन, उसकी जीवन-दृष्टि और उसके संपूर्ण रचना-अस्तित्‍व से जुड़ा हुआ है – उसका पूरा संगठन, पूरा घुमाव ही तदनुरूप होगा।”[13] धर्मनिरपेक्षता को वे इस प्रक्रिया में इसलिए शामिल नहीं मानते क्‍योंकि वह ‘राजनीति और उससे भी ज्‍यादा राज्‍यशासन’ से जुड़ा हुआ शब्‍द है।

कविता में ब्‍यौरे और बिंब की उपस्थिति में आए बदलावों की तरफ भी वे संकेत करते हैं। उन्‍हें प्राचीन साहित्‍य के मुकाबले समकालीन साहित्‍य में ‘ब्‍यौरे बहुत अधिक और बहुत सूक्ष्‍म’ लगते हैं। यह स्थिति कमोबेश उन्‍हें कविता में भी परिलक्षित होती है। इस वजह से कविता में ‘ब्‍यौरे अधिक, बिंब कम’ हो गए हैं। इसे वे कविता के लिए बहुत सकारात्‍मक स्थिति नहीं मानते। कविता में बिंब निर्माण की प्रक्रिया कल्‍पना से संपन्‍न होती है और स्‍मृति से उपयुक्‍त तथ्‍य उपलब्‍ध हो पाते हैं। कविता निर्माण की प्रक्रिया में ”कविता स्‍मृति से शुरू होकर कल्‍पना के रास्‍ते आगे जाती है। जो कविता स्‍मृति के ही मुहाने पर रुक जाए वह प्रभावित तो करती है पर पर्याप्‍त नहीं है। स्‍मृति का उपयोग कविता को प्रसार देता है, उसे लगातार बढ़ाते जाने का अवकाश प्रदान करता है क्‍योंकि जो घट चुका है, जो स्‍मृति का अंग है उसकी कोई सीमा नहीं है, वह स्‍वयं इतना अधिक है कि कविता फैलती जाएगी जबकि कल्‍पना अपनी तमाम ख्‍यात निरंकुशता और उत्‍तरदायित्‍वहीनता के अंतत: एक सीमित उत्‍पादन ही कर पाती है। कल्‍पना का मुख्‍य काम है – उन स्‍मृति तत्‍वों को नए संयोजन में बदल देना यानी जो है उसमें कुछ जोड़ना।”[14] इन दोनों के संतुलित सम्मिश्रण से ही वे श्रेष्‍ठ कविता का‍ निर्माण संभव मानते हैं जो अपने समग्र-स्‍वरूप में ‘कल्‍पना पर कुछ अधिक आश्रित’ होती है। इस आधार पर ही वे कविता की कोटियों का निर्धारण करते हैं जिसकी गुणवत्‍ता कवि से ज्‍यादा पाठक से प्रभावित और निर्धारित होती है। यह प्रभाव और निर्धारण हमेशा सही ही हो, ऐसा नहीं हो सकता।

कला में संयोग की भूमिका का प्रश्‍न भी उनके लिए महत्‍वपूर्ण है। यह बहुत हद तक रचनाकार के ‘चेतन अथवा अवचेतन’ का परिणाम है। रचनाकार का बोध एक सीमा तक ही सच होता है, उसके बाद बहुत कुछ ऐसा होता है जो न चाहते हुए भी उससे अभिव्‍यक्‍त हो जाता है। इन्‍हीं अर्थों में एक श्रेष्‍ठ कविता की निर्मिति में संयोग का पक्ष घटित होता है। इस संयोग के चलते ही ”यह भी संभव है कि कवि अब तक जो पढ़ता आया, सुनता आया, देखता आया,उसके भीतर जो होता आया,वह अचानक प्रगट होता है जो उसके अपने नियंत्रण में भी नहीं होता।”[15] सृजन में आयास की अपेक्षा अनायास का होना संयोग का ही परिणाम है।

गोलमेज : यह पुस्‍तक अरुण कमल के आलोचनापरक लेखों का दूसरा संकलन है। इसमें उनके द्वारा ’1999 से लेकर 2008’ तक लिखे गए ‘निबंधों, वक्‍तव्‍यों एवं टिप्‍पणियों’ को संकलित किया गया है। इस पुस्‍तक का नाम ‘गोलमेज’ रखने के पीछे उनका तर्क है कि ”साहित्‍य की बहसों में हार-जीत का सवाल नहीं होता। कोई भी धारा या तर्क-प्रणाली कभी पूरी तरह समाप्‍त नहीं होती, हो सकता है वह थोड़ा पीछे चली जाए या सुप्‍त सी लगे; लेकिन अवसर पाकर वह फिर बढ़ सकती है। इसलिए हर आलोचना-कर्म वास्‍तव में एक गोलमेज वार्ता है जहां सारे मूल्‍य-प्रतिनिधि एक साथ बैठकर लड़ते-झगड़ते हैं और कुछ फैसले भी, संभव हुआ तो लेते हैं। मैंने यही सोचकर पुस्‍तक का नाम गोलमेज रखा।”[16] इस गोलमेज में कबीर, निराला, पंत, महादेवी, प्रेमचंद, भीष्‍म साहनी, निर्मल वर्मा, भिखारी ठाकुर, पाब्‍लो नेरूदा, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह और कुंवर नारायण भी शामिल हैं।

यह पुस्‍तक शीर्षक रूप में नहीं सिर्फ सामान्‍यतौर पर पांच भागों में विभाजित है। पहले भाग में कवियों पर या उनकी रचनाओं पर विचार किया गया है। दूसरे भाग में कविता के नए प्रतिमान, अनुवाद, कविता और समकालीनता और ‘हिंदी समाज में साहित्‍य और साहित्‍यकार की स्थिति’ पर आलोचनात्‍मक टिप्‍पणियां हैं। तीसरे भाग में कुछ उपन्‍यास और उपन्‍यासकारों के अलावा विभिन्‍न विधाओं से जुड़े कुछ व्‍यक्तित्‍वों या उनकी रचनाओं के ऊपर आलोचनात्‍मक लेख शामिल हैं। चौथे में पारचून के अंतर्गत कवि, कविता और समाज पर उनकी बेतरतीब टिप्‍पणियां हैं; वहीं पांचवें भाग में उनके वक्‍तव्‍य हैं जो उनकी कवि-दृष्टि से साक्षात्‍कार कराते हैं।

इस पुस्‍तक का शीर्षक ’गोलमेज’ मूल रूप में अनुवादकी प्रक्रिया और परिप्रेक्ष्‍य के ऊपर लिखा गया लेख है। अनुवाद की जरूरत को वे भाषा में अपूर्णता के पक्ष को महसूस करना मानते हैं। अर्थात जब यह महसूस किया जाता है कि ”हमारी भाषा में कोई तत्‍व विशेष नहीं है या कम है, भावों का भंडार, महसूस करने की क्षमता, अभिव्‍यक्ति के साधन तथा भाषा के वे उपकरण जिनके बिना हम सूक्ष्‍मता के साथ न तो जीवन को समझ सकते हैं न उसको प्रकट ही कर सकते हैं। अपूर्णता का यह अहसास ही अनुवाद के लिए उद्दीपन का काम करता है।”[17] इस अहसास में प्रत्‍येक भाषा के अपने सच (अपूर्ण सच) को दूसरी भाषा में स्‍थानांतरित करने और इन सत्‍यों की आपस में तुलना का भाव निहित होता है।

किसी भी रचना (खासकर कविता) की समकालीनता किन-किन बातों पर निर्भर करती है, इस बारे में वे अपने विचारों के माध्‍यम से कुछ विचारणीय तथ्‍यों की तरफ संकेत करते हैं। इस संदर्भ में उनका पहला विचार है ”केवल यही एक तथ्‍य कि किसी भी कृति की रचना एक चुने हुए काल-क्षण में ही संभव है सिद्ध करता है कि प्रत्‍येक रचना अपने काल से बद्ध है। यह उसकी समकालीनता है। और यह समकालीनता उस रचना में व्‍यक्‍त उस काल के जीवन का अनूठापन है जो मनुष्‍य के जीवन में उसके पहले कभी प्रगट ही नहीं हुआ था। …. एक श्रेष्‍ठ रचना उन तत्‍वों को पकड़ती है जो सर्वाधिक नए और इसलिए अनूठे हैं। जो रचना जितनी तीव्रता और जितने विस्‍तारसे इस नएपन को व्‍यक्‍त करती है, वह उतनी ही श्रेष्‍ठ होती है और उतनी ही अधिक समकालीन।”[18]

फिर भी जो श्रेष्‍ठ रचनाएं होती हैं वे अन्‍य कालों में भी प्रासंगिक बनी रहती है। इसीलिए वे अपने रचे गए काल के बाहर दूसरे कालों में भी समकालीन बनी रहती हैं। इसका कारण वे यह मानते हैं कि ”अपने काल से नाभि-नाल बद्ध होकर भी कविता अपने दो विशिष्‍ट उपकरणों, बिंब तथा लय, के जरिए पूर्ववर्ती कालों तथा भविष्‍य में भी संचरण करती है। लय तथा छंद वे माध्‍यम हैं जो कविता को पूर्ववर्ती कालों से भी जोड़ते हैं क्‍योंकि ये पूर्वरचित प्रणालियां हैं। दूसरी तरफ बिंब अपनी संश्लिष्‍टता के कारण, जो अनेक वस्‍तुओं के परस्‍पर संबंध से उत्‍पन्‍न होता है, सहज ही यथातथ्‍यता का परिहार करता है।”[19] अर्थात श्रेष्‍ठता का गुण कविता में इन तत्‍वों के सार्थक एवं सूक्ष्‍मबोध पर आधारित उपयोग से ही आ पाता है जिससे कविता हर काल में अपने को प्रभावित करती है।

वे हमारे हिंदी समाज में साहित्‍य और साहित्‍यकार की स्थिति को अन्‍य देशों एवं खुद के देश की कुछ भाषाओं के साहित्‍य एवं साहित्‍यकार की स्थिति से बेहतर नहीं मानते। इन दोनों की इस स्थिति में पहुंचने की वजह पर प्रकाश डालते हुए वे कहते हैं कि ”समाज के किसी भी जीवन पक्ष को देखें हम पाते हैं कि साहित्‍य और साहित्‍यकार के लिए वहां कोई जगह नहीं है। पहले तो अकादमिक संसार को ही लें। हमारे विश्‍वविद्यालयों में कहीं भी (मध्‍यप्रदेश अपवाद है) साहित्‍यकारों के नाम पर न तो सृजनपीठ हैं न साहित्‍यकारों को संबद्धकरने की कोई योजना। ……सामाजिक जीवन का जो आचार-व्‍यवहार है उसमें लेखक केवल मजाक और व्‍यंग्‍य का पात्र है। ….हिंदी में आज भी ऐसे लेखक न के बराबर हैं जो केवल लिखकर, आराम से रहने की बात तो दूर, अपनी जीविका भी चला सकें। जिस समाज में गंभीर लेखक केवल लिखकर अपना जीवन-यापन न कर सके तो समझना चाहिए कि वहां साहित्‍य या साहित्‍यकार के लिए कोई जगह नहीं है।”[20] यह जगह इसलिए नहीं बन पा रही है क्‍योंकि हिंदी समाज में शिक्षा और साहित्यिक जागरूकता की काफी कमी है। यह कमी साहित्‍य की उत्‍पादन क्षमता और साहित्‍यकार के प्रति सम्‍मान का उचित माहौल नहीं बनने देती है।

साहित्‍य, साहित्‍यकार और समाज के ऊपर (विशेषतौर पर कविता के संदर्भ में) उनके द्वारा अभिव्‍यक्‍त आलोचनात्‍मक टिप्‍पणियों के संकलन ‘पारचून’ से उनकी कवि-दृष्टि और नीति का व्‍यापक-विवरण मिलता है। इस पुस्‍तक में ‘पारचून’ का अगला भाग शामिल है जो पहले भाग की तरह ही बेतरबीत है। इस बेतरतीबी में एक कवि के द्वारा समाज और कविता के अंत:संबंधों का अनूठा साक्ष्‍य मिलता है जो अपने विवरण में रोचक, रचनात्‍मक एवं चिंतनपरक है। जैसे : क्‍यों कविता ऐंद्रिक होती है, रचना के स्‍वांत:सुखाय होने का क्‍या तात्‍पर्य है, कविता का भविष्‍य किस तरह का होगा, कवि की रचना-प्रक्रिया के क्‍या मायने होते हैं और वह उस दौरान किन-किन स्‍तरों से गुजरता है, कवि की श्रेणियां कितनी और किस तरह की होती है, कविता में राजनीति और आध्‍यात्‍म का कौन-सा स्‍तर होना चाहिए, उसके शिल्‍प कितने और किस प्रकार के होते हैं, कविता का मूल्‍यांकन किस आधार पर होना चाहिए, कविता में गद्य और छंद क्‍यों और किसलिए जरूरी हैं, कविता के पाठ का क्‍या महत्‍व है, समाज और साहित्‍य में जाति, संपत्ति और व्‍यक्ति के संबंध, स्त्रियों की दशा, धर्महीन-आध्‍यात्मिकता के प्रति दृष्टिकोण, रूप और वस्‍तु का संबंध, आधुनिकता और उत्‍तर-आधुनिकता का स्‍वभाव, आत्‍मकथा के बुरे और बेहतर पहलू, रचनाकार के व्‍यक्तित्‍व एवं कृतित्‍व का आंतरिक संबंध शामिल हैं। उनका यह चिंतन, अपने अनूठेपन में, उनकी इस पुस्‍तक को कई मायनों में प्रभावशाली बनाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो – अरुण कमल की ये दोनों पुस्तकें कविता, कवि, उसकी अभिव्यक्ति के विविध परिप्रेक्ष्यों के साथ-साथ सामाजिक संस्कृति के बहुविध पहलुओं की बारीक़ और बेबाक पड़ताल प्रस्तुत करती हैं; जिनसे गुजरना कवि के बहुमूल्य वैचारिक पक्षों से साक्षात्कार करना है; जो हमे वैचारिक तौर पर शिक्षित और प्रशिक्षित करता है।

  1. कविता और समय, अरुण कमल, वाणी प्रकाशन, नई दिल्‍ली – 02, सं. 2002,पृ.सं. 179
  2. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 187
  3. वही, पृ.सं. 188-189
  4. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 193
  5. कविता और समय,अरुण कमल, पृ.सं. 194
  6. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 197
  7. वही, पृ.सं. 203
  8. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 213
  9. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 214
  10. वही, पृ.सं. 215
  11. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 216
  12. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 216
  13. वही, पृ.सं. 217
  14. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 219
  15. कविता और समय, अरुण कमल, पृ.सं. 223
  16. गोलमेज, अरुण कमल, वाणी प्रकाशन,नई दिल्‍ली – 02,सं. 2009, पृ.सं. (आभार से)
  17. गोलमेज,अरुण कमल, पृ.सं. 126
  18. गोलमेज,अरुण कमल, पृ.सं. 133-134
  19. वही, पृ.सं. 137
  20. गोलमेज,अरुण कमल, पृ.सं. 139-140

     

    डॉ. राकेश कुमार सिंह

    सहायक प्रोफेसर

    हिन्दी विभाग dessh,rie(ncert)

    भुवनेश्वर सचिवालय मार्ग

    भुवनेश्वर, उड़ीसा 751022

    मोबाइल.9441235649,8895912124.

    ईमेल. singhhcu@gmail.com

     

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