ये धूप बहुत अच्छा है
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मैं बस स्टेंड के पास खड़ा था बस के इंतज़ार में . दस बजे ही सूरज जैसे आग बरसा रहा था . बस स्टेंड की शेड से कोई फायदा न था . तभी मैंने घुंघरुओं की आवाज सुनी. मेरा ध्यान उधर गया तो देखा कि दो लोग एक ठेली को धक्का लगाते हुए आ रहे हैं जिस पर गन्ने लादे हुए हैं और रस निकालने के लिए मशीन . एक आदमी बार-बार मशीन के पहिये को चला देता था जिस से घुंघरुओं की आवाज आ रही थी . मेरे चेहरे पर सकून सा दौड़ गया उन्हें देखकर .
 
“भैया ! जरा गन्ने का रस पिलाओ . पुदीना और नींबू डालकर .”
 
“बाबू जी ! अदरक भी लगा दूं क्या ? ” वह बोला .
 
“हाँ, भाई ! अपने दिल से बना दो बढ़िया सा .”
 
“छोटा गिलास बनाऊं या बड़ा गिलास ? छोटा दस का है और बड़ा बीस का .”
 
“ठीक है भाई . बीस का बना दो . आज गर्मी बहुत है .”
 
वे दोनों जुट गए . एक मशीन चला रहा था और दूसरा गन्ने को मशीन में ढेल रहा था . वाकायदा हरा उड़ना , नींबू और अदरक उन्होंने गन्ने के साथ मशीन में डालकर रस निकाला . रस में बर्फ डाली और गिलास मेरी तरफ बढ़ा दिया . धुप से हालत पतली हो रही थी . बनियान पसीने से भीग चुकी थी . बहुत राहत मिली मुझे रस पीकर .
 
“ये लो भाई !” मैंने बीस रुपये उनकी तरफ बढ़ा दिए और पूछा –
 
“भाई ! गर्मी का असर नहीं होता क्या तुम पर ?”
 
वह दोनों मुस्कुराए . उनके काले पद चुके चेहरे के बीच उनके सफ़ेद दांत किसी फूल की पखुदियों से लग रहे थे . उनमें से एक बोला –
 
“साहब ! पहले मजदूरी करते थे . ठेकेदार कभी पैसे देता कभी नहीं देता . पर हम तो परिवार छोड़कर यहाँ आये हैं . पैसा नहीं भेजेंगे तो हमारा बच्चे और माई का का होगा . धूप हमको अच्छी लगती है. इस से पैसा मिलता है. हमारा जिंदगी में ये धूप बहुत अच्छा है . राम-राम बाबू साहब !”
 
वे दोनों फिर से घुंघरुओं का संगीत बजाते मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए . उनकी बात से मेरी पसीने से भीगी बनियान अब ठंडी महसूस हो रही थी . वैसे कुछ कमाल गन्ने के रस का भी था .
 
शब्द मसीहा

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