गर्व है तुम पर
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“क्या लिखा है पापा ने जो इतना ग़मगीन हो गई हो ? ” पति ने पत्र पढ़ती पत्नी से पूछा .

“कुछ ख़ास नहीं है . घर की ही बात हैं .” वह बोली.

“घर की ऐसी क्या बात है जो मुझसे भी नहीं बताई जा सकती ! क्या मैं अभी भी तुम्हारे घर का सदस्य नहीं हूँ ?” पति बोला .

“कैसी बात करते हैं आप . इसे पढ़कर आप से ही बात करने के लिए कहा है पापा ने .”

“क्या बात करने के लिए कहा है ? बताओ तो सही .”

“पापा भैया को लेकर बहुत परेशान हैं और अब घर का बंटवारा करना पड़ेगा . पापा ने मेरा भी हिस्सा रखा था शुरू से लेकिन बड़े भैया की मौत की वजह से वे बंटवारा नहीं कर रहे थे . अब मजबूरी है उनकी . वे चाहते हैं कि मैं भी अपना हिस्सा ले लूं .”

“हम्म्म …तुम्हारे बाबा ने सोचा तो सही है . इस तरह वे आजाद भी हो जायेंगे और तुम्हारा छोटा भाई-भाभी खुश भी . मगर एक बात बताओ कि क्या तुम्हें वाकई अपने हिस्से की कोई जरुरत है ! “ पति ने सवाल किया .

“जरुरत तो नहीं है मुझे , क्योंकि मुझे आप पर और अपने पर पूरा भरोसा है .” वह बोली .

“अगर मैं कहूँ कि तुम अपना हिस्सा ले लो तब ?” पति बोला .

“तब मैं अपना हिस्सा लेकर भी आपको दे दूँगी और आपसे कहूँगी कि आप मेरी विधवा भाभी के लिए मुझे कुछ करने दें. मुझे आप पर भरोसा है कि आप मुझे रोकेंगे नहीं .” पत्नी ने पति की आँखों में देखते हुए कहा .

“मैं कैसे मना कर सकता हूँ अपनी समझदार पत्नी को . जिसने मेरे घर से मेरा हिस्सा नहीं लेने दिया और स्वाभिमान को जिंदा रखा मैं उसका स्वाभिमान कैसे छीन सकता हूँ ! मुझे तुम्हारे उस निर्णय पर भी गर्व था और आज इस निर्णय पर भी . तुमने मेरे लिए रिश्ता और सम्मान अर्जित किया है लेकिन यह तो हमारा धर्म ही है जो तुम करने जा रही हो . परिवार के सदस्य की मदद कर के ही प्यार को बढ़ाया जा सकता है . मुझे गर्व है तुम पर .” और पति ने उसे अपने सीने से लगा लिया .

शब्द मसीहा

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