पैर भारी हैं निराशा पैदा हुई है
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बुजुर्ग दादा ने अपने बेटे से अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त करते हुए कहा –

“बेटा ! मैं अपने पोते को देखना चाहता हूँ .”

“पिताजी ! वह तो अपने दोस्तों के साथ नौकरी ज्वाइन करवाने की माँग लिए धरने पर बैठा है. वह यहाँ आया तो नौकरी ज्वाइन कैसे करेगा ?”

“हाँ , सही कहते हो तुम परीक्षा पास किये तो दो साल हो गये . मुझे भी कोमा से बाहर आए तीन महीने हो गये. आखिर कब उसे नौकरी पर देख सकूँगा?”

“हा हा हा ….पिताजी ! कैसी बातें कर रहे हैं आप . सब के अच्छे दिन आ गये हैं . जिस दिन ये बच्चे कोई दो चार गाड़ियों में आग लगायेंगे , दस बीस लडके अपताल में जायेंगे, दस -पाँच पुलिस वालों के साथ, तब किसी कुम्भकरण की नींद खुल जायेगी और वह कोई आश्वासन देकर कोमा में चला जाएगा शांति से सोने के लिए .”

“अरे! सीधे से काहे नहीं कहते हो कि सिर्फ़ उम्मीद के पैर भारी हैं निराशा पैदा हुई है .”

शब्द मसीहा

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