चीन में भारतीय भाषाओं विशेष रूप से  हिंदी एवं संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों की रुचि देखते हुए मन गदगद है.यहाँ आज भी संस्कृत और चीनी में द्विभाषी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं.स्वतंत्र रूप से भी संस्कृत की पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं.नीचे कुछ पुस्तकों के विज्ञापन -चित्र उदाहरण के रूप में प्रस्तुत हैं-

Sanskrit and Chinese Bilingual Bodhicaryavatara (Chinese Edition) by Huang Bao Sheng (Jan 1, 2012)

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A History of Sanskrit Literature by Arthur A. Macdonell (Oct 1, 2005)

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A Unique Collection of Twenty Sutras in a Sanskrit Manuscript from the Potala (Sanskrit Texts from the Tibetan… by Vinitia Tseng (Dec 31, 2010)

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Mindfulness in Early Buddhism: New Approaches through Psychology and Textual Analysis of Pali, Chinese and Sanskrit… by Tse-fu Kuan (Feb 19, 2008)

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A History Of Sanskrit Literature by Arthur A. MacDonell (May 26, 2006)

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A History Of Civilization In Ancient India Based On Sanskrit Literature – Rationalistic Age (1000 BC – 242 BC… by Romesh Chunder Dutt (Feb 14, 2006)

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A History Of Civilization In Ancient India V2, Rationalistic Age: Based On Sanskrit Literature (1889) by Romesh Chunder Dutt (Jan 13, 2009)

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A History of Sanskrit Grammatical Literature in Tibet: Transmission of the Canonical Literature (Handbuch Der… by Pieter C. Verhagen (Jan 1, 1994)

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Research on Sanskrit Buddhist Sutras (Chinese Edition) by han ting jie (Apr 1, 2012)

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चीन में संस्कृत, भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म

किसी भी भाषा की अभिव्यक्ति के दो रूप होते हैं.पहला है मौखिक और दूसरा लिखित.जैसे किसी व्यक्ति का बोल बंद होने लगे तो उसके जीवन पर संदेह होने लगता है वही स्थिति भाषा के संदर्भ में भी होती है.भाषा का लिखित रूप भले ही कितना समृद्ध हो उसकी मौखिक अभिव्यक्ति का अभाव उसके जीवन को संदेहास्पद बना देता है.शुद्धतावादियों की हठधर्मिता के चलते संस्कृत की लिखित अभिव्यक्ति पर तो कोई प्राणघाती असर नहीं पड़ा लेकिन मौखिक अभिव्यक्ति पहले धीरे-धीरे क्षीण हुई फिर लुप्त होती चली गई.आज यह स्थिति है कि इसके बोलने वालों का अकाल पड़ा हुआ है.जो भाषा लिखित में भले ही जीवित हो पर यदि वह बोलचाल के क्षेत्र में जीवित नहीं होती तो भाषाविद उसे मृत मान लेते हैं.दुर्भाग्य से संस्कृत भाषा पर मृत भाषा का केवल यही यानी इकलौता लक्षण वह भी आधा-अधूरा लागू होता है,फिर भी इसी से इसके मृत होने के फतवे जारी होने शुरू हो गए हैं.

सुना है संस्कृत भारोपीय भाषा परिवार की भाषा है.इसे आर्य भाषा के नाम से भी जाना जाता है.भारत के भीतर और बाहर सुविधा की दृष्टि से इसे इंडो ईरानी या इंडो आर्यन कहकर भी पुकारा जाता है.इसके इंडो ईरानी कही जाने के पीछे इसका फ़ारसी और अवेस्ता की करीबी भाषा होना भी हो सकता है.ईरान में रहते हुए जब फ़ारसी सीखनी शुरू की तब जान पाया कि संस्कृत की तरह ही फ़ारसी के भी क्रिया रूप चलते हैं.यहाँ दोनों की निकटता दर्शाने के लिए एक ही उदाहरण काफ़ी होगा कि गम् धातु की लट् लकार के परस्मैपदी रूपों गच्छति ,गच्छतः ,गच्छन्ति की भाँति फ़ारसी के मीरम ,मीरी, मीरवी रूप चलते हैं. संस्कृत और फ़ारसी की सहायक क्रियाएँ भी उच्चारण की दृष्टि से बहुत करीबी लगती हैं.ईरान में किसी को अपना परिचय देते समय ‘मन हिंदी हस्तम्’ आदि वाक्य बोलते हुए मुझे संस्कृत बोलने-सा सुख मिलता था.

अपने ही ह्रदय क्षेत्र भारत में संस्कृत बोलचाल से कैसे बाहर हुई जहाँ यह शोध का विषय है वहीं यह भी कि इसने ऎसी कौन-सी संजीवनी पी रखी है जिससे हज़ारों सालों से सामान्य जनजीवन से कटकर भी अभी तक अपना अस्तित्त्व बनाए हुए है.प्रथम दृष्ट्या तो इस विराट जगत के जड़-चेतन सहित मानवीय ह्रदय के राग-विराग और शाश्वत जीवन मूल्यों की अमिय धारा से अभिसिंचित इसका विपुल साहित्य ही इसकी संजीवनी का मूल स्रोत जान पड़ता है.इसे मृत भाषा घोषित करने की मंशा पालने वालों को यह जानकर निराशा होगी कि यह मृत नहीं अमृत भाषा है जिसकी सुर-सरिता में अवगाहन करने को आज भी लाखों-करोड़ों देशी-विदेशी उद्यत रहते हैं. मातृभाषा के रूप में जिसकी अमिय धारा का पान करने (बोलने) वाले अब भी गाँव के गाँव पड़े हैं.

संस्कृत संस्कारों की भाषा है.यह मांगलिक कार्यों की भाषा भी है.यह अपनी शुचिता के लिए भी जानी जाती है. भारतीय संस्कृति में देव वाणी कहकर पूजी भी जाती है.यह केवल किसी एक जाति,धर्म या क्षेत्र की भाषा नहीं है.यह आर्यों से लेकर आधुनिक हिंदू,बौद्ध और जैन धर्मों की साझी सांस्कृतिक धरोहर है और आर्यावर्त से लेकर दुनिया भर के विभिन्न देशों में अपने विपुल साहित्यिक भण्डार के साथ विश्व विरासत के रूप में संरक्षित है.मुझे यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि विकीपीडिया में इसे बहुत अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है ,” संस्कृतम् sasktam[səmskr̩t̪əm], originallyसंस्कृता वाक् sasktāvāk, “refined speech”) is the primaryliturgical language ofHinduism, a philosophical language inHinduismBuddhism, and Jainism, and a scholarly literary language that was in use as a lingua franca in the Indian cultural zone. It is a standardized dialect ofOld Indo-Aryan language, originating as Vedic Sanskrit and tracing its linguistic ancestry back to Proto-Indo-Iranian and ultimately to Proto-Indo-European. Today it is listed as one of the 22 scheduled languages of India” 

….The oldest attested Indo-Iranian languages are Vedic Sanskrit(ancient Indo-Aryan), Older and Younger Avestan and Old Persian(ancient Iranian languages). A few words from a fourth language (very closely related to Indo-Aryan; see Indo-Aryan superstrate in Mitanni) are attested in documents from the ancient Mitannikingdom in northern Mesopotamia and Syria and the Hittitekingdom in Anatolia.”1

लौकिक संस्कृत और पालि तथा प्राकृत भाषाओं का बहुत निकट का संबंध रहा है.पालि तो अपने सुत्तों और मंत्रों के कारण संस्कृत के और भी निकट जान पड़ती है.धीरे-धीरे यह संस्कृत के व्याकरण के सरलीकरण की प्रक्रिया से उपजी मिश्रित संस्कृत से( पाणिनीय व्याकरण के बाद)थोड़ाऔर भी अधिक निकट आती हुई दिखती है.इसीलिए के.आर नार्मन( K.R. Norman)तो इसे मिश्रित संकृत भाषा का ही एक रूप मानने लगते हैं.लेकिन पाणिनि के बाद यह यही पालि भाषा संस्कृत से दूर जाती हुई भी दिखती है-“earlier works, mostly from theMahāsāṃghika school, use a form of “mixed Sanskrit” in which the original Prakrit has been incompletely Sanskritised, with the phonetic forms being changed to the Sanskrit versions, but the grammar of Prakrit being retained. For instance, Prakritbhikkhussa, the possessive singular of bhikkhu (monk, cognate with Sanskrit bhiku) is converted not to bhiko as in Sanskrit but mechanically changed to bhikusya.”2

संस्कृत नाटकों में शूद्र और स्त्री पात्रों के द्वारा प्राकृत बोला जाना यह दर्शाता है कि यदि संस्कृत का वर्चस्व लिखित परंपरा में था तो दूसरी भाषाओं पालि और प्राकृत का मौखिक में.संस्कृत में लिखित और मौखिक दोनों रूपों में व्याकरणिक शुद्धता और एकरूपता के प्रति वैयाकरणों के आग्रह के कारण कम पढ़ा-लिखा या अपढ़ वर्ग पालि और प्राकृत में सहज रहा.इस तरह से शिक्षित वर्ग तो संस्कृत के निकट रहा पर शेष जनमानस संस्कृत से दूर होता चला गया.इसका प्रत्यक्ष उदाहरण स्त्री और शूद्र पात्र हैं जो संस्कृत नाटकों में केवल प्राकृत बोलते देखे जाते हैं.इसी शुद्धतावादी दृष्टि ने कालांतर में पालि और प्राकृत को भी संस्कृत से दूर और मिश्रित संस्कृत के निकट पहुँचाया.मिश्रित संस्कृत से पालि-प्राकृत के इस सहज नैकट्य किंतु शास्त्रीय (मुख्यतः व्याकरणिक)दूरी को भी अपनी व्याख्या में बहुत सुन्दर ढंग से स्पष्ट करते हुए एडगार्टन लिखते हैं कि एक बुद्धिष्ट पाठक मिश्रित(हाइब्रिड) संस्कृत की पाठ्य सामग्री को पढ़ते हुए,”will rarely encounter forms or expressions which are definitely ungrammatical, or at least more ungrammatical than, say, the Sanskrit of the epics, which also violates the strict rules of Pāṇini. Yet every paragraph will contain words and turns of expression which, while formally unobjectionable … would never be used by any non-Buddhist writer.” 3

मिश्रित संस्कृत का संप्रत्त्यय हाइब्रिड चीनी के बरक्स है-The term ‘Buddhist Hybrid Chinese’,which is used to describe peculiar styles of language used in translations of Buddhist texts.”4

देशी संस्कृत प्रेमियों को देश और देश के बाहर के उन संस्थाओं और विद्वानों के प्रति उदार होना होगा जिन्होंने इसके विकास और प्रचार -प्रसार में हलका-सा भी हाथ लगाया है.वह इसलिए नहीं कि हम पश्चिमी विद्वानों से निम्नतर हैं बल्कि इस लिए कि हम उसी संस्कृत के लाल हैं जो बड़े गर्व से कहती है-

“अयं निजः परोवेति गणना लघु चेतसाम् 

उदार चरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम .”

सच पूछिए तो संस्कृत सारी दुनिया में अधिकांशतः अनुवादों के माध्यम से पहुँची.कुमारिल भट्ट जैसे संस्कृत,संस्कृति और हिन्दू धर्म के ध्वजा वाहक जिस बौद्ध धर्म के पीछे लाठी लेकर पड़े थे,प्रायः उसी ने हमारी संस्कृत और संस्कृति की पताका सारी दुनिया में बड़े शान से फहराई.सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचारार्थ अपने पुत्र और पुत्री को श्रीलंका और महायान शाखा के मिशनरियों को चीन भेजा था.इन्होंने बौद्ध साहित्य का प्रचुर मात्रा में चीनी भाषा में अनुवाद किया था.चीन में ही नहीं इन महायानियों ने पूर्वेशिया के अनेक देशों सहित जापान में व्यापक रूप से बौद्ध धर्म का मिशनरी भाव से प्रचार करने के लिए अपने दार्शनिक सिद्धांतों के जापानी भाषा में अनुवाद भी प्रस्तुत किए.वहाँ बुद्ध को शाक्य मुनि और तथागत के रूप में भी विशेष ख्याति मिली.इन्हीं के प्रयासों से जापानी भाषा में विशेष रूप से ‘न्योराई’ अर्थात् तथागत के रूप में जाने गए महात्मा बुद्ध.वहीं ठहर नहीं गया संस्कृत का यह पुनीत कर्म. धीरे-धीरे पूरे एशिया और फिर यूरोप पहुँच कर ही विराम लिया.

ईसा पूर्व ११०० में झाओ(Zhou) वंश के शासन काल में ही संस्कृत चीन पहुँच गई थी.उसके समय न केवल संस्कृत का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ बल्कि अनुवाद के नियम भी बने थे.इसके बाद हानवंश (२२०ईसा पूर्व से २०६ईसा पूर्व तक)के शासन काल में बौद्ध धर्म के साथ-साथ चीन में संस्कृत भाषा और साहित्य के व्यापक रूप से पहुँचने के प्रमाण मिलते हैं.इस काल से इन दोनों को चीन में बहुत मान मिलना प्रारंभ हुआ.इसी कालखंड में ही शिगाओ नाम के फ़ारसी भाषी व्यक्ति ने भारतीय ज्योतिष और बौद्ध साहित्य के ग्रंथों का विशेष रूप से सूत्रों का संस्कृत से चीनी भाषा में अनुवाद किया था.पाँचवीं सदी(सन ४०१ई.) में कश्मीर के कुमारजीव ने चीन जाकर व्यापक स्तर पर बौद्धधर्म का प्रचार किया.उसने अपने ३००० विद्वानों के साथ मिलकर ७४ सूत्रों सहित विपुल मात्रा में संस्कृत में रचित बौद्ध साहित्य का चीनी में प्रामाणिक अनुवाद भी किया.इस काल में अकेले चीन में १७६८ बौद्ध मंदिर बने जिनमें बराबर उठने वाले संस्कृत मन्त्रों के स्वर अपने नाद से आकाश को गुंजायमान करते रहे.

सातवीं सदी में सुप्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग (६००-६६४ई.)ने आध्यात्मिक गुरु की खोज के उद्देश्य साथ भारत की यात्रा की . ‘Journey to the west’के नाम से अनूदित उसकी चर्चित पुस्तक के उद्धरणों से पता चलता है कि बौद्ध धर्म का साहित्य जो अधिकांश संस्कृत में रचित था,वह यहाँ से बाईस घोड़ों पर लादकर महात्मा बुद्ध की सोने की मूर्ति और संस्कृत में रचित १२४ अद्भुत सूक्ति संग्रहों के साथ बौद्ध तथा अन्य साहित्य की ५२० पांडुलिपियाँ अपने साथ ले गया था .चीन लौटने पर उसका राजकीय सम्मान के साथ भव्य स्वागत हुआ.स्वदेश वापसी पर उसने अथक परिश्रम के साथ उन्नीस वर्षों तक संस्कृत से चीनी और चीनी से संस्कृत में निरंतर अनुवाद का कार्य किया.इस तरह मात्र उन्नीस वर्षों में उसने १३३५ ग्रंथों का अनुवाद किया.उसने अपने देश वासियों के लिए संस्कृत से चीनी और भारतीयों के लिए चीनी साहित्य का संस्कृत में अनुवाद करके दोनों संस्कृतियों के समन्वयन का अनूठा प्रयोग किया था.वह भारत और भारतीय साहित्य का भक्त्त बन गया था.पूरे अट्ठाईस वर्षों तक भारत में रहने के बाद चीन लौटने के समय तक न केवल वह बौद्ध बन गया था बल्कि स्वदेश पहुँचते ही अपने सम्राट को भी उनके पैतृक ताओ धर्म को छुड़वाकर बौद्ध धर्म में दीक्षित कर लिया था.

बौद्ध धर्म के अभ्युदय और उसके दुनिया भर में फैलने के साथ-साथ संस्कृत भी फूलती-फलती और फैलती गई.नालंदा और तक्षशिला के विश्व विद्यालय जहाँ कुछ कट्टरपंथी आक्रान्ताओं के द्वारा जलाए जाने से संस्कृत भाषा और साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई वहीं यह भी भूलना ठीक नहीं है कि आठवीं शताब्दी में इस्लाम के भारत आगमन पर उदार इस्लाम मतावलंबी विद्वानों द्वारा पातंजलि के योगसूत्र ,उपनिषद और पंचतंत्र की कहानियों के साथ-साथ बहुत सारा संस्कृत साहित्य अरबी और फ़ारसी में अनूदित होकर अरब देशों और अरब से होते हुए यूरोपीय देशों में पहुँचा.

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से संस्कृत के भाषिक स्वरूप को मुख्यतः तीन भागों में बाँट सकते हैं.पहला है -वैदिक ,दूसरा शास्त्रीय या लौकिक और तीसरा है मिश्रित या संकर संस्कृत.भारतीय विद्वान पहले दो स्वरूपों से सहज सहमत हो सकते हैं पर तीसरे के विषय में स्वयं को थोड़ा असहज अवश्य अनुभव करेंगे.संस्कृत का जो तीसरा रूप है उस के विषय में महात्मा बुद्ध थोड़ा अधिक उदार भाव रखते थे क्योंकि वे महसूसते थे कि शुद्ध संस्कृत तो द्विजों के लिए है.अतः मिश्रित संस्कृत बुद्ध के संरक्षण में खूब फूली-फली लेकिन सामाजिक स्तर पर शुद्धतावादी कुमारिल भट्ट के उद्भव और उनके बौद्ध धर्म के प्रति प्रबल विरोध भाव के कारण तथा अकादमिक स्तर पर चौथी शताब्दी में वैयाकरण पाणिनि के आगमन के साथ शास्त्रीय संस्कृत की तुलना में मिश्रित संस्कृत जिसमें पालि और प्राकृत को सहज रूप में प्रवेश प्राप्य था, को आगे चलकर प्रयोग के स्तर पर बहुत संभव है कि अप्रासंगिक और निषिद्ध करार दिया गया हो जिससे संस्कृत के इस तीसरे रूप को पनपने का अच्छा अवसर मिल गया हो. विदेशी विद्वानों ने संस्कृत के इसी तीसरे रूप को ‘ Buddhist Hybrid Sanskrit’की संज्ञा दी है- ” Buddhist Hybrid Sanskrit writings emerged after the codification in the 4th century BCE of Classical Sanskrit by the scholar Pāṇini. His standardized version of the language that had evolved from the ancient Vedic came to be known as “Sanskrit” (meaning “refined”, or “completely formed”). Prior to this, Buddhist teachings are not known to have generally been recorded in the language of the Brahmanical elites. At the time of the Buddha, instruction in it was restricted to members of the twice-born castes.Pāli could also be considered a form of BHS”4

बौद्ध धर्म ने मिश्रित संस्कृत के साथ-साथ उसमें समावेशित और स्वतंत्र रूप से भी प्राप्य अपने धार्मिक साहित्य के माध्यम से

 

पालि और संस्कृत दोनों भाषाओं के संरक्षण का पुनीत कार्य किया है.इस धर्म की वज़ह से न केवल भारत बल्कि भारत से बाहर भी ये

 

भाषाएँ जीवंत रहीं. कहीं मंत्रों तो कहीं नियमों ,सिद्धांतों के रूप में उच्चरित होती रहीं.व्यापक जन समुदाय के बीच सबसे मनोयोग और

 

उत्साह पूर्वक बोली और सुनी जाती रहीं.इसलिए पालि से नाक-भौं सिकोड़ने वालों को थोड़ा उदार होना पड़ेगा.संस्कृत की सहोदरा के रूप में

 

सहेजना पड़ेगा.पालि के इस अवदान और उसकी व्यापकता पर विदेशी विद्वानों के विचार उल्लेखनीय हैं-“Four varieties of Pali are distinguished: the archaic language of the verse portions of the Pali canon, Tipitaka; the more uniform and regularlanguage of canonical prose; the even more simplified and standardized language of commentary literature; and the language of recentliterature, with its many new formations, deviations from rules, and foreign influences. Because of the exceptional cultural and historicalsignificance of Pali that distinguishes it from other Middle Indic languages, Pali has been preserved as a living literary language in Sri Lanka,Burma, Thailand, Laos, Cambodia, and Vietnam. It is used for religious and scholarly works, and is part of the spoken language of educatedBuddhists. Pali has exerted considerable influence on a number of languages in Southeast Asia.”7

पालि भाषा में भारत में उपलब्ध साहित्य मुख्यतः ब्राह्मी और खरोष्ठी में लिखा गया था जो भारत से बाहर के देशों में सुविधा की

 

दृष्टि से उनकी अपनी लिपियों में पुनः लिपिबद्ध किया गया.

 

पाणिनीय व्याकरण सम्मत संस्कृत में भी प्रचुर मात्रा में बौद्ध साहित्य लिखा गया है लेकिन यह मिश्रित संस्कृत और पालि भाषा

में लिखे गए साहित्य की तुलना में कम है.अश्वघोष का बुद्ध चरित संस्कृत भाषा के शास्त्रीयस्वरूप में लिखे गए साहित्य का उत्कृष्ट

उदाहरण है.अतः पाणिनि के बाद संस्कृत भाषा ने विशुद्ध शास्त्रीय स्वरूप ग्रहण किया जो आज तक लगभग वैसा का वैसा ही है-After Pāṇini’s work, Sanskrit became the pre-eminent language for literature and philosophy in India. Buddhist monks began to adapt the language they used to it, while remaining under the influence of a linguistic tradition stemming from the protocanonical Prakrit of the early oral tradition.”8

इतनी जीवंत और ऊर्जावान भाषा व्यवहार के धरातल से कब और कैसे बहिष्कृत हुई यह गंभीर शोध का विषय है.इस क्षेत्र में

 

जिन्होंने शोध किया भी वे और कोई और निष्कर्ष देने से पहले संस्कृत की मौत का फ़तवा जारी करने लगे.पश्चिमी विद्वान पोलक इसी श्रेणी के विद्वान हैं.इन्होंने संस्कृत को लैटिन की भाँति ही मृत घोषित करते हुए तर्क दिए हैं कि-“most observers would agree that, in some crucial way, Sanskrit is dead“.[12] …. while Sanskrit continued to be used in literary cultures in India, Sanskrit was not used to express changing forms of subjectivity and sociality embodied and conceptualised in the modern age.[36] लेकिन मैं इनकी राय से कदापि सहमत नहीं हूँ. उसका कारण यह कि संस्कृत आज भी लाखों की जीविका की भाषा है और हज़ारों की मातृभाषा.उत्तराखंड राज्य की राजभाषा भी है और भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में अधिसूचित भारत के संघीय चरित्र वाले गणराज्य की राष्ट्रीय भाषा भी.जब तक भारत राष्ट्र का लोकतंत्र सुरक्षित है,संविधान इसकी रक्षा में सशस्त्र और सशास्त्र कटिबद्ध है और हाथ उठाए खड़ा है.पचासों करोड़ लोगों के संस्कारों की भाषा है.दुनिया के उत्कृष्ट और शास्त्रीय साहित्य की आदर्श भाषा भी है.जब तक जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार होते रहेंगे और भारत की राष्ट्रीय अस्मिता सजग रहेगी संस्कृत के स्वर अंतरिक्ष में गूँजते रहेंगे.सन २००१ की जनगणना के अनुसार भारत में १४१३५ लोगों की मातृभाषा संस्कृत है.दक्षिण के कर्नाटक के शिमोगा जिले के मात्तुर गाँव से लेकर पूरब में उड़ीसा के क्योंझर जिले के श्याम सुंदरपुर गाँव को मिलाते हुए पूरे देश में आठ गाँवों मोहाद,नरसिंहपुर,झिरी,राजगढ़,म.प्र.,कपेरण,बूँदी,और खाडा,गनोडा बाँसवाड़ा,आदि राजस्थानी गाँवों के लोगों की केवल समझ की भाषा ही नहीं मातृभाषा भी संस्कृत ही है.

 

संस्कृत एक ऐसी भाषा है जिसके साहित्य और ज्ञानविज्ञान के वांग्मय का दुनिया भर की सैकड़ों भाषाओं में अनुवाद हुआ है.यह

 

ग्रीक और लैटिन जितनी पुरानी होकर भी न तो उनकी तरह क्षरित या स्खलित हुई और न ही मृत.यह अमृतमय भाषा है.इससे ही भारतीय

 

भाषाओं की पयस्विनियाँ प्रवाहित हुई हैं.इसकी प्रशंसा में विकिपीडिया में उल्लिखित ये तथ्य विशेष महत्त्व के हैं कि-“The Sanscrit language, whatever be its antiquity, is of a wonderful structure; more perfect than the Greek, more copious than theLatin, and more exquisitely refined than either, yet bearing to both of them a stronger affinity, both in the roots of verbs and the forms of grammar, than could possibly have been produced by accident; so strong indeed, that no philologer could examine them all three, without believing them to have sprung from some common source, which, perhaps, no longer exists; there is a similar reason, though not quite so forcible, for supposing that both the Gothic and the Celtic, though blended with a very different idiom, had the same origin with the Sanscrit; and the old Persian might be added to the same family.”

संस्कृत भाषा ने दो हज़ार साल पहले ही मसालों के साथ पश्चिमी देशों की सरहदों में प्रवेश कर लिया था लेकिन इसके उन्हें रास

 

आने के प्रमाण सबसे पहले भर्तृहरि के साहित्य के पुर्तगाली भाषा में १६५१ ई.के अनुवाद के साथ मिलते हैं.सन १७७९ में नैथेनियल ने

 

‘विवादार्णव सेतु’ का ‘A Code of Gentoo Laws‘ के नाम से एक उत्कृष्ट लीगल कोड के रूप में प्रकाशन किया था.यह अनुवाद फ़ारसी

 

से किया गया था.इसका अर्थ है कि अंग्रेज़ी,जर्मन और पुर्तगाली से पहले अरबी-फ़ारसी में संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद हो चुके थे.१७८५ में

 

चार्ल्स बिल्किंस ने भगवद्गीता का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था. अभिज्ञान शाकुन्तलं का अनुवाद १७८९ ई० में W जोन्सन ने ‘ ‘नाम से

 

किया था.टीएस इलियट तो संस्कृत से इतना प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी चर्चित कृति ‘The Waste Land’ का समापन संस्कृत भाषा के,

 

‘शांतिः शांतिः शांतिः ‘शब्दों से किया. इससे स्पष्ट है कि यह कहीं भी किसी जाति,धर्म या क्षेत्र के इकलौते खूँटे से कभी बंधी नहीं रही. कश्मीर के मुस्लिम शासकों से लेकर महमूद गजनवी तक ने संस्कृत को राज भाषा बनाया.महमूद के सिक्कों पर अंकित संस्कृत अपनी पुरातन वैश्विक व्याप्ति को पुष्ट करती हुई मिलती है.

संस्कृत में लिखे गए लगभग समग्र बौद्ध साहित्य के साथ ही दुनिया भर की भाषाओँ में निम्न लिखित संस्कृत ग्रंथों के सर्वाधिक अनुवाद हुए-

अभिज्ञानशाकुन्तलम् – कालिदास,अविमारक – भास,अर्थशास्त्र – चाणक्य,अष्टाध्यायी – पाणिनि,आर्यभटीयम् – आर्यभट,आर्यासप्तशती – गोवर्धनाचार्य,उरुभंग – भास,ऋतुसंहार – कालिदास,कर्णभार – भास,कादम्बरी – वाणभट्ट,कामसूत्र –वात्स्यायन,काव्यप्रकाश – मम्मट काव्यमीमांसा – राजशेखर,कालविलास – क्षेमेन्द्र,किरातार्जुनीयम् – भारवि,कुमारसंभव – कालिदास,बृहत्कथा – गुणाढ्य,चण्डीशतक – वाणभट्ट,चरक संहिता – चरक,चारुदत्त-भास,चौरपंचाशिका – बिल्हण,दशकुमारचरितम् –दण्डी,दूतघटोत्कच – भास,दूतवाक्य – भास,न्यायसूत्र – गौतम,नाट्यशास्त्र – भरतमुनि,पञ्चरात्र – भास,प्रतिमानाटकम्- भास,प्रतिज्ञायौगंधरायण – भास, बुद्ध चरित-अश्वघोष, – वाराहमिहिर,ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त – ब्रह्मगुप्त,ब्रह्मसूत्र – बादरायण,बालचरित्र –भास,मध्यमव्यायोग-भास,मनुस्मृति – मनु,महाभारत – वेद व्यास,मालविकाग्निमित्र – कालिदास,मुकुटतादितक – वाणभट्ट,मेघदूत – कालिदास,मृच्छकटिकम् – शूद्रक,मिमांसा – जैमिनी,योगयात्रा – वाराहमिहिर,योगसूत्र – पतंजलि,रघुवंश –कालिदास,रसरत्नसमुच्चय – वाग्भट्ठ,रसमञ्जरी – शालिनाथ,राजतरंगिणी – कल्हण,रामायण – महर्षि वाल्मीकि,व्याकरणमहाभाष्य – पतंजलि,वाक्यपदीय – भर्तृहरि,विक्रमोर्वशीय – कालिदास,वैशेषिकसूत्रम् – कणाद,स्वप्नवासवदत्तम – भास,समय-मातृका –क्षेमेन्द्र,साहित्य दर्पण – विश्वनाथ कविराज,सांख्यसूत्र – कपिलमुनि,हर्षचरित्र – वाणभट्ट

संस्कृत के अभ्युत्थान में चीन और बौद्ध धर्म का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता.यदि बौद्ध धर्म इतने व्यापक रूप से दुनिया में न फैला होता तो संस्कृत भी संभवतः उतनी व्यापक नहीं हुई होती जितनी बौद्ध धर्म के अनुयायियों से वन्दित और अभिनंदित होकर हुई है.चीन भले श्रीलंका या जापान की तरह बौद्ध धर्म प्रधान देश नहीं है पर इस धर्म के प्रचार-प्रसार में इनसे भी बड़ा योगदान चीन का है.

  1. प्रोफ़ेसरजयदेव सिंह ने अपने ‘माध्यमिक दर्शन ‘में महायान संप्रदाय के सांस्कृतिक योगदान को चीन ,तिब्बत और जापान के द्वारा बचाए रखने की सराहना की है. बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय का अधिकांश साहित्य या तो व्याकरण सम्मत साहित्यिक संस्कृत भाषा में लिखा गया है या मिश्रित अथवा संकर संस्कृत में लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार भारत में महायान संप्रदाय का यह साहित्य पूर्णतः अनुपलब्ध है.किन्तु यह सुखद सूचना है कि दूसरी से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच संस्कृत से चीनी तथा सातवीं से ग्यारहवीं के बीच संस्कृत से तिब्बती में प्रचुर मात्रा में बौद्ध साहित्य का अनुवाद हुआ.संस्कृत और मिश्रित संस्कृत में लिखे बौद्ध साहित्य के यदि अनुवाद न हुए होते तो जैसे आज महायानी साहित्य भारत में उपलब्ध नहीं है,शायद देश से बाहर भी न होता.तिब्बत,चीन और जापान में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध इसी महायानी साहित्य के आधार पर ही इनकी स्रोत भाषाओं की खोजबीन करते हुए सन १८२४ में ब्रिटिश कूटनीतिज्ञ और विद्वान हडसन ने नेपाल से प्रचुर मात्रा में मिश्रित संस्कृत में लिखा बौद्ध साहित्य संकलित कर दुनिया के सामने रखा.इसके पहले दुनिया वालों से यह खजाना छिपा पड़ा था.
  2. संस्कृतके उत्थान में चीन,जापान और तिब्बत के साथ-साथ नेपाल का भी अभूतपूर्व योगदान है. बुद्धिष्ट संकर या मिश्रित संस्कृत साहित्य के लेखन का कार्य व्यापक रूप से नेपाल के ब्राह्मणों द्वारा किया किया गया.इनके द्वारा तीसरी सदी में जहाँ इसके लिप्यंतरीकरण का कार्य तेजी से चल रहा था वहीं इसके उतनी ही तेजी से चीनी भाषा में अनुवाद भी किए जा रहे थे.ललितविस्तार सूत्र जिसमें महात्मा बुद्ध के जीवन के बारह मुख्य सिद्धांतों की व्याख्या है,इनके चीनी भाषा में अनुवाद के कार्य २२१ई.से२६३ ,३०८ई.,४२० से ४७९ई.तथा ६८३ई.तक मुख्यतः चार कालखंडों में बिखरे हुए देखने को मिलते हैं.ललित विस्तार के साथ चर्चित सूत्र है सद्धर्म पुण्डरीक सूत्र .इसके अनुवाद का कार्य ईसापूर्व प्रथम शताब्दी से लेकर ईसा की तीसरी शताब्दी तक चला. इसकी पुष्टि सुनीति कुमार चटर्जी भी करते हैं-

”One great service the people of Nepal did, particularly the highly civilized Newars of the Nepal Valley, was to preserve the manuscripts of Mahayana Buddhist literature in Sanskrit. It was the contribution of Sri Lanka to have preserved for humankind the entire mass of the Pali literature of Theravada Buddhism. This went also to Burma, Cambodia, and Siam. It was similarly the great achievement of the people of Nepal to have preserved the equally valuable original Sanskrit texts of Mahayana Buddhism.

It is therefore in Nepal that the vast majority of Sanskrit Buddhist documents have been preserved.

….The special, characteristic peculiarity of Newar Buddhism is that its ritual and its sacred literature are written in the Sanskrit language, because of which we can call Newar Buddhism the only surviving form of “Sanskrit Buddhism”. With the collapse of Buddhism in India, some Buddhists escaped from suppression and fled to Nepal. The Newars of the Kathmandu Valley accepted them and their religious and cultural inheritance. The two groups intermarried and their religions and cultures merged to become Newar Buddhism. This happened during a period from the 9th to the 13th century A.D. The Newars have continued to copy Sanskrit manuscripts up to the present day. All Buddhists owe a debt to the Newars, through whose efforts we have been able to study these Sanskrit manuscripts in the present day.

eighty-six manuscripts, comprising 179 separate works, many were presented to Asiatic Society of Bengal. 85 went to the Royal Asiatic Society of London; 30 to the Indian Office Library; 7 to the Bodleian Library, Oxford; 174 to the Société Asiatique, and others reached French scholar Eugene Burnouf. The latter two collections have since been deposited in the Bibliothèque Nationale of France.”5

संस्कृत केवल अपने वैदिक या लौकिक साहित्य के बल पर दुनिया भर में नहीं गई बल्कि अपनी गणितीय और वैज्ञानिक उपादेयता के कारण भी गई और अरब तथा यूरोप के देशों में बहुत तेज़ी से लोकप्रिय भी हुई.इसी सत्य को प्रोफ़ेसर बर्नेट ने व्यापक शोध सन्दर्भों के साथ “1001 Inventions” conference. © FSTC 2010 में १५ जुलाई २०१० को लंदन में प्रस्तुत आलेख में संस्कृत के इस अवदान की सराहना करते हुए लिखा है-

“A great king of the Arabs whose name was al-Safaah. He heard that in India there were many sciences, and so he ordered that a wise man be sought, fluent in both Arabic and the language of Indian, who might translate one of the books of their widsom for him. … (He found a Jew) and gave him money so that he might travel to the city of Arin on the equator under ths signs of Aries and Libra, where day is equal to night throughout the year, neither shorter nor longer, thinking ‘perhaps he will succeed in bringing one of their wise men to the king’. So the Jew went, and after many subterfuges, persuaded one of the wise men of Arin to agree to go the king…The scholar, whose name was Kanka, was brought to the king, and he taught the Arabs the basis of numbers, i.e. the nine numerals. Then from this same scholar, an Arabic named Jacob b. Sharah translated a book containing the tables of the seven planets..the rising times of the zodiac signs, …the arrangement of the astrological houses, knowledge of the higher stars, and the eclipses of the luminaries (and it goes on in this way). There are several elements in this story which sound like the stuff of legend, and Ibn Ezra clearly wishes to make some claim for Jewish participation in the transmission of knowledge. But in in reality, what the text he translates introduces are Indian methods of plotting the movements of the planets and fixed stars scientifically. These had been brought to their most advanced form by Brahmagupta in Sanskrit in theBrahmasphutasiddanta in the late 7th century. These Sanskrit astronomical tables and their canons (descriptions of procedures) had been brought to Baghdad soon after its foundation at the beginning of the Abbasid era, in the time of the caliph al-Mansur (754-75). This was also the time when chess (Arabic shitranj) and a set of moralizing stories (Kalila wa-Dimna) concerning animals based on the Indian Pancatantra entered Islamic culture (also referred to in Ibn Ezra’s account). The astronomical tables, known as Sindhind, formed the basis Charles Burnett, The Introduction of Arabic Learning into England, London, 1997. of al-Khwarizmi’s tables and canons in the early 9th century. These were brought to the Islamic Spain, al-Andalus, and adapted to the meridian of Cordoba by Maslama al-Majriti in the late 9th century, and translated into Latin by Adelard of Bath in the early 12th century, as the first complete set of astronomical tables and their canons in Christendom .6

        चीन में भारतीय भाषाओं विशेष रूप से  हिंदी एवं संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों की रुचि देखते हुए मन गदगद है.यहाँ आज भी संस्कृत और चीनी में द्विभाषी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं.स्वतंत्र रूप से भी संस्कृत की पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं.नीचे कुछ पुस्तकों के विज्ञापन -चित्र उदाहरण के रूप में प्रस्तुत हैं-

Sanskrit and Chinese Bilingual Bodhicaryavatara (Chinese Edition) by Huang Bao Sheng (Jan 1, 2012)

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A History of Sanskrit Literature by Arthur A. Macdonell (Oct 1, 2005)

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o    Page 8  : … 8 SANSKRIT LITERATURE )(China can trace back its language and … See a random page   in this book.

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A Unique Collection of Twenty Sutras in a Sanskrit Manuscript from the Potala (Sanskrit Texts from the Tibetan… by Vinitia Tseng (Dec 31, 2010)

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Mindfulness in Early Buddhism: New Approaches through Psychology and Textual Analysis of Pali, Chinese and Sanskrit… by Tse-fu Kuan (Feb 19, 2008)

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o    Page 4  : … preserved in the later Sanskrit literature is also useful to my … See a random page   in this book.

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A History Of Sanskrit Literature by Arthur A. MacDonell (May 26, 2006)

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A History Of Civilization In Ancient India Based On Sanskrit Literature – Rationalistic Age (1000 BC – 242 BC… by Romesh Chunder Dutt (Feb 14, 2006)

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A History Of Civilization In Ancient India V2, Rationalistic Age: Based On Sanskrit Literature (1889) by Romesh Chunder Dutt (Jan 13, 2009)

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A History of Sanskrit Grammatical Literature in Tibet: Transmission of the Canonical Literature (Handbuch Der… by Pieter C. Verhagen (Jan 1, 1994)

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Research on Sanskrit Buddhist Sutras (Chinese Edition) by han ting jie (Apr 1, 2012)

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अंतर्जाल की दुनिया बहुत मायावी है लेकिन हमारी संस्कृत ने यहाँ भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है.हो सकता है कि हममें से बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी हो कि संस्कृत के आन लाइन शिक्षण -प्रशिक्षण का काम चल रहा है .लोग रुचि लेकर सीख-सिखा भी रहे हैं.नीचे दुनिया भर के कुछ उत्साही भाषा प्रेमियों को देखते हुए मैं देशवासी सभी संस्कृत प्रेमियों से अनुरोध करता हूँ कि वे अपनी कुछ ऊर्जा का उपयोग यहाँ भी करें-

MyLanguageExchange.com is doing “extraordinary things online.”

 

 

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  • अंतर्जाल की दुनिया बहुत मायावी है लेकिन हमारी संस्कृत ने यहाँ भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है.हो सकता है कि हममें से बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी हो कि संस्कृत के आन लाइन शिक्षण -प्रशिक्षण का काम चल रहा है .लोग रुचि लेकर सीख-सिखा भी रहे हैं.नीचे दुनिया भर के कुछ उत्साही भाषा प्रेमियों को देखते हुए मैं देशवासी सभी संस्कृत प्रेमियों से अनुरोध करता हूँ कि वे अपनी कुछ ऊर्जा का उपयोग यहाँ भी करें-

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डॉ.  गंगा प्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ प्रोफेसर एवं अध्यक्ष (हिन्दी पीठ), एशियाई संस्कृति ,भाषा एवं दर्शन विभाग , क्वाङ्ग्चौ वैदेशिक अध्ययन विश्व विद्यालय ,
क्वाङ्ग्चौ,चीन।नंबर-00862036204385 

 

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