लोक संस्कृति और आधुनिकता


डॉ.अमृता सिंह

कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर,

‘लोक’ शब्द की व्युत्पति संस्कृत के लोक (दर्शन) धातु में ‘घन’ प्रत्यय के योग से हुई है | प्राचीन काल से ही ‘लोक’ शब्द का प्रयोग होता आ रहा है | प्राचीन ग्रंथों – जैसे वेद , शतसाहस्री संहिता, उपनिषद आदि में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग ‘स्थान’ के  लिए किया गया है तो ऋग्वेद में इसका प्रयोग ‘जनसाधारण’ के लिए हुआ है |  वहीं भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, पतंजलि के महाभाष्य, पाणिनि के अष्टध्यायी में यह शब्द वेदेतर, सामान्य जन तथा शास्त्रेतर के लिए प्रयुक्त हुआ है | महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग साधारण जनता के अर्थ में किया है | इस प्रकार ‘लोक’ शब्द का अर्थ जहाँ स्थान के लिए प्रयुक्त होता है, वहां जनसाधारण का भी द्योतक है | अत: कहा जा सकता है की ‘लोक’ शब्द मुख्यतः सामान्य जन समूह का द्योतक है | 

संस्कृति शब्द ‘कृ’ धातु में ‘सम’ उपसर्ग और ‘क्रिन’ प्रत्यय लगाने से बना  है | ‘कृति’ का अर्थ है मनुष्य का किया हुआ कार्य, व्यवहार अथवा आचार | संस्कृति का अर्थ है अच्छी स्थिति, सुधारना-संवारना, शोधन करना आदि | अंग्रेज़ी में इसे ‘कल्चर’ कहा जाता है | संस्कृति शब्द ‘संस्कार’ से बना है | अत : संस्कृति का अर्थ हुआ विभिन्न संस्कारों द्वारा सामूहिक जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति मैकाइवर और पेज ने संस्कृति की परिभाषा इस प्रकार दी है – “संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में, कला में, साहित्य में, धर्म में, मनोरंजन और आनंद में पाए जाने वाले रहन-सहन और विचार के तरीकों में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति     है |”1 

लोक और संस्कृति से प्रभावित होकर ही व्यक्ति का विकास होता है | यदि लोक के अभाव में मानव जीवन की कल्पना असम्भव है तो वहीं संस्कृति का अभाव मानव जीवन को विश्रंखलित कर देता है | अत: यह कहना असंगत न होगा कि ‘लोक’ तथा ‘संस्कृति’ का गहरा संबंध है | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि हमारे लोक जीवन का दूसरा नाम ही लोक-संस्कृति है | लोक-संस्कृति किसी भी देश और जाति का दर्पण है, जिसमें उस देश तथा जाति की मान्यताएं, परम्पराएँ और रीतियाँ भावात्मक रूप से दृष्टिगोचर होती हैं | अनादिकाल से ही दुःख-सुख, युद्ध-शांति, हार-जीत, जीवन-मृत्यु आदि संसार के स्वाभाविक कार्य वयापारों ने मानव की अंतरात्मा को आलोकित कर उसकी प्रतिक्रियाओं व भावों को बढ़ाया   था | यही स्वाभाविक और सहज भावोद्रेक लोक-संस्कृति की सम्पति है, परन्तु यह दुर्भाग्य है कि हमारी गौरवशाली सभ्यता और संस्कृति को पाश्चात्यानुकरण के कारण हीन समझा जाने लगा है | वर्तमान समय में शिक्षित व अभिजात्य वर्ग ‘लोक-संस्कृति’ को ‘गंवारों की संस्कृति’, ‘धकोसलाबाज़ी’ कहकर अवहेलित कर रहा है |

            ‘लोक-संस्कृति’ का विकास ग्रामोन्मुखी व्यवस्था पर आधारित रहा है, जहाँ परिवार के बड़े बुजुर्गों का कर्तव्य छोटे सदस्यों की भावनाओं को समझना है, वहीं छोटों का अपने से बड़ों का सम्मान, आदर करना | किन्तु आधुनिकता के अन्धजाल में पारम्परिक रीतियाँ, प्राचीन परम्पराएँ टूट रही हैं | पीढ़ी का अंतर, प्रवास की स्थिति, पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण संयुक्त परिवार के टूटने के कारण बन रहे हैं | आज के युग में स्नेहपूर्ण संबंध कटुता में परिवर्तित हो रहे हैं | बदलते सामाजिक परिवेश तथा आर्थिक स्थिति के कारण वर्तमान समय में संस्कारों के प्रति विशेष उल्लास नहीं रहा है | विविध प्रकार के रीति-रिवाजों को ‘लोक-संस्कृति’ का प्राण तत्व तथा धरोहर माना जाता है, क्योंकि यही रीति-रिवाज मानव जीवन को नियमित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | वर्तमान समय में ये रीति-रिवाज कुछ धुंधले पड़ते जा रहे हैं |

            भारतीय ‘लोक-संस्कृति’ में संतान प्राप्ति के अवसर पर मंगलाचार की प्रथा व्यापक, प्रचलित और प्राचीन है | स्त्री की गोदभराई से लेकर शिशु जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन आदि कई अनुष्ठानों को परम्परागत रूप में मनाया जाता था, परन्तु अब आधुनिक युग में इसे ‘बेबी शावर’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है, जिसमें परम्पराओं को नहीं अपितु आधुनिक परिवेश को अपनाकर पार्टी के रूप में मनाया जाता है | एक ओर महंगाई की मार, दूसरी ओर आधुनिकता के खोखले आवरण और तीसरे समय की बचत के कारण यह सब सिमटता जा रहा है | जहाँ कुछ संस्कार दम तोड़ते-से दिखाई दे रहे हैं, तो कुछ साधारण रूप से मनाए जा रहे हैं, वहीं विवाह ही एक मात्र ऐसा संस्कार रह गया है जिसमें पारम्परिक तथा आधुनिकता का पूर्ण समावेश दृष्टिगत हो रहा है | व्रत, त्यौहार और पर्व हमारे समाज के विशिष्ट अंग हैं | ऋतुओं के परिवर्तन के साथ अनेक व्रत और त्यौहार जुड़े हुए हैं | प्रत्येक पर्व, त्यौहार के आयोजन की पृष्ठभूमि में कुछ-न-कुछ उद्देश्य अवश्य है | इस सन्दर्भ में डॉ. विद्या चौहान का कहना है कि “व्रत का अर्थ है अटल निश्चय | मन एवं इन्द्रियों को माया मोह से परे हटाकर आराध्य के प्रति केन्द्रित करने का संकल्प व्रत है |”2  हमारे समाज में पारिवारिक कुशलता हेतु अनेक व्रत किए जाते हैं | लोक विश्वासानुसार व्रत से मन के विकार नष्ट होते हैं, आध्यात्मिक शक्ति तथा संयम बढ़ता है | वहीं त्योहारों की महत्वता उजागर करते हुए डॉ. राजेंद्र प्रसाद कहते हैं “हमारे गावों के जीवन का त्यौहारों से बड़ा गहरा संबंध है | ग्रामीण जनता में इनके द्वारा न केवल धार्मिकता जगी रहती है, वरन ये मनोरंजन और शिक्षा के भी साधन रहे हैं |” 3 पर्व हमारे आचार-विचार, रहन-सहन,खान-पान,वेशभूषा,लोकविश्वास तथा कर्मकांडों के परिचायक हैं | प्रत्येक त्यौहार के आयोजन की पृष्ठभूमि में कोई-न-कोई उद्देश्य अवश्य है | अक्षय तृतीया, रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, करवाचौथ, दीपावली, भाई दूज, होली, मकर संक्रांति, बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि आदि त्यौहारों को उल्लासपूर्वक मनाया जाता है, फिर भी वर्तमान स्थिति में कुछ विसंगतियों के उत्पन्न होने के कारण इन पर्वों को मनाने के स्तर निम्न होते जा रहे हैं |

बाल जीवन में मनोरंजन के लिए अनेक खेल खेले जाते हैं | किन्तु आज के इस आधुनिक जीवन में हम लगभग इन खेलों को भुला चुके हैं | गाँव में आज भी कब्बडी, खो-खो, छुआ-छुऔवल, गुल्ली डंडा आदि जैसे खेल खेले जाते हैं, जो अब भी अपनी सरलता एवं व्यय विहीनता के कारण लोकप्रिय हैं, परन्तु शहरों की स्थिति इसके विपरीत है | शहरी आचरण और भाग दौड़ वाले वातावरण ने बच्चों का बचपन छीन लिया है | इस कम्प्यूटर युग में बच्चे खेलना छोड़कर कम्प्यूटर, विडियो गेम्स, टी.वी. जैसे उपकरणों के आदी बनते जा रहे है | वर्तमान समय में क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन जैसे खेल अंतर्राष्ट्रीय स्त्रर पर लोकप्रिय हैं तो वहीं ग्रामीण जीवन का प्रचलित खेल कब्बडी भी आज अंतर्राष्ट्रीय स्त्रर का खेल बन चुका है, जिसका उदाहरण है पंजाब सरकार द्वारा सन 2010 में आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय कब्बडी टोरनामेंट’ | डॉ. रहमत उल्लाह के अनुसार “इनसे लोकजीवन के आमोद-प्रमोद तो होता ही है, साथ-ही-साथ भारत की सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक परम्पराओं की ओर संकेत भी मिलता है |”4

            साहित्य के समान, लोकगीत भी समाज का दर्पण है | जन साधारण द्वारा गाए जाने वाले गीत ‘लोकगीत’ कहलाते हैं | लोकगीत मानव ह्रदय की सहज कोमल भावों की अभिव्यक्ति है जिसमें किसी प्रकार के छंदों और भाषा का बंधन नहीं होता | लोकगीतों में समाज के समस्त पहलुओं सुख-दुःख, राग-विराग, आशा-निराशा, रहन- सहन, विश्वास और परम्पराओं का सजीव चित्रण प्राप्त होता है | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि लोकगीत प्रथाओं, रीती-रिवाजों और आंतरिक जीवन की मनोवैज्ञानिक गहराई को अभिव्यक्त करते हैं | डॉ. सदाशिव फकड़े के अनुसार “लोकगीत विद्या देवी के बौधिक उद्यान के कृत्रिम फूल नहीं हैं | वे मानो अकृत्रिम निसर्ग के श्वास-प्रश्वास है | सहजानन्द में से उत्पन्न होने वाली श्रुति मनोहरत्व से सच्चिदानन्द में विलीन हो जाने वाली आनंदमयी गुफायें हैं |”

समाज में विवाह को एक नैतिक बंधन, धर्म तथा समाज की दृढ़ श्रृंखला  के रूप में स्वीकारा गया है | वर्तमान समय में भी वैवाहिक विधि-विधानों की प्रमुख रूप-रेखा वही है जो आज से कई वर्षों पूर्व थी | विवाह संस्कार का पूरा प्रकरण आदि से अंत तक गीतों को आश्रय करके चलता था | प्राय: इस अवसर पर दोनों ही पक्ष सरस और भावपूर्ण गीत गाते हैं | पहले विवाह के हर अवसर पर लोकाचारों और मंगलाचारों की अभिव्यक्ति होती थी और विवाह प्रकरण में लोकगीतों की धूम बनी रहती थी, विवाह के हर्ष-विषादमय वातावरण को यह लोकगीत अपने में समेटे हुए थे | किन्तु आधुनिक समाज में इस अवसर पर लोकगीत नहीं गाए जाते बल्कि ‘डी.जे’ बुलवाकर नए फ़िल्मी गीतों, रआप सोंग्स आदि पर थिरका जाता है |

लोकगीतों के माध्यम से लोकजीवन की साधना पद्धति, लोक धर्म, लोकविश्वास को जाना जा सकता है | किसी भी देश के जन-जीवन का अनुमान त्यौहार तथा उत्सवों से लगाया जाता है | भारतीय संस्कृति में मनाए जाने वाले प्रत्येक उत्सव के अनेक मत एवं कारण हैं तथा इनकी पृष्ठभूमि में धार्मिक पवित्रता दिखाई देती है | जनसाधारण में ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा, भक्ति तथा विश्वास रहता है | सुख-दुःख, दुष्कर्म, सुकर्म में वह ईश्वर का स्मरण करता है | लोकविश्वास के अनुसार त्यौहारों व उत्सवों के दिन किया हुआ जप, तप, ज्ञान, दान फलदायक होता है | भजन तथा आरती गाकर ईश्वर के प्रति भक्त हृदय की कोमल भावनाओं का आध्यात्मिक समर्पण कर सुख एवं शांति प्राप्त करने की प्रार्थना करता है | अतः कहा जा सकता है लोकगीत लोक के गीत हैं, जीवन के गीत हैं, आध्यात्मिक गीत हैं | लोकगीत के लिए ग्रामगीत, जनगीत आदि अनेक शब्दों का प्रयोग होता है, जो लोक गीतों की विविध विशेषताओं के परिचायक होते हैं | लोकगीत जनवर्ग द्वारा गाँव-गाँव में गाए जाते हैं | उनके लेखकों का पता नहीं होता पर वे गाँव में सभी के द्वारा- स्त्री, पुरुष, शिक्षित-अशिक्षित, धनी-निर्धन सभी के मध्य प्रचलित होते हैं | लोक गीत द्वारा मन की अभिव्यक्ति बड़े बेबाक और खुले रूप में होती है | उदाहरणत: अवधी लोकगीत ‘बाबा निबिया के पेड़’ बेटी की विदाई की वेदना को अपने में समेटे हुए है जिसे लोक मानस नीम के पेड़ के माध्यम से अभिव्यक्त करता है | नीम चिड़ियों का बसेरा है उसी प्रकार जैसे मायका बेटियों का | माता-पिता बड़े जतन से बेटी का पालन-पोषण करते हैं, विवाह पश्चात् ससुराल चले जाने पर घर सूना हो जाता है जिसे वह इस प्रकार व्यक्त करते हैं-

                  “बाबा निबिया के पेड़ जिनी काटई ,

                       निबिया चिरैया बसेर,

                  बिटियन जिनि दुःख देहु भोरे बाबा

                      बिटियै चिरइया के नाय |

                  सगरी चिरइया उड़ी जइहैं  बाबा,

                     रहि जइहैं निबिया अकेलि

                  सगरी बिटियवै चली जइहैं ससुरे,

                     रहि जइहैं मइका अकेलि |” 6

लोकगीतों का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है, ये ऋतुओं की मादकता से लेकर पर्वोत्स के हर्षोल्लास तथा जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों में समाए हुए हैं; किन्तु आधुनिकता की चकाचौंध में लोकगीत इतिहास के पन्नों में ही गुम होते जा रहे  हैं | ढोल-मंजीरे की धुन डीजे और बैंड-बाजों के शोर में विलीन होकर रह गई है | पहले होली तथा दीपावली जैसे त्यौहार पारंपरिक लोकगीतों और रीती-रिवाजों के साथ मनाए जाते थे, परन्तु अब हाईटेक होली और दीवाली ने लोक-परम्परा को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया है | इसी प्रकार ग्रामीण परिवेश, ऋतुओं तथा सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति करता ‘कजरी’ लोकगीत जिसे लोकगीतों की रानी भी कहा जाता है, अब बदलते परिवेश और आधुनिकता की दौड़ में कहीं लुप्त होता जा रहा है | लोकगीतों के माध्यम से लोक-संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गतिशील रूप से पहुंचती थी लेकिन आधुनिकता इसे धीरे-धीरे निगल रही है | वर्तमान स्थिति तो यह बन पड़ी है कि इस परम्परा को बढ़ाने वाले लोग अब रहे नहीं और नई पीढ़ी में इसे सीखने या इसकी संरक्षा करने की ललक नहीं है |

लोकगीत की भांति लोक नाटकों का भी जीवन से घनिष्ट सम्बन्ध है | लोक नाटक भी आम लोगों द्वारा रचे जाते हैं, जिनमें आम लोगों की पीड़ा, दुःख-दर्द, आशाओं-आकांक्षाओं, शोक-शिकायतों आदि को पारंपरिक कथा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है | इनका कथानक प्राय: सामाजिक, पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक होता है | प्राय: इन नाटकों में सामाजिक दोषों और बुराइयों पर व्यंग्य किया जाता है | लोक संस्कृति में अनेक लोक नाटकों का महत्वपूर्ण स्थान है जैसे कश्मीर का ‘बॉड-पाथेर’, गुजरात का ‘भवई’, महाराष्ट्र का ‘तमाशा’, बंगाल का ‘जात्रा’, उत्तर प्रदेश की ‘नौटंकी’, केरल में प्रचलित ‘यक्षगान’, तेलुगु का ‘विथि नाटकम’ आदि | ‘यक्षगान’ लोकनाटक का कथानक पौराणिक है, बंगाल का ‘जात्रा’ तथा उतर प्रदेश की ‘रामलीला’ और ‘रासलीला’ धार्मिक आख्यान हैं तो वहीं ‘नौटंकी’ और ‘स्वांग’ की कथावस्तु समाज से संबंधित हैं | ‘बॉड-पाथेर’ कश्मीरी लोक नाटकों की एक श्रंख्ला को कहते हैं | विषय वस्तु के आधार पर आठ ‘बॉड-पाथेरों’ की परम्परा है- वातल पाथेर (मेहतर का), बुहुर्य पाथेर (पंसारी  का), राजु पाथेर (रजा का), दरजू पाथेर (दरज जाति की स्त्री का), बकरवाल पाथेर (बकरवाल का), ग्वासाइन पाथेर (गोसाईं साधू का), अँगरेज़ पाथेर (अंग्रेज़ का), शिकारगाह पाथेर (शिकारी तथा वन्य पशुओं का) | इन सभी पाथेरों की कथाएँ, वार्तालाप, वेशभूषा तथा साजसज्जा निश्चित है | ‘बॉड-पाथेर’ का आरम्भ ‘सुरनय’ अर्थात् शहनाई के वादन से होता है | नाटक का सूत्रधार या मुख्य पात्र जिसे ‘मागुण’ कहा जाता है प्रवेश कर नाटक का परिचय देता है और ‘मसखरे’ ढोलक की थाप तथा  शहनाई की लय पर गीत गाते और नाचते हुए नाटक को आगे बढ़ाते हैं | किन्तु आधुनिकता की चकाचौंध के आगे यह सब कहीं पीछे छूटता चला जा रहा है | लोकनाटकों की इन कलाओं को सुरक्षित तथा विकसित करने के लिए इन अभिनेताओं को सरकारी प्रोत्साहन दिया जाने लगा है | इनके संरक्षण हेतु इन नाटकों का प्रदर्शन न केवल देश के दूर-दूर के क्षेत्रों में बल्कि विदेशों में भी किया जा रहा है | जिसके चलते भारीतय परिषद् के सहयोग से नई दिल्ली अकादमी ने जर्मनी, फ्रांस, मलेशिया, त्रिनिदाद, टोबागो, थाईलैंड आदि जैसे देशों में राज्य सांस्कृतिक मंडल के दौरे को प्रायोजित किया है |

भारीतय संस्कृति में लोकपर्व, त्यौहार, अनुष्ठान और संस्कार में लोकचित्रों का आलेखन अनिवार्य रूप से होता है | लोकचित्र लोक प्रचलित चित्र हैं, जो पारम्परिक रूप से लिखे गए हैं | लोक कथाओं और लोक प्रचलित किंवदंतियों के आधार पर ही इन्हें रेखांकित किया जाता है | इन चित्रों में प्राकृतिक वनस्पति (पेड़, पौधे, फूल-पत्ते, बेलें), पशु-पक्षियों (हाथी, घोडा, मोर आदि), सांस्कृतिक प्रतीक (स्वस्तिक, शंख, चन्द्र, सूर्य आदि ) को स्थान मिला है | चित्रकला का मूल केन्द्र ‘बिंदु’ है, जिससे रेखा निर्मित की जाती है और इन रेखाओं से शब्द, चित्र और अनन्त की सृष्टि होती है | लोक संस्कृति में किसी भी शुभ अवसर पर घर की दीवारों, आँगन, देहरी, दीवाल और द्वार पर इन चित्रों को अंकित किया जाता था, जिन्हें ‘भिति चित्र’ कहा जाता था | ‘भिति चित्र’ त्रिकोण, चतुष्कोण, षट्कोण आदि कई प्रकार के होते हैं | कृष्ण जन्माष्टमी, दीपावली, करवाचौथ, नागपंचमी जैसे त्यौहारों पर आध्यात्मिल और भौतिक दृष्टि से भिति चित्र का एक अलग ही महत्व था परन्तु वर्तमान समय में यह कला भी अपना महत्व खोती जा रही है | इसी प्रकार लोक कला का क्षेत्र भी विस्तृत था जिसमें बिहार की ‘मधुबनी’ और महाराष्ट्र की ‘वरली’ उल्लेखनीय हैं | बिहार की लोककला मधुबनी का अर्थ है माधुर्य-बन अथवा शहद-उद्यान | इस कला का सम्बन्ध राधा-कृष्ण की लीलाओं से है | मधुबनी कलाकृतियाँ तैयार करने के लिए हाथ से बने कागज़ को गोबर से लीपकर उसपर वनस्पति रंगों से पौराणिक गाथाओं को चित्रों के रूप में उतारा जाता है ; फिर बांस की तीलिओं में रुई लपेटकर तुलिकाएँ तथा हल्दी, चूने, बरगद की पत्तिओं, फूलों आदि से रंग तैयार किए जाते हैं और इन रंगों को स्थायी और चमकदार बनाने के लिए उसमें बकरी का दूध घोला जाता है | इस कला में देवी-देवताओं तथा मानव के चित्रों के साथ-साथ प्राकृतिक विषय, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और ज्यामितीय आकारों को विशेष स्थान दिया जाता है | महाराष्ट्र के ठाणे जिले में रहने वाले आदिवासिओं द्वारा विकसित लोककला को वरली लोककला के नाम से जाना जाता है | इन कलाकृतियों को विशेष रूप से विवाह के समय बनाया जाता था | यह कलाकृति गोबर-मिटटी की सतह वाली दीवार पर बनाई जाती थी, परन्तु अब इसे कैनवास पर चित्रित किया जाता है | इसके अतिरिक्त इस लोककला का चित्रण अब प्रिंट माध्यम से साड़ियों-चादरों आदि और धागे की कढ़ाई के रूप में भी किया जाने लगा है |  आधुनिल प्रकार से प्रस्तुत की जा रही इन कलाकृतियों का वर्तमान समय में पारम्परिक रूप और अस्तित्व विलुप्त होता जा रहा है | 

इसी प्रकार गुदना या गोदना गुदवाने में कई मान्यताएं और विश्वास के साथ    अंग को सुंदर बनाने की भावना निहित थी | गुदना कला का प्रचलन आदिम जनजातियों में था | उनकी मान्यता है कि गुदना स्त्री के सच्चे आभूषण हैं, जो सदा उनके साथ रहते हैं इसलिए स्त्रियाँ गुदने को सौभाग का प्रतीक मानकर अपने शरीर पर गुदवाती थीं |  पर आज के समय में पारंपरिक गुदना के प्रति आकर्षण घटता जा रहा है और पाश्चात्य प्रभाव के कारण टैटो (Tattoo) खूब प्रचलित हो रहा है |

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि आधुनिकता ने सांस्कृतिक मूल्यों पर ऐसा आक्रमण किया कि प्राचीन चिंतन पद्धति का उपहास, सांस्कृतिक परिवेश से घृणा, अपनी परम्पराओं के प्रति आक्रामक रवैया आज की पीढ़ी में नज़र आता है | यह परिवर्तन अबाध गति से आधुनिक संस्कृति की ओर बढ़ने के कारण हो रहा है | अतः आधुनिकता के इस दौर में लोक-संस्कृति के संरक्षण की अति आवश्यकता है, जिसके लिए संस्कृतिकर्मियों, कलाकारों के साथ-साथ सरकार को भी आगे आना होगा |

सन्दर्भ सूची :

  1. सिंह, (डॉ.) विजय नारायण, आदर्श हिंदी निबंध, पृ. 220
  2. परदेशी, (डॉ.) अर्चना, भारतीय संस्कृति एवं लोकगीत, पृ. 96
  3. वही, पृ. 96
  4. वही, पृ. 177
  5. वेदप्रकाश, बोधा के काव्य में जीवन मूल्य, पृ. 83
  6. वर्मा, विमलेश कान्ति (सम्पा.) और मालती, भाषा साहित्य और संस्कृति, पृ. 323

 

 

Leave a Reply

WordPress spam blocked by CleanTalk.