शांतिनिकेतन में गांधीजी 


बिजय कुमार रबिदास,

अतिथि शिक्षक, हिन्दी विभाग

कल्याणी विश्वविद्यालय,पश्चिम बंगाल

भारतीय इतिहास में सन 1913 अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं गौरव का वर्ष है । इस समय दो ऐसी घटनाएं हुई जिसने पूरे विश्व का ध्यान भारत की ओर आकर्षित किया । एक ओर साहित्य के क्षेत्र में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का नाम ‘नोबल पुरस्कार’ के विजेयता के रूप में घोषित हुआ तो वहीं दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास करमचन्द गांधी एक आंदोलनकारी नेता के रूप में उभरे । यही वह समय था जब ये दोनों जननायक एक उज्जवल नक्षत्र की तरह विश्व आकाश में चमके और आगे चलकर पूरे देश की सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की गति को एक नई दिशा दी ।

दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी ने ‘सत्याग्रह’ के जरिए अंग्रेजी शासन की जड़े हिला दी थी । आंदोलन के दौरान वे सही निर्देश और दिशा की आवश्यकता महसूस कर रहे थे । इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु गोखलेजी को एक पत्र लिखा । गोखलेजी का निर्देश लेकर सी. एफ. एण्ड्रयूज और पियर्सन दक्षिण अफ्रीका जाने की तैयारी करने लगे । जाने से पहले वे अपने गुरु रवीन्द्रनाथ से आशीर्वाद लेने शांतिनिकेतन पहुँचे । वहां आम्रकुंज में उनके लिए एक विदाई-सभा का आयोजन किया गया था, जिसमें पियर्सन महोदय अपनी बात रखते हुए कहा था, “शांतिनिकेतन के आश्रम से जो शान्ति हम साथ ले जा रहे हैं वह दक्षिण अफ्रीका के कार्य में हमारी सहायता करेगी ।”1

‘सत्याग्रह’ आंदोलन सफल होने के बाद गांधीजी अफ्रीका छोड़कर इंग्लैंड होते हुए भारत लौटने की सोच रहे थे । पर ‘फिनिक्स विद्यालय’ के विद्यार्थियों को लेकर एक समस्या उत्पन्न हो गई । समस्या यह थी कि उन्हें कहां ले जाया जाए ? भारत में वे कहां रहेंगे ? जब तक वे स्वदेश नहीं लौट जाते तब तक उनके लिए एक स्थायी बंदोबस्त करना जरुरी था । ऐसे में गांधीजी का ध्यान अपने मित्र एण्ड्रयूज की ओर जाता है । दक्षिण अफ्रीका से एण्ड्रयूज और पियर्सन को शांतिनिकेतन लौटे अभी कुछ ही महीने हुए थे कि अचानक इंग्लैंड से एण्ड्रयूज के नाम से गांधीजी का भेजा एक तार मिला, जिसमें कहा गया था- “फिनिक्स मंडली के विद्यार्थी भारत लौट रहे हैं…अगर किसी उपयुक्त आश्रम में उनकी व्यवस्था हो जाए तो गांधीजी निश्चिन्त होंगे ।”2 पियर्सन महोदय ने गुरुदेव से चर्चा करके उन्हें आने की अनुमति दे दी । वे लड़के गांधीजी के भतीजे मगनलाल गांधी के साथ भारत लौट रहे थे । संख्या में वे अठारह थे और उनमें से तो कुछ बहुत ही कम उम्र के थे । इन लड़कों में गांधीजी के तीन लड़के भी थे । श्री मगनलाल इन लड़कों के अध्यापक एवं अभिभावक की तरह थे । रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बड़ी प्रसन्नता से शांतिनिकेतन में उनका स्वागत किया । ये लड़के खूब मेहनती थे और अपना सारा काम-काज स्वयं करते थे । इनके रहन-सहन, आचार-विचार सबकुछ शांतिनिकेतन के आश्राम-जीवन से भिन्न था । यहां वे स्वतंत्र रूप से रह सके, इसके लिए रवीन्द्रनाथ ने अपने निवास स्थान ‘देहली’ के करीब ‘नूतन बाड़ी’ में उनके रहने की व्यवस्था कर दी ।

फिनिक्स विद्यार्थियों के आने के बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एण्ड्रयूज के माध्यम से गांधीजी को शांतिनिकेतन आने का निमंत्रण भिजवाया । गांधीजी ने सहर्ष निमंत्रण स्वीकार किया और शांतिनिकेतन की यात्रा पर निकल पड़े । रवीन्द्रनाथ उन दिनों कलकत्ता में थे । उनके निर्देशानुसार आश्रमवासी अतिथि के स्वागत कार्य में जुट गए । 17 फरवरी, 1915 को गांधीजी अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ पहली बार शांतिनिकेतन आए । उनका स्वागत हिन्दू-रीति-विधान के अनुसार किया गया । उनके स्वागत के लिए आश्रम में तीन तोरण(द्वार) बनाए गए थे । पहले द्वार पर चन्दन और फूलों से उनका स्वागत किया गया और एक सुन्दर सी माला पहनाई गई । इस अवसर पर आश्रम के संगीत अध्यापक श्री भीमराव शास्त्री ने एक स्वागत गान गाया । फिर वे दूसरे द्वार पहुँचे । वहां उन्होंने अपने पैर धोए और वहां भी एक माला पहनाई गई । फिर वे तीसरे द्वार पहुँचे । वहां वैदिककालीन वेदी के जैसा एक मिट्टी का आसन बना हुआ था । “चार केले के स्तम्भ और आम्रपल्लव सहित जल से पूर्ण चार कलश चारों कोनों पर सजाये गए थे । अभ्यर्थना के चार थाला में प्रत्येक में पांच-पांच दीपक सजाकर गांधीजी और उनकी पत्नी के सामने रखे गए थे । महिलाओं की ओर से एक बालिका ने उन्हें फूलों की माला पहनाई, श्रीमती गांधी के ललाट पर सिंदूर की बिंदी लगाई ।”3 जब उन्होंने अपना आसन ग्रहण किया तब क्षितिमोहन और दत्तात्रेय कुछ वैदिक मंत्रों का पाठ कर रहे थे । उसके बाद दिनेनेद्रनाथ ठाकुर ने अपनी संगीत मंडली के साथ एक गीत गाया ।

इस प्रकार जनाकूल से दूर हरे कुंजों की छाया में शांतिनिकेतन ने पूरे बंगाल की तरफ से भारतवर्ष के भावी नेता का विशुद्ध भारतीय विधि से स्वागत किया । शांतिनिकेतन की सादगी, कला, संगीत और स्नेह ने गांधीजी को अभिभूत कर दिया । इस अवसर पर उन्होंने कहा, “आज जिस आनंद का मैं अनुभव कर रहा हूँ वैसा इसके पहले कभी नहीं किया था । यद्यपि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ यहां नहीं हैं फिर भी अपने हृदय में हम उनकी उपस्थिति का अनुभव कर रहे हैं । मुझे इस बात से और भी खुशी है कि भारतीय ढंग से आपने स्वागत का आयोजन किया है । बम्बई में बड़ी धूम-धाम से हमारी आवभगत की गई लेकिन उसमें ऐसी कोई चीज़ नहीं थी जिससे हमें प्रसन्नता होती । क्योंकि वहां पर पाश्चात्य ढंग की बड़ी सावधानी से नक़ल की गई थी । पूर्व के विधि-विधान को अपना कर ही हम अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो सकेंगे, पश्चिमी ढंग को अपनाकर नहीं, क्योंकि हम पूर्व के हैं । भारतवर्ष के सुन्दर रीति-रस्मों और रिवाजों को अपनाकर ही हम अपना विकास कर पाएंगे और उसकी अंतरात्मा के वैशिष्ट्य के अनुरूप भिन्न-भिन्न आदर्शोंवाले राष्ट्रों के साथ मैत्री-संबंध स्थापित कर सकेंगे । ….बंगाल के इस आश्रम के साथ आज मेरा घनिष्ठ संबंध हो गया है । अब मैं आपके लिए अजनबी नहीं रह गया ।”4

शांतिनिकेतन में गांधीजी का स्वागत पूर्णरूप से भारतीयता से अनुप्राणित था । रवीन्द्रनाथ ने कलकत्ते से जो पत्र एण्ड्रयूज को लिखा था और उसमें उनके स्वागत की जैसी आशा की थी, उसे आश्रमवासियों ने पूरी तरह निभाया । संभव है 18 फरवरी, 1915 को अपने लिखे पत्र में उन्होंने सबसे पहले गांधीजी के लिए ‘महात्मा’ शब्द का प्रयोग किया था । उन्होंने लिखा था, “मैं समझता हूँ कि महात्मा और श्रीमती गांधी बोलपुर पहुँच गए हैं और शांतिनिकेतन ने उनकी उपयुक्त अभ्यर्थना की है । उनसे मिलने पर मैं स्वयं अपना व्यक्तिगत स्नेह व्यक्त करूँगा ।”5 गांधीजी भी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, “अध्यापकों और विद्यार्थियों ने अपने स्नेह से मुझे अभिभूत कर दिया । अभ्यर्थना-समारोह सादगी, कला, और स्नेह का एक सुंदर संमिश्रण था ।”6

गांधीजी अक्सर ट्रेन के तीसरे दर्जें में यात्रा करते थे । बोलपुर स्टेशन पर जो लोग उन्हें लेने गए थे । वे उन्हें प्रथम और दूसरे दर्जें में खोज रहे थे । उन्हें न पाकर जब वे लोग लौटने को हुए तभी उन्होंने देखा की गांधीजी तीसरे दर्जें के डब्बे से उतर रहे हैं । वे बहुत ही साधारण पोशाक पहने हुए थे और उनके पैरों में जूतें भी नहीं थे । उस दिन वे स्टेशन से आश्रम तक खाली पैर पैदल गए थे । 

गांधीजी शांतिनिकेतन में शांति से कुछ समय बीताने की आशा से आये थे लेकिन दुर्भाग्यवश 18 फरवरी को तड़के ही गोखले की मृत्यु का तार उन्हें मिला । दिवंगत नेता की याद में उस दिन आश्रम बंद हो गया और एक शोकसभा का आयोजन किया गया । जिसके सभापतित्व करते हुए गांधीजी ने कहा था, “मैं असली जननायक की खोज में निकला था और समूचे भारत में केवल एक को पाया और वह व्यक्ति गोखले थे ।”7 उस दिन वे अपनी पत्नी और मगनलाल के साथ पूना के लिए रवाना हो गए ।

तीन दिनों बाद (22 फरवरी) को रवीन्द्रनाथ शांतिनिकेतन आए । उनके आने के कई दिनों बाद गांधीजी भी पूना से सीधे शांतिनिकेतन पहुँचे । 6 मार्च, 1915 को वह पुण्य वेला आई, जब दोनों महापुरुषों का प्रथम साक्षात्कार हुआ । दोनों ने बड़ी आत्मीयता से एक दूसरे से मुलाकात की । इसके बाद से ही गांधीजी का वास्तविक कार्यक्रम शांतिनिकेतन में शुरू होता है । वे बहुत जल्दी आश्रम के छात्रों के साथ घुलमिल गए । किसी को ऐसा प्रतीत ही नहीं हुआ कि वे यहां अतिथि हैं । वे आश्रम की परिक्रमा करने लगे । छोटी से छोटी वस्तुओं को बड़ी गम्भीरता से देखने लगे । इन सबके अलावा उनका ध्यान चारों ओर की गंदगी और अव्यवस्थाओं की ओर भी गया । विद्यार्थियों की सेवा में जुटे नौकरों और रसोइयों को भी देखकर उनका मन थोड़ा व्यथित हुआ । रवीन्द्रनाथ यहां आश्रम जीवन का निर्माण कर रहे थे, जिसका आदर्श था- बच्चों को स्वावलंबी बनाना । गांधीजी ने लक्ष्य किया कि जब तक विद्यार्थी अपना काम स्वयं नहीं करते तब तक वे स्वावलंबी कैसे बन सकते हैं ? और बिना स्वावलंबी हुए स्वराज्य कैसे मिल सकता है ? दूसरी तरफ उन्होंने देखा कि आश्रम की पाठशाला और भोजनगृह में हिन्दू समाज के प्रायः सभी रूढ़ि रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है । सवर्ण विद्यार्थी आश्रम के अन्य छात्रों के साथ भोजन नहीं करते । वे अपने अभिभावकों द्वारा निर्देशित नियमों के अनुसार जातिगत नियमों का पालन करते हैं । “आश्रम जीवन के इस पहलू ने उन्हें काफी विचलित किया और वे विचार करने लगे कि किस प्रकार इन अव्यवस्थाओं को दूर करके आश्रम-जीवन को अधिक सरल, सहज और स्वावलंबी बनाया जाए ।”8 उन्होंने गुरुदेव से विचार-विमर्श किया और गुरुदेव ने उन्हें अपने अनुसार कार्य करने की अनुमति दे दी । इस घटना का बड़ा रोचक वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया हैं, जो इस प्रकार है, “जैसी की मेरी आदत है बहुत जल्दी मैं अध्यापकों और विद्यार्थियों से हिलमिल गया और स्वावलंबन की चर्चा उनसे छेड़ दी । मैंने अध्यापकों से कहा कि अगर वे तथा विद्यार्थीगण रसोइये न रखकर स्वयं भोजन बनाने लग जाए तो इससे अध्यापकगण लड़कों को शारीरिक और नैतिक स्वास्थ्य की दृष्टि से रसोईघर को नियंत्रण में रख सकते हैं और विद्यार्थीगण उससे स्वावलंबन की शिक्षा पा सकते है । उनमें से एक या दो तो सिर डुलाकर ना करना चाहते थे लेकिन कुछ ने इस प्रस्ताव का जोरों से समर्थन किया । और कुछ नहीं तो इसके नयेपन के लिए लड़कों ने इसका स्वागत किया । उनमें नयापन के लिए एक सहज रूझान रहती है । अतएव हमलोगों ने इस कार्यक्रम को चालू कर दिया ।”9 गांधीजी चाहते थे कि प्रत्येक आश्रमवासी अपना कार्य स्वयं करें और वे किसी दूसरे पर निर्भर न रहे । उनके इस नए प्रयोग से कुछ ही दिनों में शांतिनिकेतन परिष्कृत, सुन्दर और आत्मनिर्भर दिखने लगा । उसी वर्ष 10 मार्च को उन्होंने स्वावलंबन व्रत का प्रवर्तन किया था । वह स्मरणीय दिन आज भी यहां ‘गांधी पुण्याह’ के नाम से मनाया जाता है । इस दिन पूरे विश्विद्यालय के प्रांगण में सफाई अभियान चलता है ।    

गुरुदेव की साधना भूमि शांतिनिकेतन गांधीजी का प्रिय स्थान था । दूसरी बार वे यहां 13 सितम्बर 1920 को आए । इस बार वे यहां 13 से 17 सितम्बर तक कुल पांच दिन ठहरे ।  17 सितम्बर को उन्होंने जो भाषण दिया था, वह इस प्रकार है, “आपके साथ थोड़े दिन के सहवास का जो आनंद मिला, वह तो अवर्णनीय है । मैं अपनी गिरी हुई तंदुरुस्ती सुधारने यहां आया था और आप को यह जानकर आनंद होगा कि मैं बिलकुल स्वस्थ होकर नहीं, तो भी पहले से काफी अच्छी सेहत लेकर जरुर जाऊंगा । मुझे यह बुरा लग रहा है कि आपके साथ बंगला में बातें नहीं कर सकता । मेरे ख्याल से किसी दिन आपके साथ बंगला में बात करने की मेरी आशा चाहे पूरी न हो, तो भी मेरी यह आशा तो हरगिज अनुचित नहीं कि आप मेरी हिन्दुस्तानी समझ सकेंगे । जब तक आपके स्कूल में हिन्दुस्तानी अनिवार्य विषय न हो जाए और आप उसे सीख न लें, तब तक आपकी शिक्षा सम्पूर्ण नहीं कही जा सकती ।”10 गांधीजी खड़ी बोली हिन्दी को हिन्दुस्तानी कहते थे । शांतिनिकेतन में उन्होंने हमेशा हिन्दी में ही भाषण दिया और आश्रम के अन्य लोगों से हिन्दी सीखने के लिए अपील भी की । अपने इसी भाषण में उन्हनें आगे कहा था, “मेरे लिए तो केवल एक धर्म है । वह है हिन्दू धर्म । मैं अपने को हिन्दू कहता हूँ और उसमें गर्व का अनुभव करता हूँ,मगर मैं कोई कट्टर कर्मकाण्डी हिन्दू नहीं हूँ । मैं हिन्दू धर्म को जिस प्रकार समझता हूँ, तदनुसार वह अत्यंत व्यापक है । उसमें अन्य सब धर्मों के लिए समभाव है । आदर है ।”11 आगे उन्होंने अहिंसा पर भी अपनी बातें रखी थी । उनकी दृष्टि में, “अहिंसा के मार्ग पर चलनेवाले की सभी तरह कुशल है । अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले को जो शस्त्र प्राप्य हैं, वे हिंसामार्गी को मिल सकनेवाले शस्त्रों से अधिक जोरदार हैं ।”12 अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति  पूरे संसार को अपने वश में कर सकता है ।

जैसे-जैसे समय गुजरता गया, गुरुदेव के साथ उनका स्नेह-संबंध बढ़ता गया । 29 मई, 1925 को वे फिर एक बार शांतिनिकेतन आए । इस बार उनकी यात्रा का उद्देश्य राजनीतिक था । एण्ड्रयूज महोदय ने अन्य लोगों के साथ उनका स्वागत किया । शांतिनिकेतन में उन्हें एक फूलों से सजे कमरे में ले जाया गया । उन्होंने गुरुदेव से प्रश्न किया, “नव वधू के इस घर में मुझे क्यों लाया गया है ?”13 गुरुदेव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “हमारे हृदयों की चिरयुवा रानी शांतिनिकेतन आपका स्वागत करती है ।”14

इस बार गांधीजी शांतिनिकेतन में तीन दिन ठहरे । गुरुदेव और एण्ड्रयूज से चर्खा एवं खादी कार्यक्रम पर देर तक चर्चा की । चर्खा का महत्व बताते हुए उन्होंने छात्रों से कहा, “मैं तुमसें तुम्हारी कविता, साहित्य या संगीत छोड़ने के लिए नहीं कहता । मैं इतना चाहता हूँ कि इन बातों के साथ तुम प्रतिदिन आधा घंटा चर्खे के लिए दो । अभी तक यह बहाना किसी ने नहीं प्रकट किया कि उसके पास आधा घंटा भी नहीं है । चर्खा हमें अपनी संकीर्णता पर विजय पाने में सहायता करेगा । आज उत्तरी भारत का एक व्यक्ति बंगाल जाता है तो उसे बताना पड़ता है कि वह भारतीय है । अन्य प्रांतों में रहनेवाले बंगाली अपने को विदेशी समझते हैं । इसी तरह, दक्षिण भारतीय विदेशी हो जाते हैं जैसे ही वे उत्तरी भारत में पैर रखते हैं । चर्खा ही केवल एक ऐसा तरीका है जो हम सबको यह अनुभव कराता है कि हम सब एक ही देश की संतान है ।”15 आगे उन्होंने खादी पर जोर देते हुए कहा था, “विदेशी कपड़ों का बहिष्कार ऐसी बात है जिसे सब समान रूप से अपना सकते हैं, जिसमें सब समान रूप से अभय योगदान दे सकते हैं । अस्पृश्यता केवल हिन्दुओं को ही आघात पहुँचाती है । हिन्दू और मुसलमानों के बीच के झगड़ें भी कभी न कभी खतम होंगे ही, किन्तु यदि खादी नहीं रहे तो पूरा देश बेहद गरीबी में डूबा रहेगा ।”16 चर्खा और खादी गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन का एक हिस्सा था । जिसके माध्यम से वे पूरे भारतवासियों को एकता के सूत्र में बाधने का प्रयास कर रहे थे ।

1937 में गुरुदेव का स्वास्थ्य अचानक बहुत बिगड़ गया । दो-तीन दिनों तक वे अचेत होकर बिस्तर पर पड़े रहे । उन्हें अहसास हो गया था कि मृत्यु सन्निकट है । अब शरीर छोड़ने का वक्त आ गया है लेकिन उसके पहले वे शांतिनिकेतन का दायित्व एक ऐसे व्यक्ति को सौप देना चाहते थे जो उसकी देखभाल अच्छी तरह कर सके । अपने शिष्यों और सहयोगियों में उन्हें ऐसा कोई नहीं मिला जो इसका भार वहन कर सके । फिर उनका ध्यान गांधीजी की ओर गया । उनको लगा यही वह व्यक्ति है जो उनकी संस्था के संरक्षण और विकास की व्यवस्था कर सकता है ।

रवीन्द्रनाथ के अस्वस्थ्य होने की सूचना मिलते ही गांधीजी अपनी पत्नी के साथ 17 फरवरी, 1940 को शांतिनिकेतन पहुँचे । इस बार उनकी यात्रा बिना किसी राजनीतिक उद्देश्य की थी । यही वह वर्ष था जब दोनों की अंतिम मुलाकात हुई । गांधीजी श्यामली में ठहरे थे । आम्रकुंज में उनके लिए एक औपचारिक स्वागत समारोह का आयोजन किया गया था । गुरुदेव ने उन्हें माला पहनाई और स्वागत करते हुए कहा, “मैं आशा करता हूँ कि अपने आश्रम में हम आपका स्वागत करने में प्रेम की मौन अभिव्यक्ति के निकट रह सकेंगे और वाक्यों के आडम्बरपूर्ण प्रदर्शन में बह जाने से बचेंगे । महान पुरुषों के प्रति श्रद्धा निवेदन सहज भाषा में ही अभिव्यक्त होता है और हम ये थोड़े से शब्द आपको यह प्रकट करने के लिए अर्पित कर रहे हैं कि हम आपको सम्पूर्ण मानवता के होने के कारण अपना समझते हैं ।”17

गांधीजी ने हिन्दी में उत्तर देते हुए कहा था, “सबसे पहले मैं एण्ड्रयूज का स्मरण कर रहा हूँ जिन्हें आज सुबह मैं सब कुछ छोड़कर देखने गया था । उनकी उत्कट इच्छा थी कि मुझे और कवि को यहां शांतिनिकेतन में मिलते हुए देख सकें । आज के समारोह में उनकी अनुपस्थिति हमसब को कष्टकर प्रतीत हो रही है । हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि वे शीघ्र स्वस्थ हो जाएं और परमात्मा उन्हें शान्ति प्रदान करें । ”18 आगे उन्होंने कहा, “यद्यपि मैं इस यात्रा को तीर्थयात्रा समझता हूँ तथापि मुझे यह कहने की अनुमति दें कि यहां मैं आगन्तुक नहीं हूँ । मैं अनुभव करता हूँ जैसे मैं अपने घर आया होऊँ । इस प्रसंग में आश्रम के प्रारंभिक दिनों की 1915 की याद कर रहा हूँ जब मुझे और मेरे परिवार को आतिथ्य सुलभ किया गया था । ”19 गांधीजी शांतिनिकेतन को अपना दूसरा घर कहते थे । इस बार वे यहां दो दिन ठहरे । यहां के विभिन्न विभागों का दौरा किए और कला-भवन में विशेष रूचि दिखाई । संध्या समय उत्तरायण के प्रांगण में उनकी उपस्थिति में ‘चंडालिका’ नाटक का प्रदर्शन हुआ । अंत में विदा लेने के पूर्व रवीन्द्रनाथ ने गांधीजी को एक पत्र दिया, जिसमें उन्होंने लिखा था, “और अब, आपके शांतिनिकेतन से विदा होने के पूर्व मैं आपसे अपना आतंरिक निवेदन करता हूँ । इस संस्था को अपने संरक्षण में स्वीकार करें, उसे स्थायित्व आश्वासन प्रदान करें यदि आप उसे राष्ट्रीय संपत्ति समझें । विश्वभारती एक जलपोत के समान है जो मेरे जीवन के सर्वश्रेष्ठ कोश का माल-असबाव लिए जा रहा है और मैं आशा करता हूँ कि मेरे देशवासियों से वह अपने संरक्षण के लिए विशेष ध्यान पाने का दावा कर सकती है ।”20 गांधीजी ने इस पत्र के जवाब कहा था, वे जहां भी रहेंगे ‘विश्वभारती’ के संरक्षण के लिए हमेशा तत्पर रहेंगे ।

गांधीजी जब कभी शांतिनिकेतन जाते सफाई, रसोई, रोगी की चर्चा आदि से आरम्भ करते हुए, वहां कुछ मूल भूत सुधार लाने का प्रयास करते । 18 दिसम्बर 1945 को वे फिर शांतिनिकेतन आए और यही उनकी अंतिम यात्रा थी । गुरुदेव के दिवंगत होने के बाद यह उनकी पहली संस्थान-यात्रा थी । बंगाल सरकार ने आवश्यकता समझकर उनके लिए एक विशेष ट्रेन का प्रबन्ध कर दिया था । शाम को प्रायः प्रार्थना के समय उनकी ट्रेन बोलपुर स्टेशन पहुँची । स्टेशन से उन्हें सीधे शांतिनिकेतन के प्रार्थना प्रांगण में ले जाया गया जहां सब आश्रमवासी सान्ध्य-प्रार्थना के लिए एकत्र हुए थे । प्रार्थना के बाद गांधीजी ने एक संक्षिप्त भाषण दिया, जिसमें उन्होंने गुरुदेव की तुलना अपने घोसलें में पंख फैलाकर अंडे सेते हुए पक्षी से करते हुए कहा था- “उनकी बाहों के ऊष्ण संरक्षण में शांतिनिकेतन अपने वर्तमान आकार में विकसित हुआ है । बंगाल उनके गीतों से गुंजरित है । …..हम सब उनकी संरक्षण बाहों के स्नेह से विरहित हो चुके हैं । लेकिन हमें संतप्त न होना चाहिए । अपने शोक का उपचार हमारे अपने ही हाथों में है ।”21

शांतिनिकेतन में प्रत्येक बुधवार को आश्रमवासी सम्मिलित प्रार्थना के लिए मंदिर में एकत्र होते थे । गुरुदेव जब तक जीवित रहे, इस अवसर पर अपना साप्ताहिक उपदेश देते रहे । 19 दिसम्बर को यह उपदेश क्षिति बाबू के अनुरोध पर गांधीजी द्वारा दिया गया । उसी दिन दोपहर को उन्होंने दीनबंधु स्मृति चिकित्सालय का शिलान्यास किया । उसके अगले दिन 20 दिसम्बर को उन्होंने कला-भवन में नन्दलाल बोस द्वारा आयोजित कला प्रदर्शनी देखी । उसके बाद वे ‘विश्वभारती’ के अध्यापकों एवं कर्मचारियों से मिले । उन्होंने देखा कि सामने भीषण समस्या है- आर्थिक समस्या, विद्यार्थियों की समस्या एवं प्रशासन की समस्या । इनमें से कई समस्याओं का उन्होंने समाधान किया । ‘सी. एफ. एण्ड्रयूज स्मृति’ कोश में कुछ राशि जमा करके आर्थिक समस्या का समाधान किया । आश्रमवासियों को नए सीरे से अग्रसर होने के लिए उत्साहित किया । जब कृष्णा कृपालानी ने उनसे पूछा-“वे लोग नहीं जानते कि उनका लक्ष्य क्या है अथवा वे किस आदर्श की सिद्धि के लिए प्रयत्नशील है ।”22 तब गांधीजी ने आश्रमवासियों से कहा, “आपका आदर्श केवल बंगाल या कि भारत का प्रतिनिधित्व करना नहीं हैं, आपको सारे संसार का प्रतिनिधित्व करना है ।…..जब तक आप भारत के जनमानस का प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे तब तक आप मानव के रुप में गुरुदेव को प्रतिरूपित नहीं कर पाएंगे । आप गायक, चित्रकार, यहां तक कि महाकवि के रूप में भी उनकी प्रतिष्ठा भले कर लें, परन्तु इससे आप उनके सहज मानवीय रूप का उपस्थापन नहीं कर पाएंगे और ऐसी स्थिति में इतिहास यह कहेगा कि उनका यह संस्थान असफल रहा । मैं नहीं चाहता कि इतिहास यह निर्णय दे ।”23

‘विश्व-भारती’ की स्थापना गुरुदेव के जीवन का सपना था । इसे साकार करने के लिए उन्होंने अनेक कष्ट झेले थे । वे ‘विश्व-भारती’ को विश्व-संस्कृति का प्रतिष्ठान बनाना चाहते थे । यही कारण है कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे इसका कार्यभार गांधीजी को सौप देते है । गांधीजी ने भी उनको आश्वासन दिया था कि वे अधिक से अधिक समय ‘विश्व-भारती’ के लिए निकालने की कोशिश करेंगे । वे ‘विश्व-भारती’ को अपना दूसरा घर कहते थे । यहां के शांत वातावरण और प्राकृतिक सौन्दर्य से वे बहुत ज्यादा आकर्षित हुए थे । इसके अलवा यहां की साहित्य, संस्कृति, संगीत, नृत्य आदि कलाओं ने भी उन्हें काफी हद तक प्रभावित किया था । वे जहां भी जाते यहां की स्मृति साथ लिए जाते । शांतिनिकेतन में रहते समय उन्होंने कई नए प्रयोग किए । विद्यार्थियों को स्वावलंबी बनाने के लिए उन्होंने चर्खा और खादी के महत्व को समझाया । विश्वशान्ति की रक्षा के लिए अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया । आश्रम की भावना को विकसित करने के लिए साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया । यह गांधीजी के प्रयत्नों का ही परिणाम था कि उनकी मृत्यु के बाद 1951 में ‘विश्व-भारती’ को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया ।             

सन्दर्भ-सूची

  1. मजुमदार, तनुजा, रवीन्द्र खानदान के मुस्लिम वारिस, प्रथम संस्करण, 2011, मानव प्रकाशन, कोलकाता, पृष्ठ संख्या 136
  2. तोमर, रामसिंह(सं.), विश्वभारती पत्रिका, जुलाई-सितम्बर 1969, पृष्ठ संख्या, 189
  3. उपरोक्त, 192
  4. उपरोक्त, 192-193
  5. उपरोक्त, 191
  6. उपरोक्त, 191
  7. उपरोक्त, 193
  8. मजुमदार, तनुजा, रवीन्द्र खानदान के मुस्लिम वारिस, प्रथम संस्करण, 2011, मानव प्रकाशन, कोलकाता, पृष्ठ संख्या 140
  9. तोमर, रामसिंह(सं.), विश्वभारती पत्रिका, जुलाई-सितम्बर 1969, पृष्ठ संख्या, 194
  10. उपरोक्त, 209
  11. उपरोक्त, 210
  12. उपरोक्त, 211
  13. उपरोक्त, 212
  14. उपरोक्त, 212
  15. उपरोक्त, 212-213
  16. उपरोक्त, 213
  17. उपरोक्त, 215-216
  18. उपरोक्त, 216
  19. उपरोक्त, 216
  20. उपरोक्त, 217
  21. उपरोक्त, 221
  22. उपरोक्त, 229-230

23. उपरोक्त, 230

 

 

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