अश्विनी कुमार पंकज हिंदी के प्रख्यात लेखक, उपन्यासकार, नाटककार और विचारक होने के अलावा देश की आदिवासी भाषाओं के संरक्षक और आदिवासी संस्कृतियों के प्रखर योद्धा के तौर पर भी जाने जाते हैं। दशकों से झारखण्ड के आदिवासियों की सांस्कृतिक अस्मिता और अधिकारों के लिए संघर्षरत पंकज जी का एक और चेहरा तब सामने आया जब परसो पटना में अपनी मातृभाषा मगही में लिखे उनके उपन्यास ‘खाँटी किकटिया’ (प्रकाशक प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, चेशायर होम रोड, बरियातू, रांची 834009, मूल्य 250 रु) का लोकार्पण हुआ। बुद्ध और महावीर के समकालीन आजीवक मक्खलि गोसाल के जीवन और दर्शन पर आधारित यह उपन्यास मगही भाषा के लिए एक उपलब्धि की तरह है। मक्खलि गोसाल को उनके समय का महान विचारक, कवि और सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ एक योद्धा के तौर पर जाना जाता है। उनका समय इतिहास का वह कालखंड था जब कीकट अर्थात मगध के लोग वैदिक साहित्य के रचेताओं की दृष्टि में घृणा और उपहास के पात्र थे। इससे यह तो पता चलता है कि कीकट यानी मगध क्षेत्र में तबतक आर्य संस्कृति का प्रसार नहीं हुआ था। हां, यहां के जनजातीय लोगों के बीच एक सामंती समाज का उदय ज़रूर हो चुका था और कीकट समाज में एक वर्ग संघर्ष आकार लेने लगा था। जहां बुद्ध और महावीर इस सामाजिक और आर्थिक उथल-पुथल का हल लोक से बाहर जाकर निर्वाण और मोक्ष में खोज रहे थे, मक्खलि गोसाल इस संघर्ष का जमीनी हल खोजने के पक्षधर थे। खुद बौद्ध और जैन साहित्य के अनुसार उस दौर में गोसाल द्वारा स्थापित आजीवक संप्रदाय के पीछे चल रहे लोगों की संख्या बौद्ध और जैन धर्म को मानने वाले लोगों से कई गुना ज्यादा थी। बौद्ध, जैन और इस क्षेत्र में बाद में आए ब्राह्मण धर्म ने आजीवकों को नास्तिक घोषित किया था। शायद यही वजह थी कि इतिहास ने उन्हें वह श्रेय नहीं दिया जिसके वे वाक़ई हकदार थे। अश्विनी कुमार पंकज ने मक्खलि गोसाल के जीवन, विचार और उनके नेतृत्व में आजीवकों की लड़ाई की जैसी जीवंत तस्वीर खींची है, उससे गुज़रना एक दुर्लभ अनुभव है। उनकी इस कृति में देशज भाषा मगही और उसकी लोकोक्तियों का सौंदर्य अपने पूरे निखार पर है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मगही भाषा का यह सर्वथा अलग-सा उपन्यास मगही ही नहीं, तमाम देशज भाषाओं के लिए गर्व का विषय साबित होगा।

अगर आपको इतिहास के अध्ययन और उसमें अपनी जड़े तलाशने में दिलचस्पी है तो इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ें। ऑनलाइन विक्री के लिए ‘खाँटी किकटिया’ अमेज़न पर भी उपलब्ध है।

-ध्रुव गुप्त 

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