जुल्फ़ों में ही ये रात गुज़र जाए तो अच्छा।

ये स्याह खुली ज़ुल्फ़ बिख़र जाए तो अच्छा।।

 

इस रात के आग़ोश में इक चाँद खिला है।

ऐ चाँद ज़रा रात सँवर जाए तो अच्छा।।

 

मासूम निगाहों की अदा रोक रही थी।

अलमस्त नज़र आज ठहर जाए तो अच्छा।।

 

वो जाम निग़ाहों से पिलाता है मुझे क्यों।

मैं शाम बहकता हूँ असर जाए तो अच्छा।।

 

आगाज़ हुआ इश्क़ का दीदार हुआ है।

इक शौख नज़र दिल में उतर जाए तो अच्छा।।

 

अन्जाम अग़र इश्क़ है नज़रों का तुम्हारी।

नज़रों में ही ये इश्क़ निखर जाए तो अच्छा।।

 

सुधीर बमोला

ऋषिकेश

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