रोज़ा आउसलेण्डर (Rose Ausländer) का जन्म 11 मई 1901 को बूकोवीना (वर्तमान उक्रेन) में और निधन 3 जनवरी 1988 ड्यूसलडोर्फ़ (जर्मनी) में हुआI रोज़ा आउसलेण्डर एक जर्मन भाषी यहूदी कवि थीं. उनका अधिकाँश जीवन संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी में निर्वासन में व्यतीत हुआ. उन्होंने लिखा  “शब्द ही उनका असली घर है I” अपनी कविता “मातृभूमि” में उन्होंने राष्ट्रीय पहचान और व्यक्तिगत पहचान को शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया है. यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जर्मनी को “पितृभूमि-Vaterland” कहा जाता हैI

रोज़ा आउसलेण्डर को उनकी पारदर्शी कविताओं के लिए जाना जाता है, जिसमें उन्होंने संसार के प्राकृतिक आश्चर्य तारों, मधुमक्खियों, फूलों आदि का बखूबी चित्रण किया है , साथ ही साथ द्वीतीय विश्वयुद्ध के अपने अनुभवों का भी वर्णन किया हैI रोज़ा आउसलेण्डर के पास मात्र दो सूटकेस थे, जिन्हें साथ लेकर जिन्दगीभर वह एक देश से दूसरे देश में भटकती रहीं. उनकी कविता Verregnete Abreise (Rainy Departure) में निर्वासन में “सूटकेस” उनके जीवन का प्रतीक हैI उनका जीवन दु:ख और हार, विध्वंस (Holocaust) और निर्वासन से प्रभावित रहा. शब्द ही उनके गाढ़े के वफ़ादार साथी, मातृभूमि और घर बन गए. उन्होंने जर्मन एवं अंग्रेजी दोनों में लिखा. रोज़ा आउसलेण्डर की प्रसिद्ध रचनाएं हैं –

Blinder Sommer. Vienna: 1965; Wir wohnen in Babylon. Gedichte. Frankfurt a.M.: 19841992; Die Sonne fällt. Gedichte. Frankfurt a.M.: 19841992; Braun, Helmut, ed. Ausländer, Rose. Die Erde war ein atlasweißes Feld. Gedichte 19271956. Frankfurt a.M.: 1985; Melin, Charlotte, ed. and trans. German Poetry in Transition. 19451990. Bilingual Edition. Hanover: 1999.

 

1.

मातृभूमि (Mutterland)

 

मर चुकी है मेरी पितृभूमि

दफना दिया है उन्होंने

उसे आग में I

 

निवास करती हूँ मैं

अपनी मातृभूमि

“शब्द” में II

 

 

2.

प्रेम VI  (Liebe VI)

मिलेंगे हम दोनों फिर से

समुद्र में

तू पानी की तरह

मैं कमल के फूल की तरह

 

तू  मुझे ले जाएगा

करूंगी मैं तेरा रसपान

एक ही हैं हम

आँखों की सबकी सामनेI

 

 

यहाँ तक कि तारे भी

हैं आश्चर्यचकित

बदल लिए हैं यहाँ

रूप दोनों ने

सपनों में तेरे

जो तूने चुने हैंII

 

 

 

3.

मुझे बस इतना पता है (Ich weiss nur)

 

पूछते हो तुम मुझसे

क्या चाहती हूँ मैं

मुझे यह नहीं पता

मुझे बस इतना पता है

कि ख़्वाब देखती हूँ मैं

कि ख़्वाब जी रहा है मुझे

और तैर रही हूँ मैं

इसके बादलों में

 

मुझे बस इतना पता है कि

प्यार करती हूँ मैं इंसान को

पहाड़ बागान समुद्र

जानते हैं कि बहुत से मुर्दा

रहते हैं मुझमें

 

आत्मसात करती हूँ मैं अपने ही

लम्हों को

जानती हूँ इतना ही

कि यह समय का खेल है

आगे-पीछे .

 

 

4.

तुम भी अभी भी यहाँ हो (Noch bist Du da)

 

फेंक दो अपने डर को

हवा में

शीघ्र ही

हो जाएगा पूरा समय तुम्हारा

शीघ्र ही

ऊपर उठेगा आकाश

घास के नीचे से

नहीं गिरेंगे कहीं भी

सपने तुम्हारे I

 

अभी तक

सुगंध आ रही है लवंग की

गा रही है सारिका

प्यार कर सकती हो तुम अभी

खोल सकती हो भेद शब्दों से

कि तुम अभी यहाँ होI

 

बनो जो तुम हो

दो वही जो है तुम्हारे पास II

 

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5.

आँसू (Tränen)

 

ये बुझाते हैं आग

जो जलती है तुम्हारे भीतरI

 

आदेश पर

विस्मयकारी क्षणों के

ढुलक जाते हैं तुम्हारी आँखों से

गालों के रास्ते नीचे वे I

 

रोक नहीं सकता इन्हें कोई

नहीं लेते हैं तुमसे वे अनुमति

ये हैं विश्वसनीय नमकीन बूँदें

तुम्हारे अन्दर के समुद्र की II

 

  1. अकेले (Allein)

 

रहती हूँ मैं अकेले

गानों के साथ

 

मेरे प्रश्न

होंगे नहीं खत्म

 

आकाश ज़बाव देता है

नहीं

हाँ I

 

नहीं पता मुझे

कहाँ प्रारम्भ होता है अंत

और कहाँ अंत होता है प्रारम्भ II

7.

भाषा (Sprache)

 

सेवा में रख लो मुझे अपनी

जीवनभर

चाहती हूँ मैं श्वास लेना तुम्हारे अन्दर

प्यासी हूँ मैं तुम्हारी

करती हूँ पान तुम्हारा शब्द प्रतिशब्द

मेरे स्रोत

तुम्हारे क्रोध की चिंगारी

जाड़े का शब्द

सुन्दर नीला रंग

खिलता है मुझमें

बसंत का शब्द

पीछा करती हूँ मैं तुम्हारा

 

नींद आने तक

उच्चारण करती हूँ सपनों का तुम्हारे

समझते हैं हम शब्द एक दूसरे के

प्रेम करते हैं हम एक दूसरे से II

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8.

मुझे नहीं पता (Ich weiß nicht)

 

नहीं पता मुझे

दिन किस तरह

बदल जाता है

शून्य में

रात में

शून्य में I

 

दिन और रात

नहीं पता मुझे

कहाँ से कहाँ तक

है शून्य

 

उससे

सृजन करती हूँ मैं

संसार

गमन (गति) का

और

अमन (शान्ति) का II

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मेरी संपदा (Mein Eigentum)

 

यह अजनबी शहर

मेरी संपदा

सुनती हूँ मैं

चीं चीं करती चिड़िया को

देखती हूँ

बहुरंगी पत्ते

फव्वारे

खेलते हुए बच्चे I

 

रहती हूँ यहाँ मैं

हज़ारों वर्षों से

समय के साथ

बदलते हुए विवेक के

पृथ्वी के साथ

और अनंत आकाश के साथ II

 

10.

शुरू में शब्द था (Am Anfang war das Wort)

 

शुरू में

था शब्द

और शब्द

था ईश्वर के पास I

 

और ईश्वर ने दिया

हमें शब्द

और रहते थे हम

शब्द में I

 

और शब्द

है हमारा सपना

और सपना है

हमारा जीवन II

 

[जनकृति पत्रिका सितंबर 2015 अंक में प्रकाशित] 

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