प्रसिद्ध केन्याई चिंतक और लेखक न्युगी वा थ्योंगो ने कहा है,‘‘अगर जनता को उसके बुनियादी जनतांत्रिक और मानवीय अधिकार हासिल नहीं होते हैं और इनके लिए अगर हम आवाज नहीं उठाते तो निश्चय ही हम अपने कत्र्तव्य का पालन करने में अक्षम हैं।’’ केन्या की जनता की सांस्कृतिक पहल का बर्बरता से दमन करती सरकार के बारे में अफ्रीका के साम्राज्यवाद विरोधी लेखक थ्योंगो के अनुसार 1977 में कामीरिथु कम्युनिटी एजुकेशन एंड कल्चरल सेंटर लिंगरू के किसानों और मजदूरों ने अपने गांव में एक बहुत बड़ा मुक्तांगन मंच बनाया और वहां हजारों लोगों की मौजूदगी में एक नाटक ‘न्गाहिका न्दींदा’ (आई विल मेरी, ह्वैन आइ वांट) का प्रदर्शन किया। लेकिन केन्याई अधिकारियों ने दखलंदाजी करके इसे फौरन रुकवा दिया। 1982 के आरंभ में इसी दल ने एक और नाटक ‘माइतू न्जुगीरा’(मदर सिंग फॉर मी) का प्रदर्शन करना चाहा और फिर इस बार अधिकारियों ने नाटक के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए लाइसेंस देने से इंकार कर दिया। देखा जाए तो किसानों-मजदूरों का यह मुक्तांगन मंच नुक्कड़ नाटक मंच ही है और सत्ता के विरोध में उठायी जाने वाली आवाज को केन्या में ही नहीं हर जगह दबाया जाता है ताकि जनवादी आंदोलन जोर न पकड़ जायें।

जनवादी आंदोलन से नुक्कड़ नाटकों का गहरा संबंध रहा है। भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में यह बहुत पुराना है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध उल्लेखनीय समय है जब रूस, ब्रिटेन और जर्मनी में ‘वकर्स थियेटर मूवमेट’ ने नए नाट्यरूपों की खोज की, जो नए विषयों को नए प्रदर्शन स्थलों पर समुचित ढंग से अभिव्यक्त कर सकें। चाहे रूस का ब्लू ब्लाउज थियेटर हो, जर्मनी का ‘प्रोलितायिन थियेटर’ हो या ब्रिटेन का ‘रेड प्लेयर्स’ सभी ने अपने-अपने समाजों के परिवर्तन के संघर्ष में उल्लेखनीय भूमिका निभाई और नाटक को विकल्प के हथियार के रूप में स्थापित किया। भारत में इप्टा आंदोलन, आपातकाल के व्यापक जनांदोलन और आज तक भी आंदोलनधर्मी स्थितियों में नुक्कड़ नाटक का अस्तित्व न सिर्फ बरकरार है बल्कि विकासमान भी है।

आज़ादी के बाद भारत में लोकतंत्र की स्थापना के साथ, संविधान के माध्यम से जनता के लोकतांत्रिक-जनवादी अधिकारों को सुरक्षित रखने तथा जनवादी मूल्यों के संरक्षण के सरकारी प्रयास किये गये। देश की आम जनता को यह आश्वासन मिला कि अब शोषण और असमानता पर आधारित व्यवस्था का अंत हो जाएगा और प्रत्येक मनुष्य चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, रंग, नस्ल या फिर सम्प्रदाय को मानने वाला क्यों न हो अपनी सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक तथा आर्थिक मुक्ति को पा सकेगा। देश की आम जनता के लिए देश की आज़ादी के यही मायने थे। ये वही लक्ष्य थे जिनके लिए उसने ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी ताकत से संगठित होकर लोहा लिया था। आज़ादी के बरस-दर-बरस बीत जाने के बाद भी यह लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। अभी भी देश की जनता को एक ऐसे सामाजिक-राजनीतिक वातावरण की प्रतीक्षा है जहाँ पर अन्याय, शोषण और असमानता का अंत हो चुका हो। इसीलिए स्वाधीनता प्राप्ति से लेकर आज तक भारत की बहुसंख्यक जनता ने यह अनुभव किया है सत्ता द्वारा प्रस्तावित जनवाद एक शब्द मात्र है जिसमें समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व से मिली-जुली भावना सिरे से गायब है और सत्ता ने समय-समय पर आज़ाद भारत में जनता के जनवादी अधिकारों का हनन किया है। इसके साथ ही यह भी स्वीकारा गया कि जनता का सच्चा जनवाद अभी प्रतीक्षित है।

जनता के इसी अनुभव को अभिव्यक्त करने और उसके मानवीय अधिकारों को बचाये रखने  के विचार से ही जन-आंदोलनों के सांस्कृतिक औज़ार के रूप में नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत हुई, जिसका उद्देश्य था सत्ता की जनविरोधी नीतियों और समाज में प्रचलित जनविरोधी जड़ सामंती  और मानवविरोधी पूंजीवादी मूल्यों का विरोध करते हुए जनता के प्रतिरोध को मुखर करना। यानी कि जनता के बीच जनता की बात को लेकर जाना। आपात्काल में शासन की तानाशाही प्रवृत्ति के विरोध से लेकर वर्तमान पूंजीवादी नव-साम्राज्यवादी व्यवस्था द्वारा जनता के शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध, नुक्कड़ नाटकों ने निरंतर आवाज़ उठायी है। इन नाटकों के रचयिता और रंगकर्मी मानते थे कि यदि आम जनता नाटक देखने प्रेक्षागृहों तक नहीं पहुंच पा रही है तो क्यों न नाटक को ही जनता के पास ले जाया जाये। इस रूप में देखा जाए तो नुक्कड़ नाटकों की शुरूआत का एक और वाजिब कारण यह रहा कि व्यावसायिक और आभिजात्य नाट्यकर्म की प्रतिक्रिया में इसका जन्म हुआ । एक खास वर्ग के लिए सीमित होते जा रहे रंगकर्म को नुक्कड़ नाटक ने आम जन की समस्याओं से जोड़कर उनकी गली, मोहल्ले और नुक्कड़ तक जा पहुंचाया। जनवाद पर हो रहे हमले की प्रतिक्रिया में नुक्कड़ नाटककारों और रंगकर्मियों ने जनता का पक्ष लेकर उनके संघर्ष में सच्ची भागीदारी की है।  आठवें दशक में देश भर में चल रहे जनवादी आंदोलनों में शिरकत करते हुए कई रचनाकार नुक्कड़ नाटकों की ओर उन्मुख हुए। इनमें शिवराम, रमेश उपाध्याय, स्वयं प्रकाश, राजेश कुमार, गुरुशरण सिंह, असगर वजाहत आदि शामिल थे। इन रचनाकारों ने नुक्कड़ नाटक को जनवादी रंगकर्म की महत्वपूर्ण विधा के रूप स्थापित किया। हिंदी प्रदेश की कई नाट्य मंडलियों की शुरुआत इन्हीं रचनाकारों के नुक्कड़ नाटकों से हुई। इन रचनाकारों ने नाट्य मंडलियों के साथ मिल कर अनेक नुक्कड़ नाटक रचे और देशी-विदेशी कई जनपक्षधर रचनाओं के नाट्य रूपांतर भी तैयार किए। शिवराम का नाटक ‘जनता पागल हो गयी है’, ‘कुकड़ूं कूं’,रमेश उपाध्याय के नाटक ‘गिरगिट’, ‘हरिजन दहन’, और ‘राजा की रसोई’ और असगर वजाहत के ‘सबसे सस्ता गोश्त’, गुरूशरण सिंह के ‘हड़ताल’,‘जंगीराम की हवेली’, हरीश भादानी के ‘रोटी नाम सत्त है’  जैसे अनेक नाटक उस दौर में मंडलियों द्वारा खेले गये।

नुक्कड़ नाटक ने अपनी चार दशकों से अधिक की संघर्ष-यात्रा में न सिर्फ आपात्काल के हमले का विरोध किया  गया है बल्कि आम जनता को प्रभावित करने वाली अनेक समस्याओं पर उसने अपनी जन-पक्षधर आवाज़ उठायी है इसीलिए नुक्कड़ नाटककारों  ने साम्प्रदायिकता, जातिवाद, सामंतवाद, वैश्विक आंतकवाद, युद्धोन्माद, तथा बाज़ारवादी पूँजीवाद जैसी व्यापक समस्याओं  से लेकर आम जनता के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी महँगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, दहेजप्रथा, अशिक्षा, अवैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्त्री समानता जैसे विषयों को नुक्कड़ नाटकों के जरिये उठाया है। ऐसा करते हुए इन नाटकों ने समय-समय पर चलाये जाने वाले जन-आंदोलनों में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की है।

नुक्कड़ नाटक के उदय के समय से ही हिंदी प्रदेश में राजधानी दिल्ली की दो चर्चित मंडलियों निशांत नाट्य मंच और जन नाट्य मंच ने अपने समय, परिवेश और समाज की समस्याओं को नुक्कड़ नाटकों में माध्यम से प्रस्तुत किया है। सन् 1973 में दिल्ली के कुछ वामपंथी रंगकर्मियों के प्रयासों स्थापित हुए जन नाट्य मंच (जनम) ने अपने समय और परिवेश की समस्याओं और जनता से जुड़े मुद्दों को अपने नाटकों का विषय बनाया है। इन नाटकों में आम जनता के अपनी परिस्थितियों के प्रति असंतोष, आक्रोश तथा बेचैनी को अभिव्यक्ति मिली है। जनम नुक्कड़ नाटक को वहाँ लेकर गया जहाँ पर शोषण, अन्याय, गरीबी, भुखमरी में पिसता हुआ आम आदमी अपने जीवन ही नहीं बल्कि अपने स्वाभिमान की लड़ाई भी लड़ रहा था। जनम की नाट्य यात्रा में इस नाट्य संस्था के संस्थापकों में से एक सफदर हाश्मी का बड़ा योगदान रहा है। सफदर ने नुक्कड़ नाटक लेखन से लेकर उसकी सैद्धांतिकी तैयार करने तक और गम्भीर विषयों पर लेख लिखने से लेकर बच्चों के लिए कविताएं और नाटक लिखने जैसे कई काम किये।  1 जनवरी 1989 में राजनीतिक गुंडों द्वारा सफदर की हत्या ने समाज के राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं, रंगकर्मियों, बुद्धिजीवियों और आम मज़दूर- किसानों को उद्वेलित कर दिया। जन नाट्य मंच  इस घटना के बाद और अधिक शक्ति और साहस के साथ   जनवादी रंगकर्म में जुट गया। जन नाट्य मंच ने मंहगाई, चुनाव, साम्प्रदायिकता, आर्थिक नीतियों के जन-विरोधी स्वरूप, ट्रेड यूनियनों के अधिकारों, महिलाओं के अधिकार और शिक्षा प्रणाली जैसे मुद्दों पर नाटक किये हैं।

भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बंगलादेश और भूटान के मेहनतकशों के बीच पचास से अधिक नाटकों की तीन हजार से अधिक प्रस्तुतियाँ करने वाले निशांत नाट्य मंच की स्थापना सन् 1977 के अंत में दिल्ली में हुई। निशांत ने प्रारम्भ से ही जनवादी मूल्यों और जनपक्षधर सिद्धांतों के प्रचार- प्रसार को अपना लक्ष्य माना है। देश की आज़ादी के लिए शहीद हुए अशफ़ाक, रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद के सपनों के भारत को अपने नाटकों का विषय बनाया है। निशांत के नाटक शासक वर्ग की निरंकुशता और मनमानी नीतियों का विरोध करते हैं निशांत नाट्य मंच ने महिलाओं के शोषण, अमानवीयकरण, साम्प्रदायिकता, असहिष्णुता, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लूट, अंगे्रज़ियत के विरोध के प्रति स्वयं को प्रतिबद्ध किया है।

नुक्कड़ नाटक, नुक्कड़ नाटककारों तथा नाट्य  मंडलियों के सामाजिक सरोकारों, गहरी जनप्रतिबद्धता और परिवर्तन में आस्था को अभिव्यक्त करते हैं। जन-आंदोलनों से जुडे़ इन नाटकों की विशिष्टता इस बात में है कि ये नाटक जनता की समस्याओं,परेशानियों और तकलीफों से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। ये नुक्कड़ नाटक हमारे समय  के उत्पीड़ित, शोषित और हाशिये पर डाल दिये गये तबकों की आवाज़ें हैं। इसलिए इन नुक्कड़ नाटकों में जनतंत्र जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिफलन है। जिसके जरिये देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक उन्नति के रास्ते तलाश किये जाते हैं। लेकिन पिछले दो दशकों में देश में राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर भारी परिवर्तन आया है। अयोध्या और उसके  बाद गुजरात में हिंदुत्व की प्रयोगशाला के माध्यम से जिस प्रकार समाज का धार्मिक-साम्प्रदायिक धु्रवीकरण किया गया उससे देश की एकता को गहरा आघात पहुंचा है। इसी प्रकार सामाजिक न्याय की लड़ाई भी मात्र राजनीतिक सत्ता प्राप्ति के लक्ष्य तक ही सीमित हो कर रह गयी है। जबकि सामाजिक न्याय का रास्ता इससे आगे चलकर पूरे समाज के रूढ़िवाद और जड़तावाद की समाप्ति है। ऐसा करते हुए इन नाटकों ने समय-समय पर चलाये जाने वाले जन-आंदोलनों में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की है।

देश भर में ‘अभिव्यक्ति’(राजस्थान), अभियान (हरियाणा), इप्टा (आगरा), संचेतना(बिहार), संभावना (ग्वालियर),  अरूणोदय( आंध्रप्रदेश), दिशा(मुम्बई), प्रेरणा (पटना), प्रजा नाट्य मंडली ( आंध्र प्रदेश), अस्मिता (दिल्ली) के अतिरिक्त अनेक कला-जत्थे इस काम को गति देते रहे हैं। इसके अतिरिक्त आठवें दशक में सव्यसांची के संपादन में निकले ‘उत्तरार्द्ध’ के जनवादी नाटक विशेषांक, साम्प्रदायिकता विरोधी अंक, चंद्रेश की किताब ‘नुक्कड़ नाटक’ के साथ बाद में असगर वजाहत का नुक्कड़ नाटक संग्रह‘ सबसे सस्ता गोश्त’, जन नाट्य मंच के ‘चैक चौक पर गली गली में’, निशांत का ‘अब न सहेंगे जोर किसी का’, शिवराम के ‘ जनता पागल हो गयी है’,‘ घुसपैठिये’,‘गटक चूरमा’,‘दुलारी की मां’ ,‘पुनर्नव’, जन नाट्य मंच दिल्ली का 2011 में आया संग्रह ‘सरकश अफसाने’ और पत्रिका ‘नुक्कड़’, बारह नुक्कड़ नाटकों का संग्रह ‘जनता के बीच जनता की बात’-(.संपा- प्रज्ञा) इस संदर्भ में उल्लेखनीय प्रकाशन हैं। देश की लगभग सभी भाषाओं में नुक्कड़ नाटक की उपस्थिति बनी हुई है पर मुख्य बात यह भी है कि नुक्कड़ नाटकों की जरूरत लगातार बनी हुई है और इस दिशा में अभी और काम किया जाना चाहिए।

नुक्कड़ नाटकों द्वारा उठाई गई कई समस्याओं में धार्मिक संकीर्णता और जातिवाद भी प्रमुख है। जातिवाद की इस समस्या का एकमात्र आयाम मानवीय गरिमा के हनन का ही नहीं है बल्कि आज जातिवाद समाज में आर्थिक असमानता और सामाजिक रूढ़िवाद के साथ-साथ राजनीतिक जोड़-तोड़ का भी जरिया बन गया है। जन-विरोधी शक्तियाँ मेहनतकश वर्ग को जाति और धर्म के आधार पर बाँटकर उनकी सामूहिक शक्ति को समाप्त करने का षडयंत्र रचती हैं। ये शक्तियाँ जनता की बुनियादी ज़रूरतों जैसे रोटी, कपड़ा, मकान और मानवोचित जीवन जीने के लिए उपयुक्त परिस्थितियों से ध्यान हटाने के लिए धर्म के धुंए का प्रयोग करती हैं। जनता को समझाया जाता है कि उनकी प्राथमिक समस्या धर्म और ईश्वर की आराधना करने की है न कि भुखमरी, बेराज़गारी और उपयुक्त पारिश्रमिक की। इस षडयंत्र को उजागर करता है रमेश उपाध्याय का नाटक ‘राजा की रसोई’। इसी प्रकार धर्म और मज़हब के नाम पर फैलाये  जा रहे साम्प्रदायिक वैमनस्य के कंेद्र में भी यही सत्ता प्राप्ति के लिए की जाने वाली जोड़-तोड़ काम कर रही है। वास्तव में धर्म और मज़हब पर आये खतरों को दिखा कर साम्प्रदायिक ताकतें स्वयं को आम जनता का मसीहा बनना चाहती हैं। समय-समय पर भड़क उठने वाले साम्प्रदायिक दंगों का नेतृत्व करने वाले न तो हिंदू हैं और न ही मुसलमान। इनकी एक ही जाति है वह है सत्ता की जाति उनका एक ही धर्म है सत्ता पर काबिज़ रहने का धर्म। सत्ता जो चुनाव के दौरान अपनी उजली पाक छवि बनाकर जनता से धर्म और जाति के नाम पर वोट बटोरती है। सत्ता के इन ठेकेदारों के ये चेहरे असगर वजाहत के ‘सबसे सस्ता गोश्त’ और ‘देखो वोट बटोरे अंधा’ जैसे नुक्कड़ नाटकों में साफ दिखलायी देते हैं।

वर्तमान समय में साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरवाद की समस्या मात्र भारत की चैहद्दी तक महदूद नहीं रही है। यह एक विश्वव्यापी समस्या का रूप ले चुकी है। पिछले कुछ समय में अमेरिका के नेतृत्त्व  चल रहे ‘आतंक के विरुद्ध यु़द्ध’ ने पूरे विश्व को दो खेमों में बाँट दिया है। एक वे जो इस युद्ध में अमेरिका के साथ है और दूसरे वे जो अमेरिकी दमन को झेल रहे हैं। त्रासदी यह है कि जो आंतक से ‘मानवता की रक्षा’ का झंडा उठाये हुए हैं वे ही बाज़ार के लिए युद्ध करते हुए पूरी दुनिया में युद्ध का बाज़ार भी चला रहे हैं। स्थानीय स्तर से लेकर वैश्विक स्तर पर बढ़ी धार्मिक असहिष्णुता इतना अधिक विकृत रूप ले चुकी है कि किसी भी मनुष्य को मात्र इसलिए मारा जा सकता है कि वह आपके विश्वास का नहीं है।  और जो लोग अमेरिकी आंतक और कट्टरपंथियों के आंतक का विरोध करते हुए एक बेहतर मानवीय समाज का विकल्प सुझाने का प्रयास करते हैं उन्हें ‘राह’ से भटका हुआ बतलाकर ‘सही रास्ते’ पर लाने के प्रयास किये जाते हैं। रंगकर्मी सुधन्वा देशपांडे का ‘बुशक्यांओ…!!!’ ऐसे ही सच को सामने लाने वाला नुक्कड़ नाटक है।

वैश्वीकरण, निजीकरण और आर्थिक उदारीकरण को विकल्पहीन बतलाकर पूँजीवादी शक्तियाँ विश्व भर में श्रमिकों के मौलिक अधिकारों और जायज़ हक़ों को छीन रही हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को तो सरकारें तमाम तरह की सुविधाएं  देने को तैयार हैं परंतु श्रमिकों की सामान्य सी सामान्य मांगों को भी नकार दिया जाता है।  बाज़ारवादी नव साम्राज्यवाद के कसते जा रहे शिकंजे के विरुद्ध ‘संघर्ष करेंगे जीतेंगे’(जनम) तथा ‘अंग्रेज़ी की गुलामी हमें मंज़ूर नही’(निशांत) जैसे नाटक इन शक्तियों के प्रतिरोध की आवाज़ बनकर उभरते हैं। इसी प्रकार स्थानीय बाज़ार को नियंत्रित करने वाला व्यापारी वर्ग कालाबाजारी और भ्रष्टाचार से आम जनता के जीवन को और भी अधिक कष्टमय बना देता है। ऐसा व्यापारी वर्ग मात्र एक नागरिक का ही शत्रु नहीं है अपितु वह पूरे समाज का शत्रु है। नुक्कड़ नाटक के आरंभ में जहां नाटककार स्वयं प्रकाश ने अपने नुक्कड़ नाटक ‘सबका दुश्मन’ में उजागर किया है वहां आज वैश्वीकरण के दौर में उपजी कई समस्याओं पर तैयार पिछले कुछ वर्षों की स्क्रिप्ट्स देखें तो ‘हम झुग्गीवाले’,‘ हौंडा का गुंडा’,‘ मंहगाई की मार’,‘प्राइवेट पानी’ जैसे जन नाट्य मंच,दिल्ली के नाटक बेहद प्रभावशाली हैं।

विश्व भर में चल रहे  युद्धों, सत्ता परिवर्तनों, बढ़ते हुए कट्टरवाद तथा बदले हुए आर्थिक माहौल  का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं पर पड़ा है। दुनिया की आधी आबादी पर कठमुल्लाओं और समाज की रूढ़िवादी ताकतों ने पहनने-ओढ़ने, सोचने-विचारने, चलने-फिरने, शिक्षित होने न होने  से लेकर मनुष्य की तरह जीने तक पर पाबंदी लगा दी है। अब समाज में औरतों की हर सामान्य गतिविधि के लिए एक कायदा निश्चित कर दिया गया है। उस पर तुर्रा यह कि ऐसे समाज में बलात्कारों, इज्ज़त के लिए की जा रही हत्याओं, भू्रण हत्याओं और आत्महत्याओं के लिए  स्वयं स्त्रियों को ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। पुरुष वर्चस्ववाद, कानूनों और सामाजिक मान्यताओं के भीतर ऐसे चोर दरवाज़े खोज लेता है जिसके जरिये वह हर स्याह को सफ़ेद और सच को झूठ सिद्ध करना उसके लिए आसान हो जाता है। ऐसे में शिवराम का  ‘दुलारी की माँ’ और जनम का  ‘वो बोल उठी’ जैसे नाटक पुरुष-प्रधान समाज  के अंधे पूर्वाग्रहों और जातिगत आधार पर किये जा रहे दोहरे अपमान का करारा जवाब बनकर उभरते हैं। ये नुक्कड़ नाटक दुनिया की आधी आबादी द्वारा समानता और सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए किये जा रहे  संघर्ष के सच्चे हमदर्द और हमसफर बनकर आते हैं। ‘दुलारी की माँ’, ‘वो बोल उठी’ की रजनी, माँ और रेशम आज की जाग्रत औरतों की प्रतिनिधि हैं। ये वे आवाज़ें हैं जो पुरुष वर्चस्ववाद के बंद कानों और कुंद मस्तिष्कों को झकझोरती हैं। इन नाटकों से यह साफ ज़ाहिर होता है कि मात्र समस्याएं गिना देने भर से समस्याएं दूर नहीं होती बल्कि उनसे अनवरत, अनथक लड़ाई लड़ी जानी चाहिए। स्त्री के मानाधिकार की लड़ाई, श्रमिक स्त्री की आर्थिक समानता की लड़ाई, स्त्री के संवैधानिक और मानवीय अधिकार की लड़ाई की रोजमर्रा के जीवन की छोटी-छोटी स्थितियों के माध्यम से उभारा गया है। चाहे दुलारी की शि़क्षा, रोजगार और विवाह का सवाल हो या रजनी को मुफ्त में मिल गए रिबन को भाई से बचाने और पिता से लड़कर उन्हें बांधने की स्वाधीनता की लड़ाई हो या फिर महिला श्रमिक रजनी की सहकर्मी पुरूष श्रमिकों से अलग और साफ शौचालय की मांग की बात हो। ये नाटक प्रतीकात्मक स्थितियों से निर्मित दृश्य रचकर कविताओं और गीतों के जरिए  और कई बार चुप्पी रचकर के ये सवाल उठाते हैं।

आज नुक्कड़ नाटक ने वह मुक़ाम हासिल कर लिया है कि नाटक का कोई भी अध्येता या विश्लेषक इसके अस्तित्व और महत्त्व को नकार नहीं सकता। नुक्कड़ नाटक आज देश के कोने-कोने में पहुँच रहा है।  कारखानों के गेट से लेकर राजनीतिक रैलियों तक, मज़दूरों के धरनों से लेकर शिक्षकों के प्रदर्शनों तक, दलितों की सभाओं से लेकर महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण की मांग के लिए निकाले जा रहे जुलूसों तक, विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों  के छात्रा-छात्राओं से लेकर प्रशिक्षित कलाकारों तक सभी ने नुक्कड़ नाटकों की शक्ति और उपयोगिता को पहचाना है। दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले कई वर्षों से नुक्कड़ नाटक के क्षेत्र में तेजी आई है। विभिन्न कॉलेजों में नुक्कड़ नाटक की अपनी स्वतंत्र संस्थाएं हैं-हिंदू कॉलेज की ‘इब्तदा’,‘ किरोड़ीमल कॉलेज की ‘द प्लेयर्स’ और ‘आह्वान’ मिरांडा हाउस की ‘अनुक्ति’ जैसी संस्थाओं के साथ ‘हसरतें’,‘ उन्माद’ आदि संस्थाएं निरंतर सक्रिय हैं। शिक्षा पद्धति की तमाम खामियों (डी कंपनी-प्लेयर्स, 2013) से लेकर ग्लोबल वार्मिंग (हम बुद्धिमान हैं-हंसराज कॉलेज), खाप पंचायतों के अत्याचार (जब चले खाप पर लट्ठ-प्लेयर्स), विस्थापन की समस्या (कहां जाएंगे भैया-इब्दतदा) औरतों-लड़कियों पर कसते सामंती शिकंजे का विरोध (अब तो बोल-मिरांडा हाउस) जैसी  समस्याओं को विद्यार्थी बड़े ही सचेत रूप में और नुक्कड़ नाटक की स्वस्थ परंपरा का विकास करते हुए उठा रहे हैं। कई नाटक उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की वजह से उपजी समस्याओं पर गंभीरता से सोचने को विवश करते हैं और नुक्कड़ नाटक की जनवादी परंपरा से खुद को जोड़ने का प्रयास भी करते हैं। कॉलेज की नुक्कड़ नाटक संस्थाओं के साथ  नाटक उत्सव में भी आज नुक्कड़ नाटकों की खासी लोकप्रियता देखी जा सकती है। कई कॉलेज लंबे अर्से से इस गतिविधि को अंजाम दे रहे हैं। दो वर्ष पहले दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित उत्सव ‘अंर्तध्वनि’ में इस साल नुक्कड़ नाटक प्रतियोगिता आयोजित की गई। पर एक समस्या कई नाटकों में देखी जा सकती है और वो है अधिकांश संस्थाओं की विचारधारात्मक शून्यता। छात्र मंडलियां जागृति के स्तर पर तो अपना काम करती दीखती हैं पर जनवाद की धारणा के आधार पर देखें तो अधिकांश नाटक सही वैचारिक परिप्रेक्ष्य न होने के कारण समस्या के माकूल जवाब खोजने के बजाय उसे उठाते तो हैं और फिर केवल प्रस्तुति के चमत्कारों में फंसकर रह जाते हैं। अनेक बार सतही कथ्य को भारी भरकम कलाशिल्प-कव्वाली, मानव-संरचनाओं की निर्मिति (पिरामिड संरचना आदि), गीत, विज्ञापन और फिल्मी गीतों-जुम्लों का भद्दा दोहराव,चीख-चीखकर सवाल उठाने की शैली आदि में पड़कर नुक्कड़ नाटक अपने मूल मुद्दे से भटक जाता है। दरअसल देखा जाए तो देश भर में जहां भी ऐसी छात्र संस्थाएं, सही जनपक्षधर चेतना के अभाव में केवल नुक्कड़ नाटक के खोल को अपना रही हैं वे नुक्कड़ नाटक आंदोलन को न सिर्फ क्षति पहुंचा रही हैं बल्कि नुक्कड़ नाटक के अस्तित्व के लिए खतरा भी बन रही हैं।

इधर कई गैर सरकारी  संगठन भी शिक्षा, सिगरेट शराबबंदी, पोलियो उन्मूलन,एड्स, पोषण और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर नुक्कड़ नाटकों की प्रस्तुति करते हैं पर समस्या यहां भी वही है। सही और ठोस वैचारिक परिप्रेक्ष्य का अभाव। एक तरह से इनकी हालत तो और भी बुरी है। इनके नाटकों में तो कथ्य और कलात्मकता का सिरे से अभाव है।जो नुक्कड़ नाटक के केवल खोल का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये न केवल नुक्कड़ नाटक के लिए घातक और खतरा  हैं बल्कि जनता के बीच इस विधा के उद्देश्य को लेकर एक बड़ा घाल-मेल पैदा करता है। आप जरा इनके नाटक देखें और पढ़ें। कलाहीन किस्म के खोखले कथ्य के नाटक हैं वे। मसलन यदि महिलाओं के अल्प पोषण पर नाटक है तो ये कहकर समाप्त हो जाता है कि पौष्टिक खाना खाओ,दवाई खाओ पर ये समस्या की तह में कभी नहीं जाएगा कि आधी आबादी को कितने पूर्वाग्रहों की वजह से पूरा भोजन मयस्सर नहीं, बेरोज़गारी, अशिक्षा मानाधिकार,  निजी क्षेत्र में असमान वेतन और शोषण की दास्तानें , यहां तक कि शौचालयों और साफ पानी की कमी। इन समस्याओं को ये नाटक कभी नहीं उठाएंगे। उठा ही नहीं सकते क्योंकि ये सीधे -सीधे संघर्ष और चुनौतियों की बातें करते हैं जबकि व्यावसायिकता और प्रचार केवल विशुद्ध मनोरंजन की मुद्दारहित बात करेगी। इनके अतिरिक्त कई वर्षों से नुक्कड़ नाटक की लोकप्रियता को विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने भी अपना चुनावी हथियार बना लिया है। ये उनके घोषणापत्रों पर आधारित नाटकों का प्रस्तुतिकरण करती हैं। दरअसल जिस वाम राजनीति ने इन नाटकों को जन्म दिया उसके मूल में बेहतर विकल्प और परिवर्तन के मुद्दों के साथ शोषणधर्मी सामंतवाद और पूंजीवाद का घोर विरोध शामिल था पर यदि आप सरकारी, गैर सरकारी और कई छात्र नुक्कड़ नाटकों को देखें तो वहां समस्या की जड़ में जाना तो दूर एक अधकचरी कला के साथ बिना सामाजिक,आर्थिक और सांस्कृतिक अंतर्विरोधों का साक्षात्कार किए, बिना व्यवस्थित कथा-विन्यास के समस्या का बेहद सतही सरलीकरण कर दिया जाता है। ऐसा लगता है कुछ लोग आए,घेरा बनाया, समस्या बताई और ढोलक बजाकर, गीत गाकर उसका सतही निदान बताकर कुछ उपदेश देकर चलते बने। दरअसल ये प्रवृत्ति जनता में नुक्कड़ नाटकों की एक गलत छवि बना रही है और ये नुक्कड़ नाटक  के क्षेत्र में जनवादी परंपरा के समक्ष एक बड़ा खतरा भी बनती जा रही है।

पर इतना तो कहना होगा कि तमाम खतरों और चुनौतियों के साथ नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता ने जहां आज इसे स्कूलों-काॅलेजों, चुनावी अखाड़ों में चर्चित कर दिया है वहां साहित्य के क्षेत्र में आज कोई भी नाट्य समीक्षक नुक्कड़ नाटक को ‘गटर थियेटर’ नहीं कह सकता(जैसा कि नुक्कड़ नाटक की शुरूआत में कहा गया) और न ही यह कहा जा सकता है कि नुक्कड़ नाटक बिना किसी तैयारी, पूर्वाभ्यास, या गम्भीर समझ के बस यों ही तैयार किया जा सकता है। अर्से से देश में नाटक की सर्वोच्च संस्था ‘राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय’ ने इसे अपने सालाना रंग महोत्सव में भी सहर्ष शामिल कर लिया हैं । आज नुक्कड़ नाटक का अपना सौदंर्यशास्त्र है और यह गतिशील सौंदर्यशास़्त्र है। नुक्कड़ नाटक जागृत सौंदर्यबोध की विधा है। इसके राजनीति आदर्श कलात्मक आर्दश भी हैं। ये कोरे प्रचार का या नारेबाज़ी का नाटक नहीं है और दूसरे ये कलाविहीन नाटक भी नहीं है जैसाकि इस पर आरोप लगाए गए। समय ने खुद इन आरोपों को बेबुनियाद सिद्ध किया है। एक बात ये भी है कि नुक्कड़ नाटक गतिशील सौदंर्यशास्त्र की विधा है। इसका कोई परंपरागत या निर्धारित तय रूप नहीं है। इसका सौंदर्यशास्त्र किसी बंधे-बंधाए ढर्रे या तयशुदा ढांचे का सौंदर्यशास्त्र नहीं है। पिछले चार दशक से अधिक की यात्रा में कथ्य और रूप के स्तर पर इन नाटकों में विविध प्रयोग देखने को मिलते हैं। यह अपने मूल स्वभाव में बदलाव की ओर अग्रसर विधा है जो सामाजिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक समझ से लैस है। व्यापक सामाजिक, राजनीतिक सांस्कृतिक बदलाव इसके कथ्य और रूप को परिवर्तित करते चलेंगे।

‘कला समाज के लिए’- सिद्धांत को लेकर चलने वाले ये नाटक कलात्मक हैं। कला के स्तर पर इनमें विविध प्रयोग देखने को मिलते हैं। गीत, नृत्य, दृश्य संयोजन, फैंटसीपरकता, किस्सागोई, नट-नटी संवाद,मदारी-जमूरा संवाद, कव्वाली का अंदाज, लोक गीतों का प्रयोग, किस्सागोई, कोरस, कविताएं, शेरो-शायरी से भरपूर। हास्य-व्यंग्य की धार, नयी-पुरानी कहानियों के कॉलेज की शक्ल, प्ले कार्ड, नकाब, मुखौटों की सहायता से नवीनता लाना, मुहावरेदारी, प्रोपर्टी के विविध प्रयोग। कितना ही कुछ है जिसे किया भी जा चुका है और नित नया करने की संभावना इनमें बरकरार है। नुक्कड़ नाटक एक स्थाई सौंदर्यशास्त्र का विषय नहीं है ये गतिशील सौंदर्यशास्त्र का विषय है तो प्रयोग निरंतर होंगे ही। हां दुहरावों से बचना भी जरूरी है।

बीसवीं शताब्दी का महत्त्व इतिहास में इसलिए गिनाया जा सकता है कि इस सदी में जन-संघर्षों ने निरंकुश, बर्बर सत्ताओं को धूल चटाई है। चाहे वह रूस का ज़ार हो या जर्मनी का हिटलर या फिर दमनकारी ब्रिटिश साम्राज्यवाद; सभी ने जनता के सामने घुटने टेके हैं। जनता ने अपने जीवन की दिशा को पूरे 180 डिग्री तक पलट दिया है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भले ही यूरोप के लिए समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्य 18वीं शताब्दी में स्वीकार हुए हों परंतु भारत जैसे एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के ग़रीब और संघर्षशील देशों ने इन आधारभूत जनवादी मूल्यों के अर्थ 20वीं शती में ही समझे।  पर आज़ादी और लोकतंत्र पा लेने के बाद भी भारत में निंरकुश तानाशाह सत्ताएं नष्ट नहीं हो गयीं है वे पूँजीवादी बाज़ारवादी ताकतों और रूढ़िवादी जड़ मान्यताओं की पोषक संस्थाओं की मदद से जब-तब आम जनता के अधिकारों का हनन करती हैं।  कहना न होगा कि जनवादी अधिकारों की रक्षा के लिए निरंतर  प्रयत्न करने की आवश्यकता अभी समाप्त नहीं हो गयी है। ऐसे में शिवराम का नाट्य रक्षक’ जैसा नाटक पूँजीवादी जनतंत्र के  विकल्प के रूप में समाजवादी जनवाद की जरूरत पर बल देता है।

आज जब ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ के फासीवादी विचार को मूत्र्त रूप देते हुए दुनिया को युद्धों की आग में झोंका जा रहा है और साथ ही साथ शोषण और अन्याय पर आधारित पूँजीवादी नव साम्राज्यवाद को विकल्पहीन बतलाया जा रहा है, तब विकल्पों की खोज एक अनिवार्यता बन जाती है। इस संदर्भ में यह कहना अनुचित न होगा कि विकल्पहीन समाज वास्तव में निर्जीव समाज होते हैं। इस संग्रह के सभी नुक्कड़ नाटक इन विकल्पों को सुझाते हैं वे आम जनता के इस विश्वास को मजबूत करते हैं कि ”जागेगा इंसान ज़माना बदलेगा।“

 

डॉ. प्रज्ञा 

किरोड़ीमल महाविद्यालय

दिल्ली विश्वविद्यालय

 

[जनकृति पत्रिका में प्रकाशित आलेख]

 

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