पुस्तक का चयन:-

प्रस्तुत पुस्तक राजनीति की किताब के सम्पादक अभय दुबे ने रजनी कोठारी का कृतित्व के आधार पर प्रकाशित किया है। जिसमें भारतीय समाज के संदर्भ में राजनीतिकरण के रूपरेखा को प्रदर्शित किया है। पुस्तक राजनीति की किताब के अनुक्रम में लोक चिंतन ग्रंथमाला को यह पहली कड़ी हिंदी के पाठकों का परिचय राजनीतिशास्त्र के मशहुर विद्वान रजनी कोठरी के कृतित्व से कराती है। पुस्तक के अनुक्रम के अगले अध्याय में भारतीय राजनीति के असलियत के बारे में बतलाया गया है जिसमें भारतीय राजनीतिक संस्कृतिक और भारतीय व्यक्ति की राजनीतिक शाख्सियत का विकास को प्रदर्शित किया गया है। वही पुस्तक में एक ही राजनीतिक दल का वर्चस्व कांग्रेस प्रणाली के बारे में बतलाया है। लेखक ने बतलाया कि 70वें दशक में कांग्रेस का तख्ता पलट हुआ और अन्य राजनीति दल का महत्व बढ़ने लगा। वहीं पुस्तक में जातियों के आधार पर राजनीति के बारे में प्रकाश डाला गया है। पुस्तक में दलित राजनीति के उभार कैसे हुए बतलाया गया है। राष्ट्रीय एकता के लिए वाहक के रूप में साम्प्रदायिकता के बारे में प्रकाश डाला गया है। वही विकल्पहीनता का महासंकट भूमण्डलीकरण बनाम राष्ट्र-राज्य, स्पर्धा आधारित ’समता या न्याय’ के प्रश्न पर आधारित पुस्तक का सम्पादन किया गया है।

अतः मैंने प्रस्तुत पुस्तक का चयन इसके बहुआयामी स्वरूप व भारतीय राजनीति के स्वरूप के आधार पर इसके प्रभाव के महत्व को ध्यान में रख कर किया गया है जिससे भारतीय राजनीतिक एकता बने रहने में सही अर्थ, महत्व व रूपरेखा का समझा जा सके।

पुस्तक का महत्व:-

सभी को यह ज्ञात है कि भारतीय लोकतंत्र की प्रमुख समस्याएं क्या-क्या है। भारतीय राज्य की प्रमुख दुविधाएं क्या रही है? आजादी के बाद से भारत को प्रमुख निराशाएं क्या-क्या रही है। आपकी राय में अब तक भारत का सबसे अच्छा और सबसे खराब राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बारे में चर्चा इस पुस्तक में की गई है। गठजोड़ राजनीति की भविष्य की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।

सबसे अच्छी और सबसे बुरी राजनीतिक पार्टी कौन-सी है? यह तुलना की गई है। यह पुस्तक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस पुस्तक में बतलाया गया है की गैर पार्टी राजनीतिक प्रक्रिया किस दिशा में जायेंगे। भारतीय संदर्भ में भुमण्डलीकरण का भविष्य क्या होगा। इस पुस्तक में आगे

चल कर गांधीवाद विचार की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला गया है।

यद्यपि राजनीति की किताब पुस्तक में भारतीय राजनीतिक गतिविधियों पर प्रकाश डाला गया है जिसमें उसके उतार-चढ़ाव पर चिन्हीत किया गया है जिसके आधार पर राष्ट्रीय एकता के बाधक  न ब

ने। 20वीं सदी के भारतीय राजपनीति गतिविधि को समझाते हुए समकालीन घटनाक्रम के समस्याएं एंव इसके प्रभाव को स्पष्ट करती है।

लेखक के संदर्भ में:-

इस पुस्तक के लेखक का नाम अभय कुमार दुबे है। करीब आठ साल तक भाकपा (माले लिबरेशन) के कार्यकर्ता रहे हे। लम्बे समय तक दैनिक जनसत्ता में काम करने के बाद विकासशील समाज अध्ययन पीठ में भारतीय भाषा कार्यक्रम के सम्पादक रहे। उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन, दलित आंदोलन, साम्प्रदायिकता, नारी मुक्ति आंदोलन और संस्कृति सम्बन्धि विषयों पर अध्ययन किया। सिनेमा और खेल पर भी लेखन कार्य किया। इनकी प्रमुख कृतिया-क्रांति का आत्म संघर्ष, नक्सलवादी आंदोलन के बदलते चेहरे का अध्ययन, साम्प्रदायिकता के स्रोत और आज के नेताः राजनीतिक के उद्यमी (बाल ठाकरे, काशीराम, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, ज्योति बसु, कल्याण सिंह और मेघा पाटेकर) के राजनीति जीवन के आलोचनात्मक अध्ययन पर आधारित पुस्तक की रचना कर इन सभी क्षेत्रीय राजीतिक दल के नेताओं का राज्यों के राजनीतिक में कैसे वर्चस्व आया। उन्होंने बतलाया है जो भाषाई, क्षेत्रीय, जातिय, दलित विहिन आदि मुद्दों पर आधरित वे उनके अधिकार के लिए इन सभी क्षेत्रीय पार्टियों का गठन हुआ।

पुस्तक के संदर्भ में:-

पुस्तक का नाम राजनीतिक की किताब है जो रजनी कोठारी के कृतित्व पर आधारित है। वाणी प्रकाशन, प्रा0 लि0, 469715, 21 ए दरियागंज, नयी दिल्ली-110002 द्वारा प्रकाशित है। यह पुस्तक 1-340 पृष्ठों का है। जिसमें सर्वप्रथम लोक चिंतन ग्रथमाला के श्रृंखला सम्पादक के रूप में विजय बहादुर सिंह, योगेन्द्र यादव ने किया है। इसके बाद संपादक  के परिचय अभय कुमार दुबे के बारे में बतलाया गया है। इसके बाद रजनी कोठारी जी से अभय कुमार दुबे जी की लंबी बातचील का वर्णन किया गया है। अनुक्रम के अगले कड़ी में अभय कुमार ने भारतीय राजनीति की असलियत की चर्चा की है जो कि राष्ट्रीय एकता के खतरे बढ़ते जा रहे है, उन्होंने बतलाया है। इसके बाद भारतीय राजनीति संस्कृतिक और भारतीय व्यक्ति की राजनीतिक शाख्सियत का विकास को लेकर उल्लेख किया गया है। भारत जब आजाद हुआ तो तब से लेकर 1977 तक कांग्रेस पार्टि का वर्चस्व के बारे में लेखक ने बतलाया है।

अतः उन्होंने बतलाया है कि बिना राजनीतिक दल के भी देश की व्यवस्था को चलाया जा सकता हैं। यानि दलविहीन राजनीति की बात किया है लेखक ने, इसी अनुक्रम में अगले अध्याय में साम्प्रदायिकता का अष्टावक्र की जिक्र किया। अभय दुबे ने जिसके कारण राष्ट्रीय एकता भंग हो रही है। भारत का जिसमें गोधराकाण्ड का जिक्र किया गया गया है। विकल्पहीनता का संकट राष्ट्रीय, अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन ने राज्य के माध्यम से भी ताकत का क्रम निश्चित किया। उसी जगह किसी व्यवस्था का उदय न होने के कारण चारों तरफ विकल्पहीनता का संकट नजर आ रहा है।

भुमण्डलीकरण बनाम राष्ट राज्य के बारे में उन्होंने चर्चा की है। स्पर्धा पर आधारित समता या न्याय पर भारतीय राजनीति की समस्या की अभय जी ने बतलाने की प्रयास किया है। लेखक, सम्पादक और अनुवादकार का परिचय किया गया है। जिसे रजनी कोठारी जी कांग्रेस सिस्टम कहते थे एवं क्या कारण है कि कांग्रेस के बाद क्षेत्रीय पार्टी का उदय हुआ। ये बतलाया गया है। इसके बाद इस पुस्तक की अनुक्रम में जातियों का राजनीतिकरण की बारे में बतलाने का प्रयास किया है। अभय जी ने बतलाया कि जातिय पर आधारित मतव्यवहार प्रभावित होती है। ये उद्गार भारतीय राजनीति में देखने को मिलता है। जिसमें समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, लोक जनशक्ति की पार्टी, राजद, जम्मु अकाली दल जैसे पार्टी का जातिय पर आधारित मत व्यवहार को प्रभावित करती रही है। इसी कड़ी में दलित उभार के मामले के बारे में दलित आंदोलन ने दलित पार्टियों जैसे- बी0एस0पी0 जी दलित के अधिकार की बात करते है। लेखक ने गैर पार्टी राजनीतिक प्रक्रिया का भी जिक्र किया है। जिसके समर्थक जयप्रकाश नारायन, महात्मा गांधी बने थे। इन्होंने बतलाया की बिना राजनीतिक दल के बने राज्य के कार्य किये जा सकते है। उन्होंने बतलाया कि राज्य से राष्ट्र के द्वारा कुछ राष्ट्र शब्द तात्पर्य और धारणाएं जैसे- भूमण्डलीकरण, सुरक्षावाद, नागरिक समाज, धर्म निरपेक्ष, जातीयता, बहुलतावाद, बहु संस्कृतिवाद की अस्मिता की पहचान की बात इन्होंने की है। इंदिरा गांधी राजनीतिकरण और तकनीक के वर्चस्व के कारा राष्ट्र में साम्प्रदायिक स्वरूप का यह मेल पिछले कुछ वर्षो से बड़ी है।

सांस्कृतिक प्रभाव के कारण सभी के विचार मूल्यों के क्षेत्र से सम्बन्धित है। इन विचारों और मूल्यों का सार प्रतिस्पर्धा की भावना है। इस भावना के कारण सभी व्यक्ति समूह और राष्ट्र प्रतिस्पद्र्धात्मक संघर्षरत हो जाते है। यह भारतीय सोच के लिए विजातिय है। समता की धारणा साम्प्रदायिक प्रतिस्पर्धा पर आधारित है।

विकल्पहीनता का महासंकट:-

लेखक अभय कुमार ने विकल्पहीनता का महासंकट के सोच के कारण पनपा प्रमुख  कारण लो लेकर बतलाया है कि राष्ट्रीय-अन्तराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से हुए आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन ने राज्य के मध्य मार्गी स्वरूप की ताकत का क्षय कर दिया है। उसकी जगह किसी वैसी ही राजनीतिक का उदय न होने के कारण चारों तरफ विकल्प हीनता का शून्य सा व्याप्त है। भारत में उदारतावादी हो या क्रांति प्रचलित विचारधाराएं भी इसे भरने में कोई मदद नहीं कर पा रही है।

यद्यपि देखा जायय तो नये सामाजिक आंदोलन गैर दलीय राजनीतिक प्रक्रिया को ठोस शक्ल देने में नाकाम रहे है। आशाओं का संसार छटपटा रहा है।

भूमण्डलीकरण बनाम राष्ट्र राज्य:-

भूण्डलीकरण बनाम राष्ट्र राज्य पर चिंता व्यक्त करते हुए लेखक ने भूमण्डलीकरण और राष्ट्र-राज्य के बीच जो विरोध बढ़ती जा रही है। उसके बारे में गहरा चिंता व्यक्त किये है। वही रजनी कोठारी जी ने दावा किये है कि राज्य की भारतीय किस्म विकसित करने का प्रयोग बीच रास्ते में दलित तोड़ते जा रहे है। ये अभिजन चिंतित है कि जनमानस की मांगों और दावेदारियों के कारण राजकाज चलाना कठिन होता जा रहा है। किन्तु उन्हें विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी राष्ट्रीय संचनाओं के वर्चस्व के कारण हो रहे राष्ट्र राज्य ओर अपने प्राधिकार और श्रम की चिंता नहीं है। यह देखने को मिलता है कि घरेलू मोर्चे पर कदम खींचने के कारण भारत की अन्तर्राष्ट्रीय हैसियत भी गिर गयी है।

अतः हमको मालूम पड़ता है कि भूमण्डलीकरण भारत के राष्ट्र निर्माण में बांधा प्रकट करता है। हमेशा यह भी मालूम पड़ता है की भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में अमेरिका केन्द्र में है। जो भारत की एकता पर घात करते आ रहा है।

स्पर्धा पर आधारित समता या न्याय:-

सामाजिक न्याय का प्रश्न राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि भूमण्डलीय आयाम रखता है। यूरोपिय ज्ञानोदय द्वारा थमायी गयी समता की अवधारणा दरअसल स्पर्धा पर आधारित है। यह व्यक्तिवाद और उपभोक्तावाद को प्रोत्साहन देती है। और सामुदायिकता का श्रम करती है। यद्यपि इसके दबले न्याय की अवधारणा देश और दुनिया को बेहतर मानव सभ्यता बनाने की तरफ ले जा सकती है। हिन्दी के गंभीर पाठक ऐसे महान समाज वैज्ञानिकों की रचनाओं की इन चयनिकाओं की मदद से भारतीय समाज संस्कृति और राजनीति की और गहरी समझ विकसित कर पायेंगे। 7वीं के दशक के मध्य में हुए संघर्ष से शुरू हुई थी जो उसके बाद भारतीय समाज के बेहद तेज रफ्तार से हुए सघन राजनीतिकरण के कारण अब नये चरण में पहुँच गयी है।

इसकी पहली कड़ी राजनीतिशास्त्री रजनी कोठारी के कृतित्व को समर्पित है।

प्रो0 रजनी कोठरी जिन्हें हम राजनीतिशास्त्र के जगत विख्यात विद्वान अन्यतम सिद्धांत का शास्त्री असाधारण संस्था निर्माता लोकतांत्रिक और मानवाधिकारो के लिए सक्रिया नेता कार्यकर्ता के रूप में जानते हैं। उनके जीवन और कृतित्व के बारे में नहीं जाना जा सकता है। इस लिहाज से वे राजनीति की एक पुरी किबात है। जिसे पढ़ना हर समझदार व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। उनको दावा है कि भारतीय समाज में राजनीतिकरण का मतलब है आधुनिकरण यानी राजनीति की नयी समस्या वह भारत जैसे कतई सेकुलर समाज में परिवर्तन की प्रतक्रिया की समझेगा। वंचित रह जायेगा। आज का भारत उसके हाथ से फिसल जायेगा, रह जायेगी कुछ उलझने, कुछ पहेलियां, पता नहीं इस देश का क्या होगा? पता नहीं राजनीति में जातिवाद खत्म कब होगा? यह हिन्दुत्व की धार्मिक राजनीति कहा से टपक पड़ा है। साम्प्रदायिकता का इलाज कौन करेगा। राजनीति में अचानक यह दलितों और पिछड़ों का उद्धार कहा से हो गया? पता नहीं भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए सरकारें और नेता कोई संस्थागत प्रयास क्यों नहीं करता? हमारे राजनेता इतने पाखण्डी क्यों होते है? पता नहीं हमारा लोकतंत्र पश्चिमी के समृद्ध लोकतंत्रों जैसा क्येां नहीं होता, एक बहुजातीय, बहुसंस्कृतिक और बहुभाषीय देश में केंद्रीकृत राष्ट्रवाद का भविष्य क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है कि हमारा राज्य कठोर बनते-बनते अन्तर्राष्ट्रीय ताकतों के समाने पोला साबित हो जाता है। जो लोग विकल्प की बात करते थे वे व्यवस्था के अंग कैसे बन जाते है। छोटे-छोटे स्तर के आंदोलन बड़े पैमाने पर अपना असर क्यो नहीं डाल पाते? हम पारम्परिक है या आधुनिक भारतीय बहुलतावाद आधनिकीकरण में बाधा हो या मददगार उतने उद्योगीकरण के बाद भी गरीबी क्यो बढ़ती जा रही है। किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत क्यों नहीं मिलता पहले कैसे मिल जाता था कांग्रेस ने जो जगह छोड़ रखी हो वह कोई अन्य पार्टी तो नहीं पा पाती। वामपंथियों का ऐसा हस्र क्यों हुआ? नया समाज क्यों नहीं बनता? ऐसे और ढेर चारे सवाल अनगिनत होगा न सिर्फ सोची जाते है। बल्कि सरोकार रखने वाले लोगों को दिमांगों को मथते रहते हैं।

अतः उनके बौद्धिक विकास का दूसरा पड़ाव इंदिरा गांधी का करिश्माई लोकतंत्र लाना और निरंकुश राजनीति का विरोध करता नजर आना, आलोचना की तरफ ले गया। उन्होंने अतीत के अपने कई प्रयासों को कड़ी निगाह से देखा और पाया कि गैर राजनीति पार्टी वास्तव में वैकल्पिक राजनीति के रूप में विकसित नहीं हो सकी है। उदारतावाद, माक्र्सवाद, गांधीवाद और नये सामाजिक आंदोलनो की परिघटनाओं, हर तरह की  साक्षेदारी संरचनाएं, भारतीय लोकतंत्र के बदलते हए चेहरे की व्याख्या करने में समर्थ है। कोठारी संस्थागत लोकतंत्र के माडल से हटकर प्रत्यक्ष लोकतंत्र के माडल की तरफ झुकते हुए नजर आये।

आत्मकथ्य:-

रजनी कोठारी आजकल ओलाचना के मुड में है और उनके निशाने पर जो शख्स है उसका नाम भी रजनी कोठारी ही है। वे खुद को बदलने के लिए तैयार है और न ही अन्य समाज विद्वानों के उस बौद्धिक अनुशासन के पुरोधा माने जाते है।

आलोचना की इस प्रक्रिया ने राष्ट्र निर्माण की उस परियोजना को भी अपने दायरे में ले लिया है। रजनी कोठारी जी अपनी विस्फोटक उर्जा अकादमी गतिविधियों का इस्तेमाल 1950 के दशक पालिटीकल विकली से जाना जाता है।

गैर पार्टी राजनीतिक प्रक्रिया का सैद्धांतिक प्रतिपादन करके मानवाधिकार आंदोलन में उनकी भागीदारी से शुरू हुई। सिक्ख विरोधी नरसंहार की जांच करने और उसके अपराधियों को सजा दिलवाने से लेकर उसके पीड़ितों को इंसाफ दिलाने में काफी सक्रिय भूमिका रहा। भोपाल गैस त्रासदी मेरी गतिविधियों का केन्द्र बनी।भारतीय राजनीति की असलियत भारतीय राजनीति का कच्चा-चिट्टा तैयार किया जाय तो। भारतीय लोकतंत्र में दलीय प्रणाली का खोज करने पर उनका हाथ कांग्रेस लगी जो एक पार्टी न होकर जो अपने आप में पूरा प्रणाली थी। कम्यूनिस्टों में सŸाा में आने से रोकन के लिए कांग्रेस और गैर कम्यूनिस्ट विपक्ष दलों में साठ-गांठ हो जाती है। जिसको कांग्रेस मजबूत नहीं बना पाता। सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों पर। जिससे लोकतंत्र का काम तो चल रहा है लेकिन यह एक स्वस्थ दलीय प्रणाली का स्थापना नहीं हो सकती, गुटबाजी बढ़ रहा है।

व्यवस्थित राजनीति एवं सेकुलर परितर्वन नही हो पा रही है वहीं दूसरी ओर सामान्य और रोजमर्रा के सामाजिक जीवन का आवश्यक राजनीतिकरण होता जा रहा है। कांग्रेस प्रणाली विपक्ष और लोकतंत्र पर किये गये उनके परवर्ती काम को भू्रण रूप देखा जा सकता है।

 

केन्द्र और राज्यों के सम्बन्धों का रहस्य:-

भारतीय संघीय सरकार के संचालन की व्याख्या आमतौर पर औपचारिक शैली में की जाती है। संघवाद है जो राज्यों और केन्द्र पर किसी तरह की एकरूपता आये।

ग्राम पंचायतों को भारत के गणराज्यो के रूप में देखने के पीछे एक अनरूप कारण भी था। संसदीय संस्थाएं भारतीय लोकतंत्र का व्यापक लोकप्रिय आधार है। ऐसे में विचार उभरा कि क्यों न गांव अपना शासन खुद चलाए।

एस0 के0 डी0 ने कहा कि ’’पांच लाख ग्राम गणराज्य नैतिक, भौतिक और आध्यात्मिक रूप से महान भारतीय गणराज्य के साथ एक मेल हो जायेंगे। इसी रोशनी में स्वशासी गावों से बने सामूदायिक समाज का सपना देखने वाली की कोशिश को देखा जाना चाहिए। जे0 पी0 के इन विचारों से सरकारी हल प्रभावित हुई है। जिसे इस घटना के पीछे चार आग्रह काम कर रहे है।

  1. पंचायती राज के जरिये
  2. स्थानीय समूदाय का परिवर्तन के द्वारा
  3. पंचायतों की शक्तियों का हस्तान्तरण के द्वारा
  4. आज जनता में ऐसे समान आधार पर राजनीति के राष्ट्रीय एकता को बाहर बनाये रहेंगे।

राजनीति में जनता की लोकप्रिय भागीदारी:-

राजनीति में जनता को भागीदारी अपने आप में एक अस्पष्ट है। इसमें से लोकतंत्र भी निकल सकता है और कारपोरेट राज्य और सर्वहारा की तानाशाही जैसे निरंकुश तंत्र भी। इन रूपों में ढालने के लिए हम नागरीकों के नीति सम्मान और अधिकारों पर आधारित भागीदारी के साथ सब ग्रामवासी सम्बन्धों के भागीदारी पर जोर देना होगा।

राष्ट्रीय एकता:-

स्थानिय स्वायत्ता को लोकतांत्रिक समाज का प्रमुख लक्षण माना गया। यह धारणा पश्चिम के समूदायों से लिया है। वहां सांस्कृतिक सहयोजन, आर्थिक, बहुत बड़ी समान विचारधारा के प्रसार के जरिये पहल राष्ट्रीय एकता उपलब्ध कर ली गई।

राजनीति विकास में खमियाँ:-

जैसा कि हम पहले देख चुके है कि इस देश में संविधान पर स्थापित औपचारिक ढाँचे और वास्तविक राजनीति प्रक्रिया में खासा अंतर है। वास्तविक राजनीति जातिगत साम्प्रदायिकता काफी प्रभावित करता है।

क्या है लोकतंत्र का भविष्य:-

भारत में लोकतंत्र के सफल होने या न होने के बारे में आमतौर पर हो जानेवाली दलीले इस प्रकार है। हमारे यहां लोकतंत्र इसलिए सफल होगा कि हमारे पास एक लोकतांत्रिक संविधान है जिसके तहत चुनी गई सरकार शासन चलाता है। विपक्षी दलों की काम करने की पूरा इजाजत है। बुनियादी अधिकारों की गारन्टी है। स्वतंत्रता, प्रेस, न्यायपालिका, आदि बातें लोकतंत्र के सफल होने का जरिया है।

यहाँ आलोचना की बात करे तो यहा का पुरा लोकतंत्र भी फर्जी हैं सरकार ही सब कुछ है और व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है। किसी को निर्णय का अधिकार नहीं है और कई राज्यों में बहुसंख्यकों की भाषा अल्पसंख्यकों पर की जा रही है।

राजनीतिक संस्कृति और भारतीय व्यक्ति का राजनीतिक शख्सियत का विकास:-

भारतीय राजनीतिक का विश्लेषण करने वाली विख्यात पुस्तक ’पालिटिक्स इन इंडिया’ के सातवें अध्याय में भारतीय संस्कृति और सामाजिक संरचना के कौन से पहलू व्यक्ति के राजनीतिकरण की प्रक्रिया के अनुकूल भारतीय राजनीतिक संस्कृतिक की चिंता यह है कि भारतीय परिवार और समाज का ढांचा जन्म से लेकर वयस्क तक होने तक जिस व्यक्ति की रचना करता है। वह आधुनिक जीवन में खरा उतर पाता है, की नहीं। राजनीतिक संस्कृति के आधर में सर्वप्रथम अस्पष्टता के प्रति काफी ऊँचे दर्जे की सहनशीलता रही है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से यह समाज अपनी ग्रहणशीलता के लिए जाना जाता है।

सŸा की विश्वेदित स्वभाव भारतीय जीवन शैली प्राधिकार की। अवधारणा को विखंडित होना पड़ा है। भारतीय परिवार कुटुम्ब व्यवस्था जाति प्रथा, सामूहिक व्यवस्था और ग्राम्य जीवन के बारे में नही। बल्कि सच है कि कुल मिलाकर भारतीय समाज का ढांचा अधिकारों और कर्तव्यों के स्पष्ट बंटवारे के आधार पर गठित सामाजिक श्रेणीयों के साथ एक ऐसे संस्कृति में रचा हुआ है।

पुस्तक का मूल्यांकन:-

अतः अभय कुमार दुबे जी के यह पुस्तक वर्तमान समय में प्रचलित दुष्प्रभावपूर्ण सामाजिक राजनीतिक कार्य प्रणालियों में जो क्षेत्र वादिता, भाषावादिता, साम्प्रदायिकता, जातिवादी आदि के आधार पर भारत का राजनीति की गर्त में ढकेल रहे है जिसके कारण राष्ट्रीय एकता बाधित हुई है।  जो अभी भी अभय कुमार दुबे जी के द्वारा सम्प्रदायिकता को राजनीति के किताब में प्रासंगिकतापूर्ण पुस्तक बतलाया है। उन्होंने जो बाते पुस्तक में वर्णित की वह वास्तविक है लेकिन लोग इसे जानते हुए भी भारतीय राजनीतिक को धुमिल कर रहे है।

Ratnesh Kumar Yadav

Research Scholar

Center for Political Studies

Central University of South Bihar

Gaya, Bihar

PIN-823001

Mob–9404845750

 

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