शोध सार

पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री मात्र ‘देह’ हैं। इस समाज ने पुरुष को अधिकार सौंपा है जबकि स्त्री को दायित्व का बोझ दिया है। पुरुषों के द्वारा लिखे गए इतिहास में स्त्रियों का स्थान शून्य हैं। अधिकांश स्त्रियाँ शिक्षित होकर भी स्त्री-चेतना से हीन हैं। तसलीमा नसरीन ने विभिन्न नारी-केंद्रित लेखों द्वारा सत्ता, धर्म और लिंग-भेद की राजनीति का खुलासा करते हुए समाज में नारी की वास्तविक स्थिति को उजागर किया है। लेखिका स्वयं स्त्री होने के साथ-साथ मुस्लिम समाज में पैदा होने के कारण स्त्रियों की समस्याओं को गहराई से महसूस करती है।

की वर्ड: नारी-स्वाधीनता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, तसलीमा नसरीन, धार्मिक कट्ठरपंथी, मानवतावाद

 

          ‘औरत का कोई देश नहीं’ तसलीमा नसरीन द्वारा विभिन्न अखबारों में लिखे गए स्तंभों का संकलन है। इसमें तसलीमा नसरीन के गंभीर, विचारोत्तेजक एवं नारी विमर्श को आंदोलित करने में समर्थ 46 लेखों का संकलन है। इनकी भाषा आक्रोश की भाषा है फिर भी उसमें तर्क के साथ संयम भी मौजूद रहता है। अपनी बातों को स्पष्ट करने के लिए प्रबल तर्क व तर्कों के समर्थन में इतिहास, राजनीति, दर्शन व धर्म से उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। स्वयं में स्त्री होने के साथ-साथ मुस्लिम समाज में पैदा होने के कारण स्त्रियों की समस्याओं को गहराई से महसूस किया और अपने लेखन को अधिक प्रामाणिक बनाया। वास्तव में तसलीमा नसरीन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में पूरे विश्व में एक आंदोलन का नाम है। इनके लेख मात्र लेख नहीं, बल्कि धर्मांध कट्टरपंथियों से लड़ने के कारगर हथियार हैं। इनके लेखों में मानवतावाद, मानवाधिकार, नारी-स्वाधीनता, धार्मिक कट्टरपंथ और नास्तिकता जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है। इन्होंने अपने अनुभवों व तर्कों के माध्यम से सत्ता, धर्म व समाज द्वारा लिंग-भेद की राजनीति का खुलासा किया है। लेखिका स्पष्ट करती हैं कि स्त्री को पुरुषसत्तात्मक समाज में मात्र ‘देह’ समझ जाता है और समाज द्वारा ही स्त्री को स्त्री, और पुरुष को पुरुष बनाया जाता है।

‘पुरुष के लिए अधिकार, नारी के लिए दायित्व’ लेख में लिंग-भेद की राजनीति को स्पष्ट किया गया है। प्रत्येक धर्म व समाज में नारी के लिए अधिकार के नाम पर कुछ नहीं कर्तव्यों एवं बंदिशों के ग्रंथ रचे गए हैं। पुरुषों द्वारा लिखे गए इतिहास में स्त्रियों का स्थान शून्य है। स्त्रियों की वर्तमान स्थिति को बेहतर बनाने के लिए इतिहास का झूठा उदाहरण दिया जाता है कि कभी स्त्रियों की स्थिति बहुत बेहतर थी। राष्ट्र में नागरिक होने का दर्जा मात्र पुरुषों को रहा है। महिलाओं को हमेशा अपना अधिकार लड़कर लेना पड़ा है। जबकि कई देशों में उनकी भूमिका क्रीतदासियों की भांति ही हैं। लेखिका पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा निर्मित संविधान पर भी प्रश्नचिन्ह्र लगाते हुए कहती हैं कि “किसी भी क्रांति ने, किसी भी संविधान ने, किसी भी कानून ने नारी के पक्ष में चूं तक नहीं किया। नारी को इंसान समझने का मन, बड़े-बड़े वरेण्य क्रांतिकारी व बुद्धि जीवी लोगों के पास नहीं था। पुरुषों के लिए अधिकार की व्यवस्था की गई वहीं नारी के लिए दायित्व की व्यवस्था की गई।”[1]

नारी को घर-संसार में रहकर पतिव्रता का धर्म निभाने का दायित्व सौंपा गया। ‘आत्मविस्मृति’ व ‘आत्मत्याग’ के सहारे संसार धर्म का पालन करने की सलाह दी। वहीं पुरुषों को ‘आत्मनिर्भरता’ व ‘आत्मगौरव’ के गुण बताए गए। इस लेख में 1942 ई० में छपी एक पुस्तक ‘नारी कर्तव्य शिक्षा’ का भी जिक्र है जिसमें स्त्रियों को किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, उनका परिवार, पति व समाज के प्रति क्या कर्तव्य है? आदि के बारे में बताया गया है। ये सभी कर्तव्य आदर्श भारतीय नारी के लिए हैं। किंतु वे भारत की पूर्ण नागरिकता की हक़दार नहीं होंगी। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के समय भी नारीवादी आंदोलन शुरू हुए लेकिन उसे राष्ट्रीयतावादी आंदोलन की खुराक बना दिया गया। उस समय जो स्त्रियाँ राजनीति में सक्रिय थीं उन्होंने भी नारियों के लिए खुलकर आवाज़ नहीं बुलंद की। उनका कहना था कि वे नारीवादी नहीं हैं। वे पश्चिम के नारी-वर्ग की तरह लिंग-युद्ध नहीं चाहतीं। भारत में स्त्री-पुरुष मिलकर कामकाज करने के अभ्यस्त हैं इसलिए यहाँ आंदोलन की जरुरत नहीं। राजनीतिज्ञों की अदूरदर्शिता व स्वार्थीपन को भी उजाकर करते हुए लेखिका ने संविधान में वर्णित उत्तराधिकार कानून विवाह और संतान के अभिभावकत्त्व के क्षेत्र में नारी के विरुद्ध वैषम्य दूर करने की बात पर जोर दिया है। जहाँ हिंदू-कानून में नारी-पुरुष के बीच का वैषम्य धीरे-धीरे कम कर दिया गया वहीं मुस्लिम कानून में नारी-अधिकार पर अभी भी प्रश्नचिन्ह्र लगा हुआ है। यहाँ भारत राष्ट्र के गणतांत्रिक स्वरूप को भी कठघरे में रखकर आंका गया है कि जिस राष्ट्र में नारी-पुरुष के लिए समानाधिकार न हो उसे ‘गणतंत्र’ कैसे कहा जाए?

‘बंगाली पुरुष’ शीर्षक से लिखें गए लेख में बहुत ही सूक्ष्मता के साथ घटनाओं का विश्लेषण करके लेखिका ने दिखाया है कि किस प्रकार पुरुष द्वारा किया गया ‘बहु स्त्रीगमन’ उसकी प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाता है। अगर यही कार्य कोई स्त्री करे तो उसे कुल्टा, वेश्या या चरित्रहीन कहकर अपमानित किया जाएगा। पूर्व व पश्चिम में औरतों के प्रति पुरुषों के रवैये का अंतः स्पष्ट करते हुए लेखिका अपने अंतरंग संबंधों को उजागर करती है। लेखिका अनुभव करती हैं कि बंगाली पुरुष स्त्रियों को मात्र अपनी सुविधानुसार भोगता है जबकि पश्चिमी पुरुष स्त्री की भावनाओं का भी ख़्याल रखता है। बंगाली पुरुष की इच्छा है तो वह ‘सेक्स’ करेगा चाहे स्त्री की इच्छा हो या न हो, जबकि पश्चिम में पत्नी की इच्छा के बगैर पति का सेक्स संबंध स्थापित करना अपराध हैं। भारत व बंग्ला देश में किस प्रकार धर्म के नाम पर स्त्रियों को गुलाम बनाया जाता है, और उनका शोषण किया जाता है? इसका भी खुलासा इस लेख में किया गया है। लेखिका बुद्धिजीवी व कलाकारों पर भी टिप्पणी करते हुए उनके स्त्री के प्रति नज़रिए को स्पष्ट करती हैं। लेखिका का मानना है कि सभी रक्षणशील, पुरुषतांत्रिक समाज में लगभग यही नियम है। लेकिन बंगाली पुरुष पढ़ा-लिखा होने के बावजूद, कलाकार होने के बावजूद, साहित्यिक बुद्धिजीवी होने के बावजूद पुरुषतंत्र की सुख-सुविधा जीने के लिए लगभग पगलाया रहता है।

‘नारी शरीर’ और ‘सुंदरी’ शीर्षक से लिखे गए लेखों में स्त्री देह के प्रति पितृसत्तात्मक समाज के नज़रिए को स्पष्ट किया गया है। हमेशा पुरुषों ने स्त्री देह को अपनी संपत्ति के रूप में देखा है। स्त्री-देह को मात्र यौन-सामग्री के रूप में देखा गया है। आज के विज्ञापनों में स्त्री को कोमल व सुंदर बनाने की बहुत सारी तरकीबें, नुस्खें बताए जाते हैं। औरतों को नाजुक बनाकर पुरुषों के समक्ष मनोरंजन हेतु पेश किया जाता है। पुरुष की पहचान कर्म के आधार पर की जाती है जबकि स्त्री को उसकी बनावट व सुंदरता के आधार पर। पुरुष अभिनेता बदसूरत होने के बावजूद अच्छा कलाकार बन जाता है जबकि स्त्रियों के लिए पहली शर्त सुंदर दिखना है। स्त्रियों के द्वारा साहित्य रचे जाने के लिए प्रोत्साहन स्वरूप लेखिका कहती हैं कि हमेशा पुरुषों ने अपने अनुसार स्त्रियों को गढ़ा है। अब स्त्रियों को मुक्त होकर इस संसार की व्याख्या अपने अनुसार करनी होगी। दलित साहित्य ने जिस प्रकार अपना सौन्दर्यशास्त्र गढ़ा है उसी तरह स्त्री साहित्य को पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र को नकारकर अपना अलग सौंदर्यशास्त्र गढ़ना चाहिए।

‘मेरा गर्व, मैं स्वेच्छाचारी’ में स्त्रियों द्वारा स्वयं को स्वेच्छाचारी कहने या मानने पर उसे कुल्टा कहा जाने लगता है, इस बात को लेखिका स्त्रियों की स्वतंत्रता से जोड़कर देखती हैं। लेखिका का मानना है कि पुरुष अगर स्वेच्छाचार करता है तो भी वह प्रतिष्ठित बना रहता है किंतु स्त्री स्वेच्छाचार करती है तो उसे अपमानित किया जाता है। लेखिका स्वेच्छाचार से आशय बताती हैं कि अपनी मर्जी से आचरण करना लेकिन ऐसा आचरण जिससे किसी की स्वतंत्रता बाधित न हो। इसी तरह ‘बंगाली नारी कल और आज’ लेख में लेखिका आज के समय की शिक्षित स्त्रियों के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए कहती है कि आज की स्त्रियाँ शिक्षित होने के बावजूद अपने आधिकारों के प्रति सजग नहीं हैं। अधिकांश स्त्रियाँ शिक्षित होने हुए भी स्त्री-चेतना से हीन है शिक्षित होने का मतलब नहीं कि वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक ही होगी और अशिक्षित होने का ये मतलब नहीं कि वह स्त्री, अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं है। ‘मेरे प्रेमी’ लेख में लेखिका ने आत्मकथात्मक शैली में अपने प्रेम प्रसंगों के माध्यम से पुरुषों के दोहरे चरित्र को उजागर किया है। लेखिका ने अपने जीवन के लम्बे अनुभवों से ज्ञात किया कि पुरुष स्त्री को मात्र देह के रूप में स्वीकार करता है अगर इससे आगे बढ़कर स्वीकारता भी है तो उस पर नियंत्रण कायम रखना चाहता है। एशिया व यूरोप के कई देशों में अलग-अलग प्रकार के लोगों से प्रेम-संबंध स्थापित करने के बाद लेखिका ने निष्कर्षतः यही पाया कि “मेरे प्रेमियों ने अलग-अलग कारणों से मेरी नज़दीकी की कामना की थी। किसी ने प्यार में डूबकर मुझे नहीं माँगा, किसी ने मेरे नाम के लिए, किसी ने धन के लिए, किसी ने यश-ख्याति के लिए, किसी ने देह के लिए…। … वे लोग शायद पुरुष थे, प्रेमी नहीं।”[2]

‘असभ्यता’ शीर्षक से लिखे गए लेख में लेखिका ने मानवाधिकार, समानाधिकार व नारी स्वाधीनता के पक्ष में अपने तार्किक विचार रखते हुए गणतांत्रिक राष्ट्र का आलोचनात्मक परीक्षण किया है। इसमें लेखिका ने लिंग- धर्म-गोत्र-वर्ण-जाति-संप्रदाय के भेदभाव से ऊपर उठकर, इंसान को इंसान मानने का आग्रह किया है। इसमें धर्मतंत्र व पुरुषतंत्र के गठजोड़ को उजागर करते हुए ‘इमराना’ नामक स्त्री के साथ हुए अन्याय को भी बताती है। ससुर द्वारा इमराना का बलात्कार किए जाने पर पंचायत और मुस्लिम लॉ बोर्ड का निर्णय कि ‘पीड़िता की शादी उसी बलात्कारी ससुर के साथ कर दी जाए’ हास्यास्पद है। केवल मुस्लिमों में ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों में भी इसके लिए अलग-अलग कानून है। मुस्लिम की तुलना में अन्य धर्मों में काफी कुछ सुधार हो चुका है, जैसे- हिंदू पुरुष के लिए बहु-विवाह निषिद्ध है। हिंदू-नारी अब संपत्ति के अधिकार से वंचित नहीं है। लेकिन मुसलमानों के सिर पर वही सातवीं शती के कानून लदे हैं। इस्लामी देशों में शरीयती कानून में सुधार हो रहा हैं। एकमात्र भारत में सुधार की कोई कोशिश नहीं। एकमात्र भारत में सुधार की कोई कोशिश नहीं। एक कानून के तहत औरतों को बचाया जाता है तो दूसरे कानून के तहत औरतों की जान ले ली जाती है। एक गणतांत्रिक राष्ट्र में धार्मिक कानून के नाम पर स्त्रियों की स्वतंत्रता व अधिकार छीना जाता है, यह कैसा गणतंत्र है? जहाँ पर संविधान सबके लिए समान है तो दूसरे धार्मिक कानून के नाम पर असमानता बरतने का आदेश क्यों दिया जाता है? लेखिका इन जायज़ सवालों को उठाते हुए ‘धर्मनिरपेक्ष’ या ‘सेक्युलर’ लोगों के ‘सो कॉल्ड सेक्युलर’ शब्द का प्रयोग करती है। उनका मानना है कि ‘अभिन्न दीवानी कानून’ लाने की बात कोई राजनीतिक पार्टी करती है तो ‘सेक्युलर’ इसका विरोध क्यों करते हैं? सेक्युलर लोगों को लगता है कि इस कानून को मानने का मतलब है हिंदू-कानून को मानना। जबकि ये कानून समानाधिकार के आधार पर बनाया गया कानून हैं जिसमें धर्म की कोई चर्चा या भूमिका नहीं होगी। ये स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान है। सेक्युलर मुस्लिमों के पक्ष में शायद इसलिए भी बोलते हैं कि वे भारत में अल्पसंख्यक हैं। किंतु इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी निष्पक्षता व तार्किकता खो दें।

‘रोजमर्रा की छुटपुट बातें’ लेख में टी.वी. के धारावाहिकों में स्त्रियों के सजे-धजे स्वरूप को देखकर निर्देशक व दर्शकों की मानसिकता को पढ़ने का प्रयास लेखिका करती है। लेखिका द्वारा निर्देशक से यह पूछने पर कि धारावाहिक में घर पर काम करते समय या सोते समय भी स्त्री पात्रों के साज-श्रृंगार में कोई कमी नहीं आती इसके पीछे क्या कारण है? जवाब में निर्देशक कहता है कि अगर स्त्री सुंदर नहीं दिखी तो टी.आर.पी. कम हो जाएगी, वहीं अगर पुरुष कलाकार साधारण भी दिखे तो फर्क नहीं पड़ता हैं। इस प्रकार के भेदभाव को रेखांकित करते हुए लेखिका प्रश्न करती हैं कि ‘औरतों को रंग-रोगन, अतिरिक्त ढ़ंग की जरूरत क्यों पड़ती है? ‘औरत=शरीर’ लेख में भी इसी प्रश्न को विस्तार देते हुए कुछ अन्य समस्याएँ भी लेखिका प्रस्तुत करती हैं।

लेखिका ने जिन-जिन बिंदुओं की ओर इशारा करते हुए अपने गंभीर विचार प्रस्तुत किए हैं वह समाज में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ राष्ट्रपति, राष्ट्रपिता, चेयरमैन आदि शब्द हैं वहीं स्त्रियों के लिए ऐसे शब्द नहीं ईज़ाद किए गए। ये शब्द इस मानसिकता के साथ गढ़े गए हैं कि स्त्री तो इस पदों तक पहुँच ही नहीं सकती। लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपने लेखों में निर्भीकता के साथ समाज की अच्छाईयों व बुराईयों को परखा है। लेखिका का मानना है कि सभी पुरुषों ने स्त्रियों का शोषण किया है, किंतु ऐसा मान लेना पूर्णतः न्यायसंगत नहीं है। भारत में स्त्रियों के हक़ के लिए सबसे पहले पुरुष ही आगे आए और उन्होंने समाज की आलोचनाएँ सहते हुए स्त्रियों को शिक्षित किया। जिससे स्त्रियाँ सशक्त होकर लड़ने के लिए तैयार हुईं। कुछ लेखों में लेखिका के विचारों में एकरूपता नहीं नज़र आती है एक तरफ जहाँ पूर्व व पश्चिम के पुरुषों की तुलना करते समय पश्चिमी पुरुष को श्रेष्ठ बताती हैं वहीं अगले ही लेख में कहती हैं सभी पुरुषों की मानसिकता एक जैसी होती है, सभी पुरुष एक जैसे होते हैं। ये विचलन स्वाभाविक है क्योंकि भले ही स्त्रियों के शोषण में स्त्रियाँ भी शामिल रही हों किंतु उनकी मानसिकता पितृसत्तात्मक बनाने में पुरुषों का ही हाथ है। ‘गेहूँ के साथ घुन भी पीसा जाता है’ जैसी कहावत सही है कि अगर सभी पुरुष स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं तो कुछ अच्छा करने वाले भी बुरे साबित हो जाते है। लेखिका के निर्भीक लेखन को पढ़ते समय ‘मुक्तिबोध’ की पंक्ति स्वतः ही मानस पटल पर उभर आती हैं-

“अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे,

उठाने ही होंगे

तोड़ने होंगे मठ और गढ सभी।”[3]

[1] नसरीन तसलीमा. (संस्करण 2009)औरत का कोई देश देश नहीं, पृष्ठ सं.-12, नई दिल्ली, वाणी प्रकाशन

[2] वही, पृष्ठ सं.-53

[3] मुक्तिबोध गजानन माधव, (प्रथम संस्करण 1964) चाँद का मुँह टेढ़ा है, अँधेरे में भाग-7, दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ

 

अनुराधा

एम.फिल. स्त्री-अध्ययन विभाग

म.गा.आ.हिं. वि , वर्धा

मो. नंबर- 9834406486

ईमेल- anuradha.loving91@gmail.com

[जनकृति में प्रकाशित लेख] [चित्र साभार: द हिन्दू]

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  • Vishwa Hindijan

    पुरुषसत्तात्मक समाज में स्त्री मात्र ‘देह’ हैं। इस समाज ने पुरुष को अधिकार सौंपा है जबकि स्त्री को दायित्व का बोझ दिया है। पुरुषों के द्वारा लिखे गए इतिहास में स्त्रियों का स्थान शून्य हैं। अधिकांश स्त्रियाँ शिक्षित होकर भी स्त्री-चेतना से हीन हैं। तसलीमा नसरीन ने विभिन्न नारी-केंद्रित लेखों द्वारा सत्ता, धर्म और लिंग-भेद की राजनीति का खुलासा करते हुए समाज में नारी की वास्तविक स्थिति को उजागर किया है। लेखिका स्वयं स्त्री होने के साथ-साथ मुस्लिम समाज में पैदा होने के कारण स्त्रियों की समस्याओं को गहराई से महसूस करती है।

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