तहखानों में भोर-सी बातें

अरविन्द सोरल

बातें कितनी होती है। कितने प्रकार की बातें। बातों के सहारे दुनिया चलती है। बातों के घोड़े पर चढ़ कर ही मनुष्य ने सभ्यता की इतनी सुदीर्घ यात्रा सम्पन्न की हैं।
बहुत सारी बातें बड़ी काम की होती है। उनसे ही निर्माण होता हैं। सृजन होता हैं। शाहजहाँ और उसके
इंजीनियरों के बीच क्या बाते होती होगी। ध्वंस भी होता है। सिकंदर और उसके सेनापतियों के बीच क्या
बातें होती होगी।

कुछ बातें होती है जो काल का रूपांतरण होती हैं। किंतु यह रूपांतरण बातों में करना प्रतिभा साध्य कार्य है। एक-एक दिन को डायरी के पृष्ठ भर बातों में बदला
है ओम नागर ने। बातों के अनन्त में बातें ही उड़ती है।
उनमें साहित्य की चिड़िया के पर पहचानना ही तो साहित्यिक प्रतिभा होती हैं।

ओम नागर ने सीधी-सरल तथा महत्त्वहीन लगने वाली
बातों में भी कुछ ऐसा देखा जो उन्हें संवेदित कर गया।
इसी संवेदना को सार्वजनिक करने का उपक्रम है-” निब के चीरे से “। वे सरलता के सीमान्त पर जीने वाले
अप्रासंगिक पात्रों में नायक खोज लेते हैं। ओम नागर की कविता तो अपना लोहा बहुत पहले मनवा चुकी थी।  इस कृति के साथ उनका गद्यकार भी सामने आया है। दोनों विधाओं को एक साथ प्रस्तुत करती यह अनूठी कृति है।

ठंड सभी को महसूस होती है। किंतु नागर को जाड़े के खाते भिन्न संदर्भों में लगते हैं। वे आग और मनुष्य के रिश्ते के वात्सल्य संबंधों की पहचान करते है-” बच्चों -सा स्नेह मिलता है आग को कोहरे के दिनों में। ” आग के नटखटपन के प्रमाण में बुजुर्गों की धोतियों के छेद
है ना । जाड़े की कँपकपाहट  का मजा आ जाता हैं।

एक कस्बाई बाजार की आलस्य भरी दिनचर्या किस कथा की पात्र हो सकती है। या कहें कि नायिका विहीन कथा की नायिका हो सकती हैं। खूब फ़ुर्सत में रहने वाले दुकानदारों की बातों में यह नायिका बार-बार अपनी चिलमन हटाकर झाँकती हैं।बोरिस पास्तरनेक ने ” डॉ. जिवागो” में कहा हैं-” जीवन जीने के लिए होता है जीने की तैयारी के लिए नहीं।” नागर
के ये पात्र जीवन को जीते दीखते है तैयारी नही करते।
नागर ने प्रत्येक पृष्ठ को एक प्रासंगिक कविता के साथ समाप्त किया हैं। ” उस्तरे की धार से कटती उदासी” का कवितखण्ड गद्य में चर्चित पात्रों की मानसिकता का अद्भुत चित्रण किया हैं।

इस डायरी के माध्यम से समाज के तहखानों में जीने वाले लोगों को सतह पर टहलने का अवसर मुहैय्या करवाते है ओम नागर। उनके जीवन की कड़वाहट,
कसेलापन, ज्यादह से ज्यादा फीकापन यही उनके हक की वसीयत हैं। फिर भी चाशनी में तैरने की
गलतफहमियों का उदघाटन पाठक के सामने तो है उन पात्रों के सामने नहीं। मुमताज़ के लिए बनाएं गये ताज़महल को सबने देखा ना। सिवाय मुमताज़ के।
कभी-कभी ये विडम्बनाएँ भी जीवनचक्र की
अतिश्रृंखल गति के लिए अपरिहार्य होती हैं।  पहियों के बीच साँसों की आवाजाही और उसकी निरंतरता
एक रिक्शे वाले को उसके हिस्से की सार्थकता प्रदान करते हैं।नागर इस सार्थकता के डिलिवरीमेन हैं।

भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित इस डायरी में बहुत कुछ हैं। जो भी है। पूरी चीरफाड़ के साथ । आप अपनी नंगी आँखों से अंदर बाहर साफ़-साफ देख सकते हैं। नागर का निब सर्जरी का धारदार उपकरण है। आप को कोई आंतरिक पीड़ा हो तो………।

पुस्तक समीक्षा

किताब: निब के चीरे से ( डायरी )
( भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार-2015 से सम्मानित )

लेखक: ओम नागर

प्रकाशन: भारतीय ज्ञानपीठ,नयी दिल्ली

मूल्य: २५०

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समीक्षक पता:- अरविन्द सोरल ( वरिष्ठ साहित्यकार )
23/25,सरायकायस्थान,कोटा-324005 ( राजस्थान) मोबाइल-9928199547

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