विदेशों में हिंदी के स्वरूप को समझने से पूर्व हमें हिंदी के बाजारवाद पर चर्चा करना जरूरी है और यह भी जरूरी है कि बाजार क्या है? बाजार कहते किसे हैं? और बाजारों में बोली जाने वाली भाषा का उससे क्या सम्बन्ध हो सकता है? दरअसल हमारा  समाज और बाजार एक दूसरे से जुड़े है और इनका परस्पर जुड़ना ही एक नई भाषा को जन्म देता है और फिर वह बनती है बाजार की भाषा और यह भाषा ही मनुष्‍य व्‍यवहारों के साथ हर क्षण बदलती रहती है। उसकी यह गतिशीलता ही उसकी जीवन्‍तता है।

पिछले एक दशक में पूँजी के असीम विस्‍तार होने के साथ-साथ संचार साधनों के अभूतपूर्व विकास को बढावा देकर जिस तरह विश्‍व बाज़ार बनाया है और उसके माध्यम से जो आर्थिक भूमंडलीकरण की भूमिका रची है, उसमें मुनाफा आधारित उत्‍पादन प्रणाली को दुनियाभर के नये बाज़ारों की ज़रूरत महसूस होने लगी है तथा बंद दरवाजे खुल रहे हैं और वैश्विक सीमाएँ टूट रही हैं तथा प्रतिबंध समाप्‍त हो रहे हैं। विश्‍व बाज़ार के सांस्‍कृतिक पहलुओं को भारतीय समाज की अंदरूनी तहों में प्रवेश कराने में हिन्‍दी की एक बहुत विशिष्‍ट भूमिका बन गयी है। हमारे यहाँ लगभग 100 करोड़ की आबादी में 18 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्‍दी है, 30  करोड़ लोग इस भाषा का उपयोग दूसरी भाषा के रूप में करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि लगभग 22 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में हिन्‍दी भाषा के सम्‍पर्क में आते ही हैं। अर्थात् 100 करोड़ की आबादी में यदि 50 से 55 करोड़ लोग एक ही भाषा के व्‍यवहार से जुड़ते हैं तो वह भाषा स्‍वाभावत: बाज़ार शक्तियों के इस्‍तेमाल के लिए एक प्रभावशाली उपकरण बन जाती है। एक अध्‍ययन के अनुसार भारत में 30  करोड़ का मध्‍यमवर्गीय उपभोक्‍ता बाज़ार मौज़ूद है जो दुनिया के बहुत सारे देशों की आबादी से कहीं अधिक बड़ा है। हिन्‍दी के घोड़े पर सवार उपभोक्‍ता बाज़ार महानगरों की सीमाओं से बाहर निकल रहा है।

राष्‍ट्र के उत्‍थान में भारतीय भाषाओं की विशेषकर हिन्‍दी की आज़ादी के पहले जो भूमिका रही है वह सर्वविदित है। आज़ादी के संघर्ष में यह साधारण और मेहनतकश जनता की मुक्ति की आकांक्षाओं की भाषा थी। इस भाषामें व्‍यापक जनता के सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और सांस्‍कृतिक आशय व्‍यक्‍त होते थे। अंग्रेजी के बरक्‍स यह भाषा एक काउंटर-फोर्स का रूप ले रही थी। स्‍वाधीनता प्राप्ति के बाद हिन्‍दी भाषा संख्‍या की दृष्टि से संसार के समृद्ध देशों की भाषाओं के बीच एकाएक खड़ी तो हो गयी लेकिन नये ज्ञान-विज्ञान से उसका सार्थक रिश्‍ता कभी बनाया नहीं गया। यह भाषा अधिक से अधिक केवल साहित्‍य, पत्रकारिता और मनोरंजन की भाषा बनकर रह गयी है। इस भाषा को बोलने वालों की व्‍यापक आकांक्षाओं को हमारे यहाँ शक्ति केन्‍द्रों ने हमेशा ही दबाया है। सच्‍चाई यह है कि आज़ादी के बाद के इन तमाम दशकों में सरकारी कार्यालयों और संस्‍थाओं में राजभाषा हिन्‍दी का जो प्रयोग अब तक बढ़ा है, वह एक संविधानिक आवश्‍यकता को पूरा करने की औपचारिकता के रूप में ही अधिक बढ़ा है।

वैश्विकरण या ग्लोबलाइजेशन, बाजारों की तीव्रता के माध्यम से पूरे विश्वभर में व्यवसाय और तकनीकी की उपलब्धता का निर्माण करना है। ग्लोबलाइजेशन ने इस पूरे विश्व में बहुत से परिवर्तन किए हैं, जहाँ लोग अपने देश से दूसरे देशों में अच्छे अवसरों की तलाश में जा रहे हैं। व्यापार या व्यवसाय के वैश्विकरण के लिए, कम्पनी या कारोबार को अपनी व्यापारिक रणनीति में बदलाव लाने की आवश्यकता होती है। उन्हें अपनी व्यापारिक रणनीति को एक देश को ध्यान में न रखते हुए इस तरह का बनाना होता है, जिससे कि वे बहुत से देशों में कार्य करने में सक्षम हों।

हिंदी की खूबी है कि काफी पहले से ही यह उदार,समावेशी और वसुधैव कुटुम्बकम् की प्रकृति वाली रही है। हिंदी का रिश्तों की मिठास की भाषा के रूप में भी कम महत्व नहीं है। कहा जा सकता है कि हिंदी सबको जोड़ने वाली भाषा हैं। हम एक ऐसे भारत में रहते हैं जो बहुभाषिक है। इक्कीसवीं सदी में निश्चय ही हम एक अधिक सघन बहुसांस्कृतिक परिवेश में रहते है।आज संस्कृतियां एक दूसरे में घुलमिल रही है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि हिंदी पढ़ कर हम आज सिर्फ हिंदी संस्कृति को जानते है। हिंदी एक उदार विश्व मन की भाषा है।हिंदी में सिर्फ भारत नहीं पूरा विश्व झलकता है। एक जीवंत भाषा का लक्षण है कि वह पूरे विश्व में बसती है और उसमें एक पूरा विश्व बसता है। निस्संदेह हिंदी पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निर्मित एक ऐसी कृत्रिम उपभोक्तावादी संस्कृति का दबाव है, जो इंसान को भीतर से एकायामी और छिछला बनाती है। हिन्दी में अंग्रेजी की घुसपैठ दूसरी किसी भी भाषा से ज्यादा है। हमें तेजी से भागती दुनिया में थोड़ा ठहरकर सोचना होगा कि यह संस्कृतिक सम्मिश्रण हैं या सांस्कृतिक आत्मविसर्जन । हमें निश्चय ही इन दोनों फर्क करना होगा ,क्योंकि हिंदी  के  विकास के साथ हिंदी की पहचान का प्रश्न कम महत्वपूर्ण नहीं है। हिंदी में उप-संस्कृतियों (सब कल्चर्स) का आभार भी है, जो हिंदी की विविधता चिह्न है। हिंदी की पहचान के प्रश्न पर विचार करते समय हमें संस्कृतिक आत्मविसर्जन का विरोध करना है और सांस्कृतिक विविधता और सम्मिश्रण के पक्ष में खड़ा होना है।  किसी भाषा का साहित्य उस भाषा का वैभव हैं,उस भाषा का सौंदर्य है। आज साहित्य की एक बड़ी समस्या उसका समाजिक विस्थापन है। आज उस चीज का कोई महत्व नहीं है जिसकी बाजार में कीमत न हो।

19 वीं शताब्दी के पुवार्द्ध में भारत से अधिकांश मजदूरों को मजदूरी करने के लिए मॉरिशस लाया गया। उनमें ज्यादातर गरीब परिवार के लोग थे।  गौरतलब बात यह है कि अनुबंध पर जाने वाले अनपढ़ लोग अपने को गिरमिटिया कहने लगे। इन गरीब मजदूरों के बीच उनकी लोक-संस्कृति रची-बसी थी, जिसका स्पष्ट स्वरूप को इस प्रकार जाना जा सकता है- जब वे धान काटते, रोपाई करते, दाना निकाल कर दौनी करते हुए इत्यादि अर्थात् उन गरीब भारतीय मज़दूरों की लोक भाषा भोजपुरी हुआ करती, जबकि पढ़े-लिखे लोग बोलचाल की भाषा के रूप में खड़ीबोली हिदी का उपयोग करते।  इस प्रकार से देखा जाय तो देश के बाहर हिंदी को पहुँचाने में गिरमिटिया मजदूरों की ही देन है। अत: गिरमिटिया देश के अंतर्गत फिजी, सूरीनाम, त्रिनिनाद, टोबागो इत्यादि देश मुख्य है। इसके अतिरिक्त गिरमिटिया देशों में से मॉरिशस भी एक है जहाँ हिंदी का अंतररराष्ट्रीय स्वरूप को देखा जा सकता है।

मॉरिशसवासी भारतवंशी अभिमन्यु अनत के शब्दों में- ‘‘मॉरिशस की हिंदी अपनी माटी की सौंधी खुसबू की गंध को आत्मसात करके ही अपना एक निजी स्थान बना सकी है और हिंदी के शब्द सरोवर में अपने हिस्से की चंद बूँदें जोर पाई है।”1

अत: देश के बहार या यूँ कहे भारतेत्तर देशों में हिदी का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को को विस्तार प्रदान करने में प्रवासी साहित्यकारों ने सेतु का काम किया है | इस प्रकार, विदेशों में हिंदी के स्वरुप को जानने के लिए निम्नबिन्दुओं पर विचार करना अति आवश्यक है, जो इस प्रकार से हैं-

जनसंख्या के आधार पर, भाषा के आधार पर, बोलचाल के आधार पर,  धर्म के आधार पर, संस्कृति के आधार पर, लोकगीत के आधार पर, रचनाकार के आधार पर, रचना के आधार पर, पत्र-पत्रिकाओं के आधार पर

 

सोमदत्त बखोरी के शब्दों में-

“भाषा की लडाई में,

ऊँचा किया नाम अपना

और अपने देश का

ऊँचा किया नाम अपने पूर्वजों का

और उनके देश का।”

 

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, गुयना, त्रिनिनाद, और टोबागो आदि विभिन्न देशों में भारतीय मूल के लोगों ने जो सघर्ष किया और बाद में मॉरिशस में या यूँ कहा जाय कि विदेशों में अपनी प्रतिभाओं के झंडे गाड़ें। साथ ही जैसा भी बन पड़ा, उन्होंने हिंदी की मशाल को वहां जलाए रखा है। चाहे भाषा के आधार पर हो या बोलचाल के आधार पर या धर्म एवं संस्कृति के आधार पर ही क्यों न हो। इन सबमें अपनी हिंदी भाषा की अस्मिता को बनाये रखने में भारतवंशी मुख्य रूप से सफल हुए है। साथ ही साथ नई परम्पराओं से गुणवान प्रवृतियों को प्रकास में लेन का काम किया है। साथ ही अपने सफल प्रयास से भारतवंशियों ने इस देश को समृद्ध किया है।

वस्तुतः आज भी हम भाषा की इस लड़ाई में हिंदी को किसी अन्य भाषा के साथ तुलना करने की बजाय हिंदी के अस्तित्व को सामने लाने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही मूल रूप से, अंग्रेजी की प्रभुत्ता से मुक्त होने के लिए, भाषाई अस्मिता को ठेस न पहुँचाते हुए सामंजस्य के साथ-साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है या यूँ कहें कि हमने इतने सशक्त प्रयास ही नहीं किये हैं जो भाषा के इस लड़ाई में हमारी हिंदी के साथ न्याय कर सके। अपने देश में ही हम ‘राजभाषा’, ‘संपर्क भाषा’ जैसी संकीर्णता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। चूँकि, प्रवासी साहित्यकारों के रचनाओं के माध्यम से जाना जा सकता है कि देश के बाहर भी हिंदी का अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप को जाना जा सकता है एवं उनके सतत प्रयास के परिणामस्वरूप ही विदेशों में हिंदी के विस्तार स्वरूप की महता मिल पाई है। अत: हिंदी को विकसित रूप प्रदान कर पाने में इन प्रवासी साहित्यकारों का  सफल योगदान रहा है।

वर्तमान समय में वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो, विश्व हिंदी साहित्य के अंतर्गत प्रवासी साहित्य एक लोकप्रिय एवं हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार का साहित्य बन गया है। पिछले कुछ दशकों से विदेशों में हिंदी साहित्य का जो सृजनात्मक विस्फोट हुआ है, इसमें हिंदी का वैश्विक स्वरूप काफी विकसित हुआ है। विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली पाँच भाषाओँ में से एक है- हिंदी। इसका प्रमुख श्रेय प्रवासी समुदाय को जाता है, जो कि भारतेत्तर देशों में जाकर रच-बस जाने के बावजूद भी आज हिंदी को अपने में समाए हुए है तथा हिंदी भाषा की असीम झलक को अपने मानस पटल पर अंकित भी किया है। साथ ही अपनी भाषा को जमीं से जोड़कर रखने में सेतु का काम किया है। अपनी जन्मभूमि से कोशों दूर रहने के बावजूद भी अपनी भाषा एवं संस्कृति को जीवित रखा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो इस देश में कोई व्यापक भाषा हो सकती है, तो वह केवल मात्र है- हिंदी  इसलिए उसकी वर्तमान स्थिति की और दृकपात् करके उसके गुणों पर विचार करना अभीष्ट है। जिस प्रकार, रत्न यदि कूड़े में फेंक  दिया जाए तो उसका क्या अपराध? अपराध फेंकने वाले का है। वहाँ पड़ा रहने से उसका रत्नत्व नहीं जाता। इस सन्दर्भ में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी भाषा’ में लिखा है-

“कनक भूषणसंग्रहणोंचितो यदि मगिस्त्रपूणी प्रणिधीयते

न स विरौति न चापि हि शोभते भवति योगायितुर्वचनियता।”

अर्थात् सोने की अंगूठी में जड़ें जाने योग्य हीरे को यदि कि ने काँसे में जड़ दिया तो उसका क्या दोष? इस दशा में न तो वह वहाँ पर शोभित ही होता है और न कुछ कहता ही है। हाँ, जड़ने की बुद्धिमता की सबलोग चर्चा अवश्य करते हैं।

इस प्रकार ‘प्रवासी साहित्य को मौलिक एवं नवीन स्वीकृति एवं अर्थ की महत्ता प्रदान करते हुए कमल किशोर गोयनका ने लिखा है- “प्रवासी साहित्य हिंदी का विराट संसार का मानस अंग है। उसने अपनी विशिष्ट संवेदना, दृष्टिकोण, परिस्थिति और सृजन प्रक्रिया के कारण प्रवासी हिंदी साहित्य को एक मौलिक रूप प्रदान करके हिंदी संसार में अपना योगदान दिया है।’’

अत:हिंदी के प्रचार-प्रसार में प्रवासी साहित्यकारों के योगदान को जानने हेतु हमें उनके द्वारा लिखित रचनाओं एवं पत्र-पत्रिकाओं तथा निम्नबिन्दुओं पर गौर करना अति-आवश्यक है-

ठाकुर दयाल पाण्डेय ने अपनी पुस्तक ‘मॉरिशस में हिंदी का उदय और विकास’ में लिखते हैं- “भोजपुरी यहाँ की हिंदी की जननी है, क्योंकि इस बोली में प्रारम्भ में हमारे पूर्वज सोचते-समझते और बोलते भी थे तथा अभिव्यक्ति का माध्यम भी था। जिस बोली अथवा भाषा में अपने ह्रदय की गहराई की तह तक पहुँचकर अनुभव करते हैं, अपनी बुद्धि से सोच-समझकर निश्चलतापूर्वक अपनी अभिव्यक्ति करते हैं, वह बोली व भाषा हमारी आत्मा का अभिन्न अंग है। अब भी हमारे अधिकांश भारतवंशी लोग भोजपुरी भी बोलते हैं। एक तरह से कहा जा सकता है कि उसी के माध्यम से हम अपने अज्ञानरुपी अन्धकार को दूर कर ज्ञानरुपी प्रकाश में आ गए हैं। आगे चल कर भोजपुरी का विकसित स्वरूप ही हमारे यहाँ की हिंदी में परिणत हो गया है।”

महेश भट्ट द्वारा निर्देशित चलचित्र ‘‘नाम’’ में आनंद बक्शी के मार्मिक गीत के माध्यम से बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है-

‘‘सात समुन्दर पार गया तू, हमको ज़िंदा मार गया तू

पहले जब तू ख़त लिखता था, कागज़ में चेहरे दिखता था

तेरी बीबी करती थी सेवा, सूरत से लगती थी बेवा

आजा उम्र है बहुत छोटी, अपने घर में भी है रोटी।’’

इस तरह दुनिया के सैकड़ों देशों में भारतीय और भारतीय मूल के व्यक्ति मिलेंगे जो हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओँ का भी प्रयोग में ला रहे हैं। इस सन्दर्भ में-

“हिंदी से सजती भारत की भाषाएँ

सब मिल गाएँ भारत की गाथाएँ

विश्व में फैले इसके गान

‘वसुधैव कुटुम्बकम’ इसकी शान

हिंदी ही अपनाएँ हम।”

21वीं सदी भूमंडलीय या वैश्वीकरण की सदी है और साथ ही सूचना एवं प्रौद्योगिकी की भी। इस युग में हिंदी को नव्यत्र वैज्ञानिक उपकरणों के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। वैसे भी यह अपने विशाल शब्द भंडार, वैज्ञानिकता, शब्दों और भावों को आत्मसात करने की प्रवृत्ति तथा ज्ञान-विज्ञान की भाषा एवं उसकी उपयुक्तता एवं विलक्षणता को लेकर चलती हुई। विश्व भाषा के रूप में शोभायमान हो रही है। लगभग 80 करोड़ आम लोगों बोली जाने वाली तथा 176 से अधिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली हिंदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी है। और हाल ही के नए आंकड़े प्राप्त होने के बाद यह विश्व की नंबर एक भाषा भीबनगयी है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य की बात की जाए तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की समृद्ध परंपरा दृष्टिगोचर प्रतीत होती है। बहुत सी जगह ऐसी भी है जहाँ भारत के लोग नहीं रहते परन्तु यह शोध का विषय है कि 80 करोड़ से अधिक आमजन द्वारा बोली जाने वाली रुसी, अरबी, स्पेनिश भाषा सयुंक्त राष्ट्र में स्थापित है बजाए हिंदी के। हिंदी के दूसरे देशों में फैलने का कारण धर्म एवं संस्कृति है क्योंकि भाषा ही इसकी वास्तविक संवाहिका होती है। यदि व्यक्ति धर्म से जुड़ेगा तो उसका भाषा से जुड़ना लाज़िमी हो जाता है। महात्मा गांधी, युवा शक्ति के प्रतीक सुभाष चंद्र बोस ने भी प्रवासी देशों से ही अपने अभियान की शुरुआत की थी। जापान सहित कई अन्य एशियाई देशों में हिंदी का प्रयोग 1911 के लगभग शुरू हो गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग अप्रत्यक्ष रूप से जापान में हिंदी के अध्ययन की सुदृढ़ स्थिति करने के लिए सराहनीय कार्य करता रहा है।

 

किसी भाषा को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने के निम्न बिंदु हो सकते हैं :-

 

  1. उसके बोलने जानने तथा चाहने वाले भारी तादात में हों और ये विश्व के अनेक देशों में फैले हों।
  2. उस भाषा में साहित्य-सृजन की प्रदीर्घ परम्परा हो और प्रायः सभी विधाएँ वैविध्यपूर्ण एवं समृद्ध हों। उस भाषा में सृजित कम-से-कम एक विधा का साहित्य विश्व स्तरीय हो।
  3. उसकी शब्द-सम्पदा विपुल एवं विराट हो तथा वह विश्व की अन्यान्य बड़ी भाषाओं से विचार-विनिमय करते हुए एक-दूसरे को प्रेरित प्रभावित करने में सक्षम हो।
  4. उसकी शाब्दी एवं आर्थी सरंचना तथा लिपि सरल, सुबोध एवं वैज्ञानिक हो। उसमें निरन्तर परिष्कार और परिवर्तन की गुंजाइश हो।
  5. उसमें ज्ञान-विज्ञान के तमाम अनुशासनों में वाङ्ग्मय सृजित एवं प्रकाशित हो तथा नए विषयों पर सामग्री तैयार करने की क्षमता हो।
  6. वह नवीनतम वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों के साथ अपने आपको पुरुस्कृत एवं समायोजित करने की क्षमता से युक्त हो।
  7. वह अन्तर्राष्ट्रीय राजनितिक सन्दर्भों, सामाजिक सरंचनाओं, सांस्कृतिक चिंताओं तथा आर्थिक विनिमय की संवाहक हो।
  8. वह जनसंचार माध्यमों में बड़े पैमाने पर देश-विदेश में प्रयुक्त हो रही हो।
  9. उसका साहित्य अनुवाद के माध्यम से विश्व की दूसरी महत्वपूर्ण भाषाओं में पहुँच रहा हो।
  10. उसमें मानवीय और यांत्रिक अनुवाद की आधारभूत तथा विकसित सुविधा हो जिससे वह बहुभाषिक कम्प्यूटर की दुनिया में अपने समग्र सूचना स्त्रोत तथा प्रक्रिया सामग्री (सॉफ्टवेयर) के साथ उपलब्ध हो। साथ ही, वह इतनी समर्थ हो कि वर्तमान प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों मसलन ई-मेल, ई कॉमर्स, ई-बुक, इंटरनेट तथा एस.एम.एस एवं वेब जगत में प्रभावपूर्ण ढंग से अपनी सक्रिय उपस्थिति का अहसास करा सके।
  11. वह विश्व चेतना की संवाहिका हो। वह स्थानीय आग्रहों से मुक्त विश्व दृष्टि सम्पन्न कृतिकारों की भाषा हो, जो विश्व स्तरीय समस्याओं की समझ और उसके निराकरण का मार्ग जानते हों।

 

जब हम इन तमाम प्रतिमानों पर हिंदी का परीक्षण करते हैं। तो पाते हैं। कि वह न्यूनाधिक मात्रा में प्रायः सभी निष्कर्षों पर खरी उतरती है। आज वह विश्व के सभी महाद्वीपों तथा महत्वपूर्ण राष्ट्रों जिनकी संख्या लगभग एक सौ चालीस है- में किसी न किसी रूप में प्रयुक्त होती है।  डॉ० जयंती प्रसाद नोटियाल ने भाषा शोध अध्ययन 2005 के हवाले से लिखा है कि, विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या 1 अरब 2 करोड़ 25 लाख 10 हजार 352 है। जबकि चीनी बोलने वालों की संख्या केवल 90 करोड़ 4 लालच 6 हजार 614 है। यदि हम इन आंकड़ों पर विश्वास करें तो संख्याबल के आधार पर हिंदी विश्व भाषा है। हाँ यह जरूर सम्भव है कि यह मातृभाषा न होकर दूसरी, तीसरी अथवा चौथी भाषा भी हो सकती है। जहाँ तक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनितिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक विनिमय के क्षेत्र में हिंदी के अनुप्रयोग का सवाल है तो देखने में आया है कि हमारे देश के नेताओं ने समय-समय पर अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में भाषण देकर उसकी उपयोगिता का उद्घोष किया है।

 

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची-

  1. ‘हिंदी भाषा’, महावीर प्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ संख्या- 50
  2. ‘मॉरिशस में हिंदी का उदय और विकास’, ठाकुर दयाल पाण्डेय, पृष्ठ संख्या- 67
  3. ‘मॉरिशस एक दृष्टि में’ श्री पुरुषोत्तमदास झुनझुनवाला, पृष्ठ संख्या- 25
  4. ‘अभिमन्यु अनत एक बातचीत’, कमल किशोर गोयनका, पृष्ठ संख्या-16
  5. स्मारिका पत्रिका, 10 वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन, स्दोक्टोर राष्ट्र्बंधुजी, पृष्ठ संख्या-217
  6. स्मारिका पत्रिका, 10वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन,पृष्ठ संख्या- 217, 218, 316
  7. उपन्यासकार अभिमन्यु अनत, श्री चित्रा वी. एस. पृष्ठ संख्या- 49
  8. लाल-पसीना’, अभिमयु अनत, पृष्ठ संख्या- 124
  9. मॉरिशस देश और निवासी’, श्री जितेन्द्र कुमार मित्तल, पृष्ठ संख्या- 67
  10. स्मारिका पत्रिका , १०वाँ विश्व हिंदीसम्मलेन , पृष्ठ संख्या- 321
  11. उपन्यासकार अभिमन्यु अनत, श्री चित्रा वी. एस, पृष्ठ संख्या- 143
  12. सात समुंदर पार (उपन्यास), जोगिंद्र सिंह कवल, पृष्ठ संख्या- 87
  13. ‘पहला कदम’, कृष्ण लाल बिहारी, पृष्ठ संख्या -35
  14. भूमंडलीकरण और मिडिया- कुमुद शर्मा- ग्रन्थ अकादमी, नई दिल्ली, संस्करण 2007
  15. विश्‍व बाज़ार और हिन्‍दी -विजय कुमार,ब्लॉग
  16. कार्यालयीय हिंदी अनुवाद – हरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
  17. कार्यालयी हिंदी एक कार्यालयीय अनुवाद तकनीक- डॉ.सुरेश महेश्वरी, विकास प्रकाशन, कानपुर
  18. व्यवहारिक हिंदी और रचना – कृष्ण कुमार गोस्वामी- वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
  19. प्रयोजन मूलक हिंदी- डॉ.देवेन्द्र शुक्ल- मंगलम पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली
  20. वही पृ. 14, 15, 17, 125, 127, 138,

 

तेजस पूनिया

स्नातकोत्तर उतरार्द्ध

राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय

सम्पर्क – 9166373652

tejaspoonia@gmail.com

[जनकृति पत्रिका में प्रकाशित]

 

 

 

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