हम सब आजकल ‘फर्जीवाड़ा स्टेशन’ पर खड़े है.चारों तरफ लूट मची है. कोई तो है जिन्हें इससे आनंद की अनुभूति हो रही है.व्यक्ति,समाज, देश नामक सभी इकाइयाँ फर्जीवाड़ा कोच में मजे से बैठी यही सब कुछ देखने को अभिशप्त हैं. कोई तो है जो इस उधेड़बुन में है कि लूट का दायरा कैसे बढे. कोई तो है जो इस जुगत में है कि कैसे माल काटा जाये. ऐसा लग रहा है मानो हम इस संसार में माल काटने के लिए ही अवतरित हुए हैं. देश का राजा मौन है और वह दूर देशों का गमन करते हुए अपनी प्रजा को लुटते हुए देख रहा है, संतगण अपने भक्तों को लूट रहे है, बैंक अपने कस्टमर को लूट रहे हैं, नेतागण अपने मतदाता को लूट रहे हैं. दुकानदार अपने ग्राहकों को लूट रहे हैं, शिक्षक अपने विद्यार्थियों को लूट रहे हैं.सभी के मनोमस्तिष्क में लूट की फैक्टरियां रन कर रही हैं.मजे की बात यह कि लूटने के लिए किसी ट्रेनिंग स्कूल जी जरुरत नहीं है.

देश के नीति नियंताओं को इस बात की कोई फ़िक्र नहीं कि देश किस ओर जा रहा है. वे ये मानते हैं कि जिस दिशा में चल रहे हैं वही सही दिशा है.वे इस अभिमान में डूबे हुए हैं कि दिशाएँ उनके इशारे पर चलती हैं, वे दिशाओं को अपनी ओर मोड़ने की शक्ति रखते हैं और वे सर्व शक्तिमान हैं. युवाओं की रोजगार की चिंता, उनकी सकारात्मकता, उनकी क्षमता के विकास के लिए तारे तोड़ने के वादे समयबद्ध कार्यक्रम के तहत शनैःशनैः दम तोड़ रहे हैं.दिशा बदलने में माहिर नीति-नियंता उन्हें भीड़ में बदल रहे हैं, सद्भाव की सुदीर्घ विरासत और परंपरा को ताक में रखकर उन्हें मानव बम बनाया जा रहा है या फिर उन्हें धर्म ध्वजा पकड़ाकर कांवडिया बनाया जा रहा है. देशभक्ति के अर्थ बदले जा रहे हैं.

हमारे देश में राजनेताओं की दो प्रजातियाँ हैं.एक वे हैं जो खुशहाली के पांच साल भोगते है और दूसरे वे जो बदहाली के पांच साल का अभिशाप झेलते हैं. नेताओं के जीवन में खुशहाली और बदहाली ऋतुओं की तरह आती-जाती है.खुशहाल नेताओं के लिए जनता पायदान पर रहती है और बदहाल नेताओं के लिए जनता सिर माथे रहती है. दोनों प्रकार के नेताओं के लिए जनता एक फुटबाल से अधिक कुछ नहीं होती.हमारे सबसे बड़े नेताजी खुशहाल वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए खुशहाल लोगों को और अधिक खुशहाल बनाने की मुहीम में जुटे हुए हैं.इसके लिए वे विश्व भ्रमण पर रहते हैं ताकि यह पता लगा सकें कि देश को कैसे और अधिक खुशहाल बनाया जाए. यह देशवासियों का दुर्भाग्य है कि अभी तक उनके हाथ में इसका कोई सूत्र हाथ नहीं लगा है. इसके लिए बड़े नेता जी को ‘शनिचर’ नहीं ठहराया जा सकता. वे संजीवनी बूटी की तलाश में देश-देश भटक रहे हैं.अभी नहीं तो क्या, कभी तो सफल होंगे. ‘असफलता ही सफलता की सीढी होती है’ के सिद्धांत पर संजीवनी की खोज जारी है. खोज का यह काम रुक ना जाये इसलिए वे जनता से अगले पांच नहीं पूरे दस साल मांग रहे हैं. उन्हें इसका भी भी आभास है कि बदहाल वर्ग के नेताओं के वाग्जाल में फंसकर जनता उन्हें कहीं अगले पांच सालों के लिए बदहाल नेताओं की बिरादरी में ना धकेल दे.जनता के मानस का क्या पता ? बड़े नेताजी भीतर ही भीतर भांप रहे हैं कि जनता क्या भांप रही है. पक्का तो नहीं कह सकते कितु शायद जनता भांप रही है कि देश में सांप सीढी का जो खेल चल रहा है उसमें ‘वसुधैव कुटुंबकुम’ का ध्येय तिरोहित होता जा रहा है.साम्प्रदायिकता का सांप नीम अँधेरे ही नहीं बल्कि उजाले में भी काट लेता है. सद्भावना दांव पर लगी है.रोजगार वाले हाथ खाली हैं, घर का बजट चरमरा गया है, भ्रष्टाचार में हम और मुल्कों के मुकाबले रॉकेट की गति से आगे बढ़ते जा रहे हैं. हमारे बैंक खाते लूटे जा रहे हैं,सड़कों की छोडिये, घरों तक में बहन-बेटियां, सुरक्षित नहीं हैं, वृद्धजन तक के गले काटे जा रहे हैं, सरकारी खजाने भरे जा रहे हैं और ये धन कहाँ लग रहा है, किसी को पता नहीं. पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम आसमान को छू रहे हैं. ऐसे में यदि बड़े नेताजी आसमान के तारे भी तोड़कर लायेंगे और गरीबी मिटाने वाली संजीवनी ढूंढ कर लायेंगे तो आखिर किस काम आएगी ?.

फारूक आफरीदी, बी-70/102,

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[जनकृति पत्रिका में प्रकाशित] 

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