“कविता की संवेदना हमारी  संस्कृति को द्योतित करती है।

 

 

हेब्बारः आज की कविता के विमर्श के संदर्भ में, विशेषकर हिंदी कविता के संदर्भ में समकालीनता की अवधारणा, स्थान, काल के साथ समकालीनता की संपृक्ति पर अस्पष्टता नज़र आती है। आप इस संज्ञा को किस नजरिए से देखते हैं?

प्रो. अरविंदाक्षन: सत्तर के दशक के आखिर में हिंदी कविता का तेवर बदलता दिखाई देता है। राजनीतिक क्षेत्र की निरंकुशताओं ने, वैश्विक स्तर पर चल रहे नव उपनिवेशवादी संक्रमण ने प्रौद्योगिक क्षेत्र की तेज़ रफ़्तार ने, पूंजी केंद्रित उदार आर्थिक नीतियों ने सामान्य जीवन को तिमिराच्छादित कर दिया था। इस अंधेरे के विरुद्ध हमें प्रतिक्रियान्वित होना ही था। कविता ने ही नहीं, साहित्य एवं कला के समस्त माध्यमों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। यह बहिरंग प्रतिक्रिया नहीं थी। कविता ने अपने ‘डीप-स्ट्रक्चर’ में समय की हीन जड़ता के विरुद्ध पूरी ताकत के साथ अपने होने का एहसास कराया था। कविता के इस अपने होने के एहसास को, रचनात्मक बहुलता के साथ समय-संपृक्ति की सही परिचिति को समकालीन कविता के नाम से अभिहित किया जाता रहा। सन् पचहत्तर से लेकर सन् दो हज़ार तक या सन् दो हज़ार से लेकर इधर दो हज़ार सोलह तक, यानी चालीस-इकतालीस वर्ष की हिंदी कविता समकालीन हिंदी कविता के नाम से ही चर्चा में है। इस शब्द के सामान्यीकरण के कारण या हिंदी कविता विमर्श के क्षेत्र में कविता मात्र को दशकों में बाँटकर देखने की सतही अकादमीय दृष्टि के कारण, पिछले चार दशकों में जीवन में चिह्नित हो रही तमाम तब्दीलियों के कारण, समकालीनता की पारदर्शिता पर सवालिया निशान पड़ा। यह स्वाभाविक है, लेकिन आज लिखी जा रही गंभीर कविताओं के साथ विशेषण के रूप में जुड़ा समकालीन शब्द मात्र विशेषण नहीं है। वह कविता का अभिन्न अंग है। वह कुल एक संज्ञा है। अतः समकालीनता की संपृक्ति पर कोई अस्पष्टता नहीं है। कविता का समकालीन होना सिर्फ अपने समय में होना भर नहीं है। समकालीनता को हमें आत्मसात करना पड़ता है, उसे अर्जित करना पड़ता है। यह हमारा हस्तक्षेप है। यही कविता का हस्तक्षेप भी है। जब समकालीनता को सतही दृष्टि से देखा जाता है तो लग सकता है कि वह एक स्थायी मुहावरा है, ऐसा नहीं है, वह एक सतत प्रक्रिया है। ऐसे में अस्पष्टताएँ दूर हो जाती हैं और हम कविता में अपने को तथा अपने में कविता को पूरी गंभीरता के साथ अनुभव कर सकते हैं।

समकालीन कविता में स्वीकृत थल और काल को बारीकी से देखा जाए तो पता चल सकता है कि पिछले इन चार दशकों की कविता का समय सिर्फ अपनी वर्तमानता तक सीमित नहीं है। समय का पूरा नैरंतर्य उसमें समाहित है। थल की भी यही स्थिति है। वह एक निश्चित भौगोलिक अवस्था द्योतक सत्य नहीं है। ज्ञानेंद्रपति की एक कविता इस प्रकार है-

पृथ्वी पर चलकर, उसे रौंदने के लिए

क्षमा माँगनेवाले विनत माथ कवि का उन्नत भाल वंशज!

मैं पूछता हूँ/यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है?

उक्त कविता में जो सवाल है, ‘यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है?’ उसका एक बृहद् इतिहास है जिसकी कालबद्धता और थलबद्धता उसकी समकालीनता को निर्धारित करती है। वस्तुतः समकालीनता को इसी तरह से आत्मसात् करें तो आज की कविता की देशजता, भारतीयता एवं उसकी व्यापक वैश्विकता स्पष्ट हो सकती है।

इल्लत: आप स्वयं एक कवि हैं। कविता, संवेदना, अधिकार, मानवाधिकार के आपसी सरोकारों को आप किस प्रकार व्याख्यायित करते हैं?

प्रो. अरविंदाक्षन: कविता की संवेदनात्मक सघनता ही पाठक समाज को कविता के प्रति आकृष्ट करती है। प्रत्येक श्रेष्ठ कविता अपनी संवेदनात्मक गहराई के कारण कालजयी साबित होती है। कविता की संवेदना वस्तुतः कविता का वह ‘विशन’ जिसमें जीवन का समग्र दर्शन समाहित है। वह इतना गतिशील है कि बार-बार पढ़ने पर भी ऊब पैदा नहीं होती है, बल्कि पुनर्पाठ के लिए हमें उत्प्रेरित करती है। कबीर को क्यों हम पढ़ते हैं, तुलसी का पुनर्पाठ ज़रूरी क्यों लगता है, निराला की पंक्तियाँ बार-बार स्मरण करने के लिए हम क्यों बाध्य होते हैं हमारी जीवन-दृष्टि पर इन सब की रचनाओं की संवेदना का गहरा असर पड़ा है। कविता की संवेदना ने हमें नवीकृत किया है, हमें संस्कार दिया है, विशाल एवं गतिशील जीवन की ओर अग्रसर होने के लिए हमें प्रेरित किया है, नई सौंदर्यानुभूति से हमें वलयित किया है। कविता तथा कविता की संवेदना हमारी संस्कृति को ही द्योतित करती है।

कविता प्रकटतः अधिकार की बात नहीं करती। परंतु इतिहास गवाह है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में अधिकार जतानेवाली कविताएँ भी खूब लिखी गई हैं। उदाहरण के लिए स्वतंत्रता संग्राम के दौर में लिखी गई कविताएँ या प्रगतिवाद के दौर की कविताएँ। अधिकार से वंचित लोगों के पक्ष में लिखी गई बहुत सारी स्थूल कविताएँ हमें मिली हैं। लेकिन इन स्थूल कविताओं के माध्यम से हम कविता में दर्ज अधिकार की बात नहीं कर सकते। कविता में अधिकार का एक सूक्ष्म अर्थ भी है। जहाँ-जहाँ मानवीयता पर जोर देनेवाली कविताएँ मिलती हैं, मानवीय मूल्य को महत्व देनेवाली कविताएँ केंद्र में आती हैं, मानवीय संघर्ष को केंद्र में रखकर लिखी गई कविताएँ मिलती हैं उनमें अधिकार का एक सूक्ष्म स्तर उपलब्ध होता है। अधिकार को संकेतित करनेवाली कविताएँ मनुष्य को इतिहास एवं संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में ही देखती हैं। ऋतुराज की एक कविता ‘अंधेरे में प्रार्थना’- एकाएक याद हो आती है-

ले चलो मुझे उस लोक से दूर कहीं

जहाँ निर्धन धनवानों को चुनते नहीं

जहाँ मूर्ख और पंगु नहीं बनते बुद्धिमान

जहाँ निर्बल स्त्रियों पर वीरता नहीं दिखाते शक्तिमान

पार करना मगरमच्छों से भरी कोई नदी

ले चलो मुझे इस लोक से उस लोक में

जहाँ चल सकूँ अपने बनाए रास्ते के आलोक में।

विचारों की कमी के इस कठिन समय में ऋतुराज ने उस मनुष्य को प्रस्तुत किया है, जो अपने बनाए रास्ते के आलोक में चलना पसंद करता है। यहाँ पर अधिकार आरोपित भाव नहीं, बल्कि मनुष्य की निजता है।

जहाँ तक मानवाधिकार की बात है, वह समकालीन कविता की अहमियत ही है। मानवाधिकार का अपना संघर्षबद्ध इतिहास है। समकालीन कविता को नज़दीक से देखा जाए तो मानवाधिकार के अलग-अलग परिदृश्य सामने आते हैं। ये सहज रूप से ही कविता में दर्ज हुए हैं। समकालीन कविता, ‘अथ’ से ‘इति’ तक, मानवाधिकार को पुष्ट करती रही। लेकिन मुखर होकर नहीं। उसकी संवेदनात्मक सघनता में मानवाधिकार के तत्व स्वतः संपृक्त हैं। अनामिका की कुछ पक्तियाँ इस प्रकार हैं (‘स्त्रियाँ’)-

सुनो हमें अनहद की तरह

और समझो जैसे समझी जाती है

नई-नई सीखी हुई भाषा

स्त्री को ठीक से, उसके अपने स्वत्व के परिप्रेक्ष्य में, उसके सच के परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए बात कही गई है। इस कविता में अधिकार या मानवाधिकार का कोई संकेत नहीं है। पर ये दोनों, परोक्षतः ही सही, पूरे विस्तार से, इतिहास की प्रामाणिकता के साथ सगुंफित हैं।

हेब्बारः कविता और संस्कृति का चिरंतन संबंध है। कविता की संस्कृति के विभिन्न पक्षों का उल्लेख आपके लेखन में हम देखते हैं। समकालीन कविता की संस्कृति पर मैं आपका विचार जानना चाहूँगा।

प्रो. अरविंदाक्षन: प्रत्येक श्रेष्ठ कविता अपनी संस्कृति चिह्नित करती है। आज की हमारी संचित संस्कृति में कविता की भूमिका नगण्य नहीं है। जो कविता समय की गतिशील, जीवंत एवं मनुष्य धर्मी उन्मुखता प्रकट करती है, वह बृहद् संस्कृति परंपरा का अंग बनकर भाषा विशेष को ही नहीं, बल्कि आगे के समय को भी सुनिश्चित करती है। कविता का इतिहास इसका साक्षी है।

आधुनिकता के दौर में सामान्यतः उदात्तीकरण की प्रवृत्ति मिलती है। समकालीन दौर में उसके स्थान पर जीवन की लघुता केंद्र में आती है। समकालीन कविता की इस प्रवृत्ति ने लघु जीवन की संस्कृति को प्रश्रय देने का कार्य किया है। हाशियेकृत जीवन के सच को कविता ने विषय बनाया और इस तरह हाशियेकृत जीवन की संस्कृति निरंतर चिह्नित होती रही। शैलेय की एक छोटी कविता इस लघुता की संस्कृति को हू-ब-हू व्यक्त करती है-

हताश लोगों से/बस

एक सवाल/हिमालय ऊँचा

या/बछेंद्रीपाल?

इसमें जीवन की लघुता के प्रति पक्षधरता ही नहीं, बल्कि मानवीय संघर्ष की संस्कृति भी ध्वन्यांकित है। सहानुभूति की संस्कृति की जगह संघर्ष की जिजीविषा इसमें स्पष्ट है। इस तरह की अनेकों कविताओं ने मानवीय संघर्ष की संस्कृति को तरजीह दी है।

संघर्ष की संस्कृति की तरह प्रतिरोध की संस्कृति भी समकालीन कविता में भरपूर मात्रा में सन्निहित है। प्रतिरोध जड़ता के विरुद्ध, रूढ़ियों के विरुद्ध, इतिहासहीनता के विरुद्ध, साम्राज्यवाद के विरुद्ध, उपनिवेशवादी संस्कृति के विरुद्ध, ‘कोर्पोरेट कल्चर’ के विरुद्ध अपनाए जानेवाला मानवीय दृष्टिकोण है जिसके अभाव में नागरिक बोध (सिविक सेन्स) विकसित नहीं हो सकता है और न एक गतिशील परंपरा संभव है। हमारी जितनी भी अर्जित गतिशील परंपराएँ हैं, जिसे हम अपनी सभ्यता कहते हैं, उसकी पृष्ठभूमि में प्रतिरोध की संस्कृति की तेजस्विता वर्तमान है। प्रतिरोध के अभाव में कोई भी संस्कृति वाँछित दिशा की ओर अग्रसर होती नहीं है। समकालीन कविता का गहन जीवन-संपृक्ति बोध उसकी सौंदर्यमूलक संस्कृति का निदान है। भारत की प्रत्येक भाषा में जहाँ-जहाँ समकालीन कविता अपनी ऊर्जा के साथ विद्यमान है वहाँ नई सौंदर्यानुभूति से निष्पन्न नई संस्कृति का द्वार खुलता दिखाई देता है। हिंदी कविता भी इसी महत्वपूर्ण श्रेणी में आती है। जीवन सापेक्ष सौंदर्य की नई संस्कृति समकालीन कविता की सबसे बड़ी देन है।

हेब्बारः कवि समाज का सजग प्रतिनिधि है। यह किस-किसके प्रति दिखाई पड़नेवाली सजगता है? यह सजगता किस रूप में कविता में प्रतिफलित होती है?

प्रो. अरविंदाक्षन: प्रत्येक नागरिक की तरह कवि भी समाज का प्रतिनिधि है। पर वह एक सजग प्रतिनिधि है। यहाँ वह सामान्य नागरिक से अलग दिखाई देता है। कारण स्पष्ट है। कविता लिखने का भारी दायित्व उसने अपने कंधे पर ले लिया है। कविता लिखना एक गंभीर रचनात्मक कार्य है। इसलिए वह जीवन को आंशिक तौर पर कविता में प्रक्षेपित नहीं कर सकता। जब तक एक कवि जीवन को समग्रता में प्रक्षेपित नहीं कर पाता तब तक वह अधूरा ही रह जाता है। अपूर्णता का यह बोध उसे पूर्णता की ओर ले चलता है। उसे बहुत कुछ को संबोधित करना पड़ता है, बहुत कुछ के प्रति सजग होना पड़ता है। सबसे पहले उसे आत्म सजग होना पड़ता है। आत्मसजगता रचनात्मक ईमानदारी से संबंधित है। आत्म सजग कवि अपने प्रति अकारुणिक होता है जिससे उसके अहं का विकास उत्तरोत्तर होता है। कवि-व्यक्तित्व का विकास, यानी तीव्रतम आत्म सजगता, कविता के प्रति समर्पित होने का भाव है। तात्पर्य यही है कि वह जीवन के प्रति समर्पित होता है।

कवि के बारे में बताया गया है, ‘रुदितानुसारि कवि’। यह कालिदास की उक्ति है। कवि रुदन सुनकर आनेवाला है। मैं इस उक्ति को कविता के बृहत्तर संदर्भ में महत्वपूर्ण मानता हूँ। यहाँ पर सवाल यह है कि यह किसका रुदन है, क्यों कर रहा है। मुख्य बात यही है कि कवि रुदन को सुनता है। यह कवि की उस सजगता के कारण है जो उसकी दृष्टि-संपन्नता का सृजनात्मक पक्ष है। मनुष्य के तमाम संघर्ष, उसके जीवन की विविध रंगी विडंबनाएँ, सामाजिक एवं राजनीतिक विद्रूपताएँ, जीवन की लघुता को कुचल दिए जाने से उत्पन्न उद्वेलन, मूल्य विघटन के तमाम पक्ष, विस्थापन की समस्याएँ आदि के प्रति कवि का सजग होना स्वाभाविक है। इस व्यापक जीवन परिदृश्य में वह रुदन को सुन पाता है। अष्टभुजा शुक्ल जब लिखते हैं- “हमें भले ही फलों के स्वाद की जानकारी कम हो/लेकिन आम को इमली और इमली को आम न कहना पड़े।’’ तो कवि की आत्मसजगता ही व्यक्त होती है। लेकिन राजेश जोशी की कविता ‘देख चिड़िया’ में नव-उपनिवेशवादी तंत्र की साजिशों को सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है-

देख चिड़िया/आजू-बाजू देख

ऊपर-नीचे देख/बाज़ार से आते/उस हाथ को देख

जो पिंजरा लाता है।/देख उस हाथ को गौर से

जो चावल के उजले दानों के नीचे/जाल बिछाता है

कवि की सांस्कृतिक सजगता का एक साफ-सुथरा चित्र इस कविता में है। लेकिन वाक्य में वह जितना सरल दिखती है, आस्वादन में वह उतना सरल नहीं है। अपनी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक सजगता को कवि व्यंग्य-विद्रूपता के माध्यम से, सपाटबयानी में निहित अतिसूक्ष्म दिशा संकेतों के माध्यम से, लोक जीवन के किन्हीं पक्षों के माध्यम से, प्राकृतिक परंपराओं के चित्रों के माध्यम से व्यक्त करता है। प्रत्येक अवसर पर कवि अपनी कविता की भाषा को तलाशता रहता है जिससे वह अपनी सजग दृष्टि बारीकी से व्यक्त कर सके।

हेब्बारः कविता अपने भीतर एक समाज को निर्मित करती है। समकालीन कविता के आलोक में कवि किस प्रकार के सामाजिक विकल्पों को पाठक के सामने रखता है?

प्रो. अरविंदाक्षन: कविता के भीतर सृजित समाज कविता का विकल्प है। पर यह समाज हमारे वास्तविक समाज से अलग-थलग नहीं है। वास्तविक समाज के नियत रूप की तरह कविता का समाज स्वयंपूर्ण नहीं होता। वह अलग-अलग टुकड़ों में बंटा हुआ होता है। पर जो दिशा-संकेत हमें मिलता है, वह पूर्ण होता है।

समकालीन कविता को हम अपने समय की कविता के रूप में इसलिए देख पाते हैं कि उसमें समय की तमाम विकरालताओं को किसी न किसी रूप में व्यक्त करने की कोशिश मिलती है जिसके हम गवाह हैं और हम भोक्ता भी हैं। हमारे समय की कविता जहाँ-जहाँ अपनी पक्षधरता संघर्ष करते मनुष्य के प्रति व्यक्त करती है तो वह उसका सामाजिक विकल्प है। संघर्ष करते मनुष्य के प्रति पक्षधरता का तात्पर्य सतही सहानुभूति की सामान्य अभिव्यक्ति नहीं है। कविता का इतिहास साक्षी है कि कविता ने समय-समय पर जटिल स्थितियों पर हस्तक्षेप करने का कार्य किया है। यह ज़रूर है कि कविता ने जीवन के सौंदर्य को भी अभिव्यक्त किया है। मनुष्य का संघर्षरत होना उसके सौंदर्य का एक पक्ष है। वह जड़ नहीं हो सकता है। वह अपने समय में जीवन बितानेवाला मनुष्य है जिसकी अपनी प्रतिक्रियाएँ हैं। समकालीन कविता ने इसी मनुष्य को हमेशा केंद्र में रखा है। वह मनुष्य अनगिनत आशंकाओं से घिरा है। वह तनावग्रस्त है। उसे प्रतिक्रियान्वित होना पड़ता है। सुदीप बैनर्जी की एक प्रतिक्रिया है- “यह सदी बहरी है/कोई बात नहीं/अगली सदी के लिए चिल्लाओ/अपने बच्चों के लिए चिल्लाओ/यह सदी बहरी है।” कई प्रकार की अनुगूँजें इस आह्वान में निहित है, वह है- ‘यह सदी बहरी है’। हमें सिर्फ इस आह्वान के लौह-द्वार को खोलना है। यह भारी पड़ सकता है, हमारे लिए। यह कार्य खतरे से खाली नहीं है। पर कविता प्रतिध्वनित होती है, वह कहती है- ‘यह सदी बहरी है।’

समकालीन कविता प्रतिपक्षधर्मी है। वह इस विकल्प को कविता की सौंदर्यात्मकता को बाधित किए बगैर व्यक्त करती है। ‘पराजयों के बीच’ लीलाधर मंडलोई की कविता बाह्यतः आह्वान सी प्रतीत होती है। परंतु उस आह्वान के भीतर एक जीता-जागता मनुष्य बिंबित दिखता है जो कविता को सौंदर्यात्मक विस्तार भी देता है और वैकल्पिक सघनता भी-

मैं रंग, लिंग, धर्म या नस्ल के आधार पे

बढ़ रहे आदमी के खिलाफ/सड़क पे जा सकता हूँ

मुमकिन है टूट पड़े कानून का कहर

कम-से-कम एक समाचार तो बन सकता हूँ

कि बंद पलकों में एक सही हरकत दर्ज हो

बंद कपाटों में ऐसी हलचल कि सोचना शुरू हो

हेब्बारः मानवाधिकारों की मांग की समकालीनता में दलित, स्त्री, आदिवासी कविता अधिकारों की मांग किस प्रकार करती है?

प्रो. अरविंदाक्षन: मानवाधिकार साहित्य से इतर एक अनुशासन के रूप में स्वीकृत है। वह विधि क्षेत्र का अनुशासन है और समाजशास्त्र का भी। लेकिन मानवाधिकार अब कई अनुशासनों और कई सामाजिक गतिविधियों से जुड़ा विषय भी है। ऐसे में वह साहित्य से भी जुड़ जाता है तो आश्चर्य की कोई बात नहीं है। साहित्य को आज कई दृष्टियों से देखा जाता है और उसका अंतर-अनुशासनपरक अध्ययन उत्तरोत्तर प्रासंगिक होता जा रहा है।

पुराने ज़माने में जब मानवाधिकार की कोई विशेष चर्चा उभर कर नहीं आई थी। उस समय भी साहित्य ने मानवाधिकार की बात पर जोर दिया था। जब हम प्रेमचंद के कथा साहित्य से होकर गुज़रते हैं, निराला की कविताओं या नागार्जुन की कविताओं में डूब जाते हैं हमें मनुष्य के बुनियादी अधिकारों से संबंधित कई बातें या मनुष्य के अधिकारों के हनन के कई पक्ष इन सबकी रचनाओं से हमें देखने को मिले हैं। मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ या ‘भूल गलती’ जैसी कविताओं को मानवाधिकार के संदर्भ में देखना प्रीतिप्रद हो सकता है तथा आस्वादन के नए परिपार्श्व उनमें मिल सकते हैं। वस्तुतः समकालीन कविता ने इन्हीं रचनाओं से काफी कुछ ग्रहण किया है।

समकालीन कविता में दलित-जीवन, स्त्री-जीवन और आदिवासी जीवन संबंधी कविताएँ खूब लिखी गई हैं। तमाम प्रकार की नव-उपनिवेशवादी या साम्राज्यवादी उभार के बावजूद विश्व भर में समाजवादी दृष्टि का विकास भी देखने मिलता है। इस दृष्टि ने हाशियीकृत समाज को साहित्य के केंद्र में रखा। हाशियीकरण का प्रतिरोध साहित्य में पहले भी मिलता है। लेकिन आज उसका वैश्विक आधार सामने आ गया है। आज हाशियीकृत समाज का आंदोलीकृत रूप देखने को मिलता है। उसने साहित्य पर, विशेष रूप से कविता में अति विस्तृत और अति गहन स्पेस ढूँढ़ने का कार्य किया है। एक तरफ़ इन तीनों प्रकार के विषय से संबंधित कविताएँ मानवाधिकार को नया तेवर प्रदान करती हैं और हमारी सामाजिकता को अत्यंत दीप्त भी करती हैं।

दरअसल समकालीन कविता में स्त्री कविताएँ या दलित कविताएँ या आदिवासी कविताएँ मुखर रूप से अपने अधिकारों की माँग के साथ प्रस्तुत नहीं होती हैं। स्त्री कविता का समकालीन कविता में स्थान दर्ज होते जाना ही सर्वाधिक मुख्य है। दलित कविता एक ओर दलित-जीवन की पीड़ाओं और प्रताड़नाओं की अभिव्यक्ति है तो प्रमुख रूप से समकालीन कविता की सच्चाई भी है। उसी प्रकार आदिवासी कविताएँ भी। कहना यह उचित प्रतीत होता है कि इन तीनों प्रकार की कविताएँ हमारी तीव्र सामाजिक दृष्टि का प्रतिफलन हैं तो वे मानवाधिकार की काव्यात्मक अभिव्यक्तियाँ भी हैं। एक विशेष समाज को यदि इतिहास ने अनदेखा किया है तो समकालीन कविता ने उसे उभारकर सामने रख दिया है। इसलिए इन कविताओं में स्त्री की अपनी आत्मवेदना से लेकर आत्मविश्वास तक की कविताएँ हमें मिलती हैं तो उसके प्रतिरोध के स्वर भी तीव्रतर रूप में हमें सुनाई पड़ते हैं। दलित-जीवन की कविताएँ हमारी संस्कृति के तमाम अलिखित अध्यायों को प्रामाणिकता के साथ अभिव्यक्ति दे पा रही हैं। वे कहीं मुखर हैं तो जायज हैं कि दबी हुई आवाज़ का वह उदय है। मानवाधिकार संबंधी हमारे नए अवबोध ने इनके लिए इतना सहारा दिया है।

हेब्बारः कविता अधिकारों की मांग करती है तथा उसके अनुरूप एक खास भाषा का भी सृजन करती है। समकालीन कविता की भाषाई संरचना पर अपना विचार व्यक्त करें।

प्रो. अरविंदाक्षन: समकालीन कविता की भाषा पर कम ही अध्ययन हुए हैं। यही नहीं समकालीन कविता की भाषिक संरचना पर दो आरोप सामने आए। ‘कृति ओर’ पत्रिका के संपादक कवि विजेंद्र ने अपनी पत्रिका में समकालीन कविता में छंद विषय पर एक बहस शुरू की। कई रचनाकारों ने उसमें भाग लिया। छंद कहाँ तक आज की कविता के लिए आवश्यक है, मुद्दा यही था। पत्रिका के एक अंक में कथाकार संजीव ने आज की छंद विहीन कविताएँ हमारे स्मृति-पटल से नष्ट होने को लेकर चर्चा की जबकि छंदयुक्त कविताएँ अब भी हमारी स्मृतियों में छाई हुई हैं। उस बहस के जवाब में मैं ने लिखा था कि वाचन की सुगमता या स्मरण रखने की सुविधा के लिए छंद की आवश्यकता पर ज़ोर देना ठीक नहीं है। यदि कोई समकालीन कवि स्वयमेव छंद का प्रयोग करना चाहें तो ठीक है। लेकिन जान बूझकर छंद को लादने से कविता में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हो सकता है। समकालीन कविता यदि हमारे बीच में है, पढ़ी जाती है, आस्वादित होती है तो उसका कारण वह हमारे जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। उसके लिए छंद की आवश्यकता नहीं है। उसकी वास्तविक लयात्मकता हमारे जीवन के अनगिनत पक्षों का स्पर्श करती दिखाई देती है।

दूसरा आरोप यह है कि आज के कवि मनमाने ढंग से शब्दों को इधर-उधर करके कविता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसका जवाब यही है कि शब्दों को इधर-उधर करके कविता नहीं लिखी जा सकती है। मुक्तिबोध का कथन आज भी सही है कि तनाव से ही कविता उत्पन्न होती है। उसे उन्होंने आत्मसंघर्ष भी कहा था। आज भी गंभीर कविताएँ गहन आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्तियाँ हैं। उसके बिना कविता जन्म ही नहीं ले सकती।

रही कविता की भाषिक संरचना की बात। समकालीन कविता में शब्द को सृजनात्मकता के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि कालबद्ध और थलबद्ध (टाइम रिलेटड एंड स्पेस रिलेटड) संदर्भ में देखा गया है। ऐसा भी प्रतीत होता है कि शब्द ही मनुष्य है जो अपने कठिन समय से संघर्ष कर रहा है। इसलिए शब्द सिर्फ एक प्रतीक नहीं है, बल्कि वह एक व्यापक अनुभव है। जब राजेश जोशी (मेटल डिटेक्टर) लिखते हैं कि “लुकते-छिपते किसी संघ से/झांसा देकर निकल भी जाए मेरा शब्द/तो लपककर दबोच लिया जाएगा/ बीच रास्ते में ही/या हज़ार-हज़ार निरर्थक शब्दों का शोर खड़ा कर देंगे वे उसके आसपास/आस-पास!…” यहाँ शब्द इस सच से वाकिफ़ है कि उनकी सार्थकता को झपकियाँ मारते ही निरर्थकता में बदलने की साजिश हमारा समय आसानी से कर सकता है। काल का यह आतंक हमारे थल का यथार्थ है और थल का आतंक काल का यथार्थ भी है। नई कविता के दौर में अज्ञेय ने रचना में शब्दों की अपव्ययता पर रोक लगाने की बात कही थी। कविता में इस बात की सख्त ज़रूरत भी है। समकालीन कविता में शब्दों की मितव्ययिता तो है ही। यही नहीं कि शब्द ही जीवन से साक्षात्कार करते दिखते हैं। प्रत्येक शब्द का अनुभव में संक्रमण करते जाने के दृश्य सुलभ हैं। शब्दों का यह अनुवाद समकालीन कविता की भाषिक सृजनशीलता का सशक्त उदाहरण है। यह उदाहरण हम सबसे छोटी कविताओं में तथा लंबी कविताओं में भी देख सकते हैं। शब्द, अनुभव, आत्मसंघर्ष और कविता का सातत्य एक निरंतरता के रूप में समकालीन कविता में रची-बसी दिखाई देती है। ‘कविता ही दुख की बोली है’ दिनेशकुमार शुक्ल की कविता है। यहाँ शब्द के स्थान पर ‘कविता’ शब्द का प्रयोग किया गया है- “कविता ने ही बताया भेद दुख का/इस अपार की सीमा है/यह अभाव भी अतल नहीं है/इस अनादि का आदि-अंत है/इस अनंत का कहीं अपरिमित अप्रमेय अज्ञेय कुछ नहीं है।” यह आह्वानपरक कविता नहीं है। हमारी दृष्टि में रूढ़ मूल हुई दृष्टि विपन्नता के अनुभव को बदलते हुए दृष्टि संपन्नता में तब्दील करने की सृजनात्मकता इसमें हम अनुभव कर पाते हैं और एक सृजनशील अनुभव के अतल में पहुँच जाते हैं- “जगत मिथ्या नहीं/कविता जादू नहीं।”

समकालीन कविता की भाषा में समय के कई रूपक मिल जाते हैं। जैसे शब्द अनुभव में तब्दील होने के दृश्य हम देख चुके हैं, उसी तरह समय का चित्रण समकालीन कविता में होता नहीं है, बल्कि समय एक सशक्त समय-सा प्रतीत होता है। उसके अंधेरे बंद कमरों और हवा हीन गलियारों से हम गुज़रते चले जाते हैं। विष्णुनागर ने लिखा “अजीब दहशत में हूँ/कविता लिखता हूँ” यह दहशत समय की वास्तविकता है। यह एक समयानुभव है। कवि की इन दो छोटी-छोटी पंक्तियों में दहशत का यानी समयानुभव का विस्तार होता जाता है। यहाँ हमारा इतिहास से होकर यात्रा ही तो चिह्नित है। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने एक बार यह कहा था कि काव्य भाषा जीवन संग्राम की भाषा हो सकती है। शलभ श्रीराम सिंह की एक कविता की पंक्तियाँ यों हैं- “जिस दिन अच्छी कविता लिखोगे/अपने से दूर हो जाओगे…/एकदम/… नौकरी से हाथ धो बैठोगे… अकेले रह जाओगे… एकदम/जिस दिन अच्छी कविता लिखोगे पागल करार दिए जाओगे/मार दिए जाओगे अचानक”- इस कविता में ‘जिस दिन’ जो समय का रूपक है और उसी का विस्तार दिया गया है। दृश्यवत् समय की अदृश्य गहराइयों की गंभीर पहचान इसमें मुख्य है।

भाषा के कोण से देखते समय समकालीन कविता अपनी भाषिक समृद्धि का परिचय दे रही है। समकालीन कविता की भाषा हम से स्पष्ट रूप से बता रही है कि कविता की चर्चा में भाषा कोई अलग या अंतिम इकाई नहीं है। भाषा कविता की जैविकता ही है। प्रत्येक कविता का आस्वादन कविता की भाषा के माध्यम से ही संभव है। कविता के जितने भी आयाम हैं, उन सबमें भाषा की ही सर्जनात्मकता हमें आकृष्ट करती है।

समकालीन कविता की भाषा में आत्मपक्ष की प्रमुखता है। एकांत श्रीवास्तव का मानना है- “आत्म अनात्म का शत्रु नहीं है।… अनात्म तक जानेवाला मार्ग आत्म से होकर गुज़रता है। हम जड़ों को काटकर किसी वृक्ष को हरा नहीं रख सकते… ‘हम’ के अट्टहास में ‘मैं’ का विलाप अनसुना रह गया है। ‘हम’ की पूजा में ‘मैं’ को बार-बार बलि देकर उसका बहुत लहू बहाया जा चुका है।” (कविता का आत्मपक्ष) कविता की भाषा की सृजनात्मकता के संदर्भ एकांत के इस वक्तव्य से हमें इसलिए सहमति जतानी पड़ती है कि कविता का आत्मपक्ष कविता की निजता है। इसी कवि की कुछ पंक्तियाँ हैं- “मेरी कविता दुखों की खान है/वहाँ दर्द की लिपियाँ हैं अपाठ्य।” आत्मपक्ष से यह कविता शुरू होती है। भाषा की वास्तविक शुरूआत सही आत्मपक्ष से ही संभव है। लेकिन इसमें तुरंत अनात्म की अभिव्यक्ति भी हुई है। मेरी कविता में दर्द की अपाठ्य लिपियाँ जो हैं उसमें अनात्म का अनुपात देखने के योग्य हैं। वस्तुतः कविता की भाषा का यह पक्ष विस्तृत अध्ययन की माँग करता है।

लोक का विलयन समकालीन कविता की भाषा की एक और अनन्य प्रवृत्ति है। लोक के विलयन के अभाव में कोई भी कविता सार्थक नहीं हो सकती है। लोक ग्रामीण जीवन का संश्लेषण नहीं है। लोक जीवन यथार्थ ही है। एक पारदर्शी यथार्थ जिसके माध्यम से कविता प्रामाणिक हो जाती है। अरुण कमल अपनी ‘हक’ शीर्षक कविता में मिट्टी के साथ के अपने आत्मीय संबंध को लोक दृष्टि से विलयित करके प्रस्तुत करते हैं- “मेरे घर से सटा सरसों का खेत यह मेरा नहीं/लेकिन रोज़ रात मेरी कोठरी में/आती है सरसों के फूलों की कौंधती गंध/एक ही बार काटती मुझे/और रात भर मैं जगा रह जाता हूँ/छोटी सी कोठरी गंध-भीड़-भरी/कथा थोड़ा भी हक का नहीं मेरा इस खेत पर?/मुझको मिल गई है सारी सुगंध/दाना को जाए भले खेत का मालिक…/थोड़ा भी हक नहीं?” हक जताने की बात के पीछे अरुण कमल की सूक्ष्मतम लोक दृष्टि ही प्रमुख है जो पूरे पाठक समाज की मानसिकता का अंग है। समकालीन कविता की भाषा की लोकलय हिंदी कविता की प्राणधारा है।

हेब्बारः कविता और मानवीयता के आपसी रिश्ते को कवि आलोचक के रूप में आप किस प्रकार देखते हैं?

प्रो. अरविंदाक्षन: मानवीयता मनुष्य की श्रेष्ठ एवं उदात्त पहचान है। इसलिए मनुष्य के सभी प्रकार की अभिव्यक्तियों में मानवीयता का संस्पर्श रहता है। मानवीयता हमारी सामाजिकता का भी प्रमुख पक्ष है। सांस्कृतिक दृष्टि में भी हमारी मानवीयता झलकती है। उसके अभाव में कोई भी रचना सर्वोत्तम स्थान की अर्हता प्राप्त नहीं कर सकती।

मानवीयता को उदात्तीकृत करके देखना संगत और समीचीन तो है। पर उसकी जड़ें जीवन यथार्थ के खुरदरे पक्षों तक व्यापी होने के कारण उसे यथार्थ के प्रकरण में देखना अधिक संगत प्रतीत होता है। सतही दृष्टि से देखने पर मानवीयता सब के लिए सुग्राह्य प्रतीत हो सकती है। लेकिन वह तलस्पर्शी नहीं हो सकती है। मानवीयता दर असल हमारे इतिहास बोध की प्रखर अभिव्यक्ति है। इसलिए उसे हमें मनुष्य की समूह गाथा के साथ रखकर देखना पड़ता है। यहाँ पर पक्षधरता की बात आती है। कविता ने संघर्ष करते मनुष्य का पक्ष लेकर उसके सौंदर्य को उजागर करने की कोशिश की है। अतः मानवीयता मानवीय संघर्ष की पक्षधरता की गाथा है। संघर्ष का अपना सौंदर्य है। वह जड़ता का विलोम है। वह आडंबर का भी विलोम है। वह अधिकार लिप्सा का विलोम है, अर्थात् वह जनतांत्रिकता की पक्षधरता भी है। वह आत्ममुग्धता का विलोम है क्योंकि वह आत्मविस्तार की अभिव्यक्ति है।

समकालीन कविता की मानवीयता ने हमें प्रतिरोध की ताकत दी है। प्रतिरोधी चेतना से सघन समकालीन कविता मुखर नहीं होती है। प्रतिरोध एक मानवीय दृष्टि है यानी वह मानवीयता से भरपूर है। प्रतिरोध में सिर्फ सतही विरोध दृष्टि की अभिव्यक्ति नहीं है। प्रतिरोध जब कविता की संवेदना की गहराइयों की अभिव्यक्ति बनता है तो उसमें संस्कृति की तमाम निरंकुशताओं को हम अनुभव कर पाते हैं, इतिहास की जड़ताओं से हमारा परिचय हो जाता है, हमारी कला दृष्टि या संवेदनात्मकता के प्रदूषित पक्षों से हमारा गहरा परिचय हो जाता है। इसे ही कविता की मानवीयता यानी कविता की संस्कृति की पहचान कह सकते हैं।

हेब्बारः अधिकारों की समग्रता और कविता के कथ्यपक्ष की प्रबलता को समकालीन कविता किस प्रकार अपने भीतर संजोती है?

प्रो. अरविंदाक्षन: अभा बोधिसत्व की ‘यशोदा की बेटी’ शीर्षक कविता इस प्रकार है- “बेटी हूँ जानकर/गिड़गिड़ाई माँ देवकी/मरी मैं/बचा तुम्हारा बेटा/जगत उद्धारक/मैं मरी और मरती रही तब से अब तक/तब मरी कृष्ण के लिए/अब मरती हूँ किसी/मोहन, मुन्ना, दीपक के लिए/इन्हीं कुलदीपकों के लिए/बुझती रही बार-बार/ताकि रहे कुल रहे उजियार/जिएँ जागें गाती रही मैं/तब भी मरती रही मैं…/क्योंकि मैं बेटी थी तुम्हारी…/मुझे तो मरना ही था/तुम न मरते पिता तो कोई दुर्योधन मारता मुझे/सभा के बीच साड़ी खींच/मुझे तो मरना ही था।”

जयप्रकाश कर्दम की एक कविता ‘गूँगा वहीं मैं’ इस प्रकार है- “तमाम विरोधों और दवाओं के बावजूद/जाति के जंगल का यह जीव/अपनी मुक्ति के लिए अड़ा है/अपनी अस्मिता और अस्तित्व के लिए लड़ा है/और आज तमाम हौसलों के साथ हाथों में खंजर लिए वह बाहर निकल हरामजादे/तेरी ऐसी थी तैसी।”

ऊपर के ये दो उदाहरण अस्मिता मूलक कविताएँ हैं। पहली कविता स्त्री का अधिकारों से वंचित किए जाते समाज के प्रति आक्रोश से युक्त है। दूसरी कविता, जो कि दलित है, जाति के नाम पर होनेवाली प्रताड़नाओं की तरफ बखूबी इशारा करती है और उसके प्रतिरोध में उठे हुए हाथ की ताकत की तरफ भी इशारा है। हाशियीकृत समाज से अधिकारों की माँग की बुलंद आवाजें उठ सकती हैं, जो सहज ही हैं। इसको समकालीन कविता ने विस्तार से अभिव्यक्ति दी है। इसके कई कारण हैं। इतिहास से अलग किए हुए समाज के प्रति गहन प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति, मानवीयता की इतिहासबद्ध अभिव्यक्ति, प्रतिरोध की ताकत की अभिव्यक्ति आदि इसके पीछे विद्यमान हैं। समकालीन कविता जीवन के गहन अवबोध की दृश्यात्मकता पर बल देती है। इसलिए एक गहन दुख, नैतिक संघर्ष, विडंबना से उत्पन्न मायूसी आदि ऐसी कविताओं के कथ्य पक्ष को गहन बनाने में सफल हैं। चंद्रकांत देवताले की एक कविता है- ‘थोड़े से बच्चे और बाक बच्चे।’ यह कविता हमारी जड़ीभूत होती दर्शक-स्थिति की अभिव्यक्ति है।

“थोड़े से बच्चों के लिए/एक बगीचा/उनके पाँव दूब पर दौड़ रहे हैं।” इसके आगे एक और दृश्य है- “असंख्य बच्चों के लिए/कीचड़, धूल और गंदगी से पटी/गलियाँ हैं जिनमें वे/अपना भविष्य बीन रहे हैं।” दो दृश्यों से यह कविता अधिकारों की समग्रता की बात भी करती है और कविता के कथ्य की रचनात्मकता को व्यापक इतिहासबद्धता के साथ प्रस्तुत भी करती है।

हेब्बारः कविता के मार्मिक आलोचक के रूप में समकालीन कविता की लोकदृष्टि और लोकबद्धता पर आपकी टिप्पणी क्या रहेगी, सर?

प्रो. अरविंदाक्षन: कविता की लोकदृष्टि या लोकबद्धता के दो रूप मिलते हैं। पहले वर्ग में वे कविताएँ आती हैं जो ग्रामीण जीवन के विभिन्न पक्षों से संबंधित हैं। ग्रामीण दृश्य, प्रकृति, मिट्टी की सौंधी गंध, खुली हवा, ग्रामीण लोग, लोकभाषा, ग्रामीण प्रतीक, ग्रामीण मिथक आदि ऐसी कविताओं में सहज रूप से पाए जाते हैं। इनसे कविता की लोकदृष्टि सघन होती है और ग्रामीणता की सहज पारदर्शता की अनुस्यूति भी मिलती है। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन ने प्रगतिशील दौर में ही हिंदी कविता की लोकदृष्टि को विकसित किया था। समकालीन कविता में भी लोकदृष्टि की तीव्रता मिलती है। विजेंद्र की कविताएँ इस संदर्भ में विशेष स्मरणीय हैं।

दूसरे वर्ग में वे कविताएँ आती हैं जो प्रकटतः ग्रामीण परिदृश्य से संबंधित नहीं होती हैं। ऐसी कविताओं में लोकदृष्टि अपनी सघनता एवं सांद्रता का परिचय देती है। जाहिर है कि लोकदृष्टि किसी जीवन परिदृश्य की विशेषता के कारण कविता में सांद्रीभूत होनेवाली दृष्टि नहीं है। यह सही है कि ग्रामीणता का सहज सौंदर्य है। पर वह जीवन की एक इकाई मात्र है। कविता जीवन की समग्रता की अभिव्यक्ति है। जितनी वह उसकी गहराई तक जाती है उतनी गहरी उसकी लोकदृष्टि होती है। अतः हम लोकदृष्टि को जीवन विस्तार या गहन जीवन के रूप में परिभाषित कर सकते हैं। लेकिन इस कवितानुभव को प्रामाणिक होना भी पड़ता है। ऐसे में लोकदृष्टि ही कविता का अंतरंग बनकर अभिव्यक्ति पाती है। एकाध कविताओं के माध्यम से इसे स्पष्ट किया जा सकता है। लीलाधर मंडलोई की एक कविता है ‘रिश्तों की नमी’ जो स्मृति की आर्द्रता को कवितानुभव में बदल देती है। स्मृति की आर्द्रता कवितानुभव होने के पहले एक सार्थक जीवनानुभव है। “सूख जाती है जिनके मन की नदी/उन्हें बचपन की नदी याद नहीं आती/वे भूल जाते हैं पानी के विस्मय को/पानी का अर्थ उनके वास्ते/उसका धुंधला-सा बिंब रह जाता है स्मृति में/जिनके रिश्ते टूट जाते हैं नदी से/उनके संबंध सूख जाते हैं अपनों से/वे ताउम्र तरसते रहते हैं/रिश्तों की नमी के लिए/वे अकेले पड़ जाते हैं।” रिश्तों की नमी पर केंद्रित यह कविता एक पारदर्शी जीवन को प्रस्तुत कर रही है। कवि ने नदी के प्रवाह के माध्यम से जीवन की अर्थवत्ता खोजी है। नदी, नदी प्रवाह, नदी का सूख जाना, रिश्तों का टूटना, रिश्तों की नमी, अकेलापन आदि के माध्यम से पारदर्शी जीवन का लोक ही कवि ने सृजित किया है। यह हमारा लोक है। उसके रेशे-रेशे के साथ ही हम जुड़े हैं, उसी से कभी कटते हैं। जीवन का यह उतार-चढ़ाव, जुड़ना और बिखरना, नमी और सूखा आदि एक लोक को सृजित कर रहे हैं। इस लोक के कारण ही वस्तुतः कविता की संवेदना गहरी होती जा रही है।

एक अन्य कविता ऋतुराज की है- ‘उसका जिंदा रहना बहुत ज़रूरी है’। कविता की पवित्र भाषा के माध्यम से कविता का लोक-सृजन ऋतुराज का अभीष्ट लगता है। उनका मानना है जब कवि अपनी बानी से कुछ कह रहा होता है तो जड़ समय, याने तमाम निरंकुशताएँ टूटकर गिरने लगती हैं। यह कविता का ‘लोक’ है। यह कविता द्वारा सृजित समय है जो हमारे वास्तविक समय से भिन्न है। उसकी अपनी समय-सापेक्षता है। उक्त कविता की पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं- “असंख्य क्रूर आवेगों के भीतर/दया की कितनी बारीक प्रतिध्वनियाँ हैं?/यह बात सिर्फ कवि ही जानता है।/उसे बोलने दो और जिंदा रहने दो/नन्हीं सीढ़ियों पर तुम्हारे चढ़ने को/अगर वह स्वर्गारोहण कहता है/तो यहाँ कोई नहीं जो उसका प्रतिवाद करे।/उसकी अतिशयोक्तियाँ भी/ऊँची मीनारों की खिड़कियों की तरह/सुंदर और सम्मोहक होती हैं।” इस कविता के माध्यम से ऋतुराज ने जो लोक रचा है, वह कवि द्वारा प्रदत्त दया या करुणा का है। करुणा का यह सृजन या करुणा का यह लोक दैनंदिन क्रूर व नृशंस वातावरण के बीच कवि सृजित कर रहा है। एक तरफ क्रूरता का आवेग और दूसरी तरफ दया का तेज दीप्त प्रवाह। निरंकुशताओं के भीतर ही कवि दया की धारा को प्रवाहमान बना देता है। अतः यहाँ लोक आज के जीवन के वैरुद्ध्य और कविता की जीवनीशक्ति की भिडंत से उत्पन्न लोक से बना है। लोक दरअसल कविता द्वारा सृजित समय सापेक्ष दृश्यात्मकता ही है।

हेब्बारः ‘समकालीन कविता की रचनात्मक चिंता में मानव के भविष्य के प्रति चिंता है।‘ प्रकृति के ध्वस्त होते जाने की वर्तमान स्थिति में इस विषय पर मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ। कृपया बताएँ कि विकास की अंधी दौड़ में मानवीय अधिकारों की स्थिति क्या होगी?

प्रो. अरविंदाक्षन: अपने वर्तमान में रहकर कविता अतीत की तरफ और कभी भविष्य की तरफ देखती है। अतीत की तरफ कविता इसलिए देखती है कि वह ऊर्जा केंद्र को देख सके। इससे प्रेरणा प्राप्त करे और अपनी परंपरा को कायम रखे। लेकिन कविता का झुकाव अधिकतर भविष्य के प्रति ही रहता है। अतीत से वह जरूर प्रेरणा प्राप्त करती है। परंतु उसे मालूम है कि परंपरा के नाम पर अतीत में विद्यमान अनेकानेक रूढ़ियाँ वर्तमान को ग्रसित कर रही हैं। इसलिए हमारा वर्तमान उसकी तमाम गतिशीलताओं के बावजूद उतना सम्मोहक नहीं है। रूढ़ियों द्वारा बनाई बैसाखी पर कविता अधिक समय तक टिक नहीं सकती है। इस कारण से समकालीन कविता दुर्दांत निरंकुशताओं पर आघात करती दिखाई देती है। वह आशंकित भी है। इसलिए भविष्य की चिंता उसमें हमेशा रहती है। यही नहीं कि कविता भविष्य को ही रचती है। भविष्य की चिंता में वास्तव में अतीत और वर्तमान की चिंता भी है। वह पूरे समय दैर्घ्य का समग्रावलोकन है।

इधर प्रकृति के प्रति हमारी जागरूकता बढ़ी है याने यथार्थ के प्रति हमारी जागरूकता बढ़ी है। विकास के नाम पर होनेवाले कार्यक्रम सतही दृष्टि से देखें तो आकर्षक लग सकते हैं। लेकिन उसके मूल में या तो विस्थापन की विकराल समस्या मिलती है या प्रकृति के ध्वस्त किए जाते ये भीषण दृश्य मिलते हैं। ये दोनों हमारे समकालीन दृश्य हैं जिनसे कविता मुँह मोड़ नहीं सकती। कविता इन यथार्थताओं को उसी रूप में प्रस्तुत नहीं करती है। उसे वह एक मानवीय संसक्ति (ह्यूमन कंसर्न) के रूप में प्रस्तुत करती है। राजेश जोशी की कविता ‘बसंत’ में इसी मानवीय संसक्ति को बसंत के बहाने प्रस्तुत किया गया है। “इतना सहमा और शंकित/किसी ने नहीं देखा होगा कभी/बसंत को/कोई वृक्ष नहीं जहाँ/एक हरी कोंपल की तरह फूट सके वह/कोई वृक्ष नहीं जिसे फूलों से लादकर/विस्मित कर डाले वह सबको!!/और कोई नहीं जो/आँख-भर देखे उसे/और आश्चर्य से भर जाए!“ इस तरह की उत्कंठाएँ समकालीन कविता में सुलभ हैं।

समाज को आधुनिकीकृत होना पड़ता है। अन्यथा विकास नामुमकिन है। लेकिन कोई भी विकास सामान्य जीवन को ध्वस्त करके नहीं होना चाहिए। सामान्य जीवन के ध्वस्त का यहाँ तात्पर्य विस्थापन की समस्या से सामान्य मनुष्य के जूझने से है। यह उसके अधिकारों पर हस्तक्षेप है। निराला ने बहुत पहले ही लिखा था- “अन्याय जिधर है उधर शक्ति” (राम की शक्तिपूजा) यही आजकल भी दिखाई दे रहा है। विकास की अंधी दौड़ में मानवीय अधिकारों का शतशः हनन ही हो रहा है। विकास यथार्थ है। लेकिन किसका विकास? कोरपोरेट शक्तियों का विकास, पूँजीपतियों का विकास, तदर्थ पूँजीवादी संस्कृति का विकास। हमारे समाज में इसके विरुद्ध संघर्ष होते हैं। प्रतिरोध की संस्कृति दुर्बल नहीं है, फिर उतना सबल भी नहीं है। समकालीन कविता में विकास के बहाने में निहित अविकास के प्रति प्रतिरोध पूरी सख्ती के साथ चिह्नित है।

हेब्बारः ‘प्रणम्य कौन है’ शीर्षक अपने निबंध में आपने लिखा है कि ‘हाशिएकरण ऐसी एक सामाजिक निरंकुशता है जो जनतांत्रिक व्यवस्था के बीच आसानी से विकसित होती रहती है।‘ वर्तमान जीवनालोक में भारतीय समाज की निरंकुशता एवं लोकतंत्र पर आपकी टिप्पणी क्या है?

प्रो. अरविंदाक्षन: राजनीति के क्षेत्र में जनतंत्र जनता द्वारा जनता के लिए अन्वेषित और स्थापित प्रखर जीवन दृष्टि है। समाज के विकास में उसकी कई संभावनाएँ हैं। उसने ही मनुष्य की समानता और मनुष्य के महत्व को रेखांकित किया था। इसके पीछे एक वर्गहीन समाज की सशक्त परिकल्पना है। जाति, धर्म, नस्ल आदि से मुक्त मानवीय समाज ही जनतंत्र के लिए अभीष्ट है। इतने पर भी, जनतांत्रिक प्रणाली के कायम होने के बावजूद, कुछ सवाल अनुत्तरित रह जाते हैं। क्या हमारा समाज जाति से मुक्त है? धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त है? नस्लवादी दृष्टि से मुक्त है? बिना किसी संकोच के साथ हमें कहना पड़ रहा है कि ‘नहीं’। तो फिर जनतंत्र की सार्थकता क्या है? अब भी भारतीय समाज कई तरह से बँटा हुआ है। धन की संस्कृति ने हमारे रुझानों को सीमित कर दिया है। अधिकार की राजनीति को जनतंत्र के खाते में डालने से कोई फायदा नहीं है। अधिकार, धन, वणिक वृत्ति आदि आज बहुत ताकतवर हैं। ऐसे में हाशियीकरण होता है। अब भी भारत में अधिकारों से वंचित कई तबके हैं जिनके सामने जीवन का कोई सपना तक नहीं हैं। अधिकार राजनीति ने, धनशक्ति की राजनीति ने, जाति केंद्रित राजनीति ने जनतंत्र के नाम पर जो-जो पद्धतियाँ विकसित की हैं, वे इतनी अनर्थकारी और खतरों से भरी हैं जिनसे भविष्य के प्रति उम्मीद रखना फ़िजूल का कार्य है। उसे राजनीति अनदेखा कर सकती है। मोटे तौर पर बँटा हुआ समाज अनदेखा कर सकता है। लेकिन कविता ऐसा नहीं कर सकती। इसका तात्पर्य यह नहीं कि कविता ऐसी दुस्थिति को खतम करने के लिए लिखी जाती है। नहीं, ऐसी बात नहीं। कविता आत्माभिव्यक्ति है। उसमें आत्म भी है, परत्व भी है। वह समाज की आत्मा की अभिव्यक्ति है। वह एक पहचान है। वह पहचान कविता की संस्कृति का सृजन भी करती है। नागार्जुन की कविता ‘उनको प्रणाम’ सामाजिक पहचान की संस्कृति की कविता है, साथ ही हाशियीकृत समाज के प्रति उनकी प्रणम्य भावना की अभिव्यक्ति है। यह कविता हमारे इतिहास के दुख की अगाधता से संबंधित है- “कुछ कुंठित और कुछ लक्ष्यभ्रष्ट/जिनके आमंत्रित तीर हुए/रण की समाप्ति के पहले ही/जो वीर रिक्त तूणीर हुए!/उनको प्रणाम।” इसमें प्रकटित सत्य और उक्त सत्य में निहित दुख और आकुलता एक कवि ही व्यक्त कर सकता है, एक कविता ही व्यक्त कर सकती है; कोई अधिकार के चस्का लगाए बैठा अधिपति नहीं।

हेब्बारः अपने एक भाषण में आपने एक बार उल्लेख किया था कि ‘मानवाधिकार मानवीय महत्व को रेखांकित करता है।’ मानवाधिकारों के हनन एवं उसकी प्राप्ति के लिए किए जानेवाले संघर्ष की वर्तमानता में आप इस मुद्दे को किस प्रकार संबोधित करते हैं?

प्रो. अरविंदाक्षन: जिस समाज को हम विकसित, जनतांत्रिक और विवेकसंपन्न कहते हैं, उसमें अविकास, जनतंत्र की हत्या और अविवेक की भरमार भी मिलती है। इसलिए मानवाधिकार की ओर हमारी उन्मुखता के पीछे हमारे उच्च न्यायबोध और मनुष्य के महत्व को रेखांकित करने की प्रवृत्ति है। इसी प्रवृत्ति ने हमारे समाज को आगे बढ़ाया है। लेकिन बीच-बीच में हमारे समाज में मनुष्य के प्रति याने किन्हीं तबकों के प्रति, विशेष रूप से निम्न वर्ग के लोगों के प्रति अन्याय होते रहते हैं जो इतने नृशंस होते हैं कि जिसकी कल्पना एक विवेकशील समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता। स्त्रियों के प्रति या बाल-बच्चों के प्रति या किन्हीं समाजों के प्रति नस्ल के नाम पर होनेवाले अत्याचारों को गंभीरतापूर्वक ही देखना होगा और इसी हरकतों का नामोनिशान मिटाना भी होगा। मानवाधिकार का अवबोध हर समाज को सचेत रखता है, सही ढंग से प्रतिक्रियान्वित होने की दिशा प्रदान करता है, हमें संकुचित होने से बचाता है और विश्व नागरिक का बोध भी प्रदान करता है। लेकिन आज यह अवबोध सीमित समाजों तक, कुछ स्वैच्छिक संगठनों तक, कुछ एक्टिविस्टों तक सीमित हो गया है। परंतु प्रीतिप्रद तथ्य यह है कि सीमित ही सही, मानवाधिकार के लिए संघर्ष करनेवाले संगठन सचमुच सक्रिय हैं। इसके विपरीत हमारे ही समाज में ऐसे भी संगठन कर्मरत हैं जो मानवाधिकार के नाम पर गलत दिशा में भी कार्यरत हैं। विदेशी पूँजी निवेश ही इनका एकमात्र लक्ष्य है। इसलिए इन दोनों के बीच विभाजक रेखा खींचना अत्यंत आवश्यक है।

भारत में मानवाधिकार की परिरक्षा के लिए एक आयोग की स्थापना हुई है। इस आयोग के माध्यम से मानवाधिकार हनन के विरुद्ध कार्रवाइयाँ होती हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन प्रति वर्ष आयोग द्वारा उठाए गए कदमों का पुनर्विश्लेषण भी आवश्यक है। एक सरकारी संस्था होने के नाते यह देखना आवश्यक है कि कहीं, कभी दिशाहीन होने का कार्य आयोग की तरफ से हुआ है। उसकी अच्छाइयों की प्रशंसा होनी चाहिए तथा गलतियों की तरफ इशारा भी करना चाहिए। मानवाधिकार से जुड़े स्वैच्छिक संगठनों का भी इसी तरफ पुनर्विश्लेषण जरूरी है। उनके पूँजी निवेश की भी सही और सख्त तहकीकात भी जरूरी है। जो भी हो मानवाधिकार का अवबोध भारतीय समाज में सक्रिय और जीवंत है।

समकालीन कविता ने अपनी मानवीय संसक्ति की अभिव्यक्ति के बीच मानवाधिकार के संकेत भी दिए हैं। केदारनाथ सिंह की यह कविता इसका उदाहरण है- “अंत में लिखूँगा कि पृथ्वी के एक छोटे-से/नागरिक के नाते मेरा सुझाव कि हो सके तो हर धड़कन के साथ/एक अदृश्य तार जोड़ दिया जाए/कि एक को प्यास लगे/तो हर कंठ में जरा-सी बेचैनी हो/अगर एक चोट पड़े/तो हर आँख हो जाए थोड़ी-थोड़ी नम/और किसी अन्याय के विरुद्ध/अगर किसी को क्रोध आए/तो सारे शरीर/झनझनाते रहे कुछ देर तक।“ यह रचना मानवाधिकार की कवितात्मक अभिव्यक्ति है।

हेब्बारः मानवीय सर्जना की संभावनाओं का कुसुमन जीवन की बहुविध संकीर्णताओं से मुक्ति से संभव है। संकीर्णता से मुक्ति अधिकारहीनता से मुक्ति है। वर्तमान सांस्कृतिक परिवेश के आलोक में इस संभावना को आप किस प्रकार देखते हैं?

प्रो. अरविंदाक्षन: जो समाज सर्जनात्मकता के लिए स्पेस नहीं दे पाता, वह संकीर्ण ही होता है। यहाँ सर्जनात्मकता का सामान्य अर्थ से भिन्न अर्थ लेना होगा। वह भिन्नता यह है कि समाज को जड़ता से मुक्त होना होगा। समाज में व्याप्त जड़ता के कई पक्ष हैं। धर्म में आस्था का पक्ष होता है, यानी मानवीयता प्रबल है, लेकिन उसी धर्म में रूढ़ियों की जड़ता भी देखने को मिलती है जबकि कहना होगा कि रूढ़ियाँ ही उसमें अधिक हैं। ये रूढ़ियाँ कई प्रकार की अलिखित स्थितियों से गठबंधन स्थापित कर लेती हैं और धर्म तब अपनी मानवीयता और सह अस्तित्व की भावना खो देता है। धर्म का प्रभाव समाज पर है। ऐसे में धर्म के प्रभाव से ओतप्रोत समाज सृजनात्मक नहीं हो सकता। सृजनात्मक समाज सदैव निरंकुशताओं को तज देता है। उसी प्रकार अधिकारग्रस्त राजनीति जनतंत्र में स्पृहणीय नहीं समझी जाती। वह राजनीति मानवीय हितों की रक्षा नहीं कर सकती। ऐसी राजनीति सृजनात्मक नहीं होती। मानवीय मूल्यों पर जनतंत्र ने हमेशा बल दिया था। पर वह जनतंत्र जनता के विरुद्ध होता है तो उसका तात्पर्य है कि यह अधिकार के अधीन दब गया। ऐसी एक जनतांत्रिक व्यवस्था से न्याय की अपेक्षा रखना मूर्खता होगी। जो समाज शतशः स्वतंत्र है, वह अधिकार की गद्दी की तरफ आकृष्ट नहीं होता। उस तरह के समाज के लिए अधिकतर प्रलोभनकारी नहीं है। इसे ही हम समाज की सृजनात्मकता कहते हैं। उसी तरह विज्ञान व प्रौद्योगिकी तब तक सृजनात्मक नहीं है जब तक अधिकार के अधीन में कार्यरत रहते हैं। हमें तमाम प्रकार की संकीर्णताओं से मुक्त होना होगा, याने कि हमें बुनियादी तौर पर स्वतंत्र होना होगा, निरंकुश संस्कृति से अलग होना होगा, सच्ची वैज्ञानिक दृष्टि के प्रति पक्षधरता व्यक्त करनी होगी। जिस समाज में अधिकार प्रलोभनकारी और आकर्षक होता है वह एक मुक्त समाज नहीं हो सकता। स्वतंत्रता का मूल्य वह रेखांकित नहीं कर सकता।

वर्तमान परिदृश्य में स्थितियाँ निरंतर बदतर होती जा रही हैं। मूल्याधिष्ठित राजनीति  कल्पना मात्र रह गई है। अधिकार सबके केंद्र में पूरी भीषणता के साथ विद्यमान है। समाज की सर्जनात्मकता का निरंतर ह्रास होता जा रहा है। कई अनपेक्षित अवस्थाओं के हम मुखापेक्षी होते जा रहे हैं। मानवाधिकार का हनन लगभग सभी क्षेत्रों में द्रष्टव्य है। यह मात्र एक नकारात्मक दृष्टि नहीं है। सकारात्मकता मानो दुर्लभ चीज़ बन गई है। समभावना, मानवीय महत्व, सद्भावना, मूल्यापेक्षी दृष्टि आदि हमारे समाज में विद्यमान है, लेकिन उसकी मात्रा कितनी है? इसका जायजा लिया जाना चाहिए।

समकालीन कविता में इस कारण से प्रतिरोधी भावना अधिक मुखर होती जा रही है। सकारात्मक भावों से ओतप्रोत कविताएँ ही प्रतिरोध व्यक्त कर सकती हैं। कविता नकारात्मक कभी नहीं होती है। जब समाज अपनी सर्जनात्मकता छोड़ देता है तो उसमें अवांछित स्थितियाँ सिर उठाने लगती हैं तब कविता के सामने एकमात्र रास्ता बचता है, वह है प्रतिरोध का रास्ता जो सर्जनात्मक होता है।

हेब्बारः स्वतंत्रता मानवाधिकारों का सार तत्व है। जीवन, स्वतंत्रता और सत्ता के संबंधों पर किस नज़रिए से साहित्य का अध्येता विचार कर सकता है?

प्रो. अरविंदाक्षन: जो समाज सही मायने में स्वतंत्र है, वह मानवाधिकार की बात नहीं करता है। स्वतंत्रता एक स्वस्थ संकल्पना भी है और एक प्रकार्यात्मक प्रणाली भी है। हमारे समाज में स्वतंत्रता की संकल्पना पर, उसके महत्व पर आसमान की बुलंदियों को छूनेवाले भाषण होते रहते हैं, लेकिन उसकी प्रकार्यात्मकता संदिग्ध है। एक व्यक्ति की स्वतंत्रता माने वह दूसरे की भी स्वतंत्रता है। एक समाज की स्वतंत्रता दूसरे समाज की भी स्वतंत्रता है। एक राज्य की स्वतंत्रता दूसरे राज्य की स्वतंत्रता है। एक देश की स्वतंत्रता दूसरे देश की स्वतंत्रता है। कानूनन हम ने इस बात को मान लिया है। लेकिन प्रकार्यात्मकता के संदर्भ में कोई भी इकाई इसका सही-सही पालन नहीं कर रही है। इसलिए परोक्षतः हम अस्वतंत्रता के माहौल में जीने के लिए मज़बूर है।

सत्ता का स्वभाव ही शुरू से अधिकार केंद्रित रहा है। इसलिए स्वतंत्रता की परिभाषा सत्ता के लिए अलग निर्धारित हुई है। आधुनिक युग में सत्ता के इस स्वभाव को बदलना था, पर बदला नहीं है। वैचारिक भिन्नताओं के प्रति भी सत्ता सहिष्णुता नहीं दिखाती है। यह असहिष्णुता उसे अधिकाधिक सत्ताकेंद्री बनाती है। इसलिए जनतंत्र में हमेशा तनातनी बनी रहती है। आज विभिन्न दलों, तबकों, वर्गों, समाजों, राज्यों और देशों के बीच जितने अनपेक्षित हादसे होते हैं, जिनमें हज़ारों की तादाद में निरीह लोगों की मृत्यु जो होती है, उन सब के पीछे यही तनातनी ही काम कर रही है। ऐसे में हम यह सोचने के लिए मज़बूर है कि स्वतंत्रता का वास्तविक तात्पर्य क्या है? हमारे समय में सत्ता के प्रभुत्ववादी स्वभाव प्रकट दीखने लगा है, चाहे वह अंतर्देशीय संबंध हो, हमारे अपने देश के विभिन्न राज्यों का संबंध हो, हमारी राजनीतिक पार्टियों का आपसी रिश्ता हो, समाज के विभिन्न वर्गों एवं दलों का संबंध हो प्रभुत्ववादिता ही ज्यादातर मुखर है। इसलिए स्वतंत्रता की प्राकार्यात्मकता संदिग्ध दिखाई देती है।

साहित्य, विशेष रूप से कविता स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति की पक्षधरता ही व्यक्त करती रहती है। अतः कविता हमेशा विपक्ष में ही रहती है, रहना पड़ता है। धूमिल ने कविता को विपक्ष की अभिव्यक्ति के रूप में ही प्रस्तुत किया है। समकालीन कविता इस भाव की ज़ोरदार अभिव्यक्ति है। धूमिल ने लिखा- “न कोई प्रजा है/न कोई तंत्र/यह आदमी के खिलाफ/आदमी का खुलासा षड्यंत्र है।” अस्वतंत्रता और असहिष्णुता भरे हमारी तथाकथित संस्कृति के प्रतिरोध में साक्षात्कृत असंख्य बिंब और प्रतीक समकालीन कविता में भरे पड़े हैं। राजेश जोशी की ‘मैं झुकता हूँ’ शीर्षक कविता इस बात को बेहतरीन ढंग से व्यक्त करती है- “दरवाज़े से बाहर जाने से पहले/अपने जूतों के तस्मे बाँधने के लिए मैं झुकता हूँ/रोटी का कौर तोड़ने और खाने के लिए/झुकता हूँ अपनी थाली पर/जेब से अचानक गिर गई कलम या सिक्के को उठाने को झुकता हूँ/झुकता हूँ लेकिन उस तरह नहीं/जैसे एक चापलूस की आत्मा झुकती है/किसी शक्तिशाली के सामने/जैसे लज्जित या अपमानित होकर झुकती हैं आँखें/झुकता हूँ/जैसे शब्दों को पढ़ने के लिए आँखें झुकती हैं/ताकत और अधीनता की भाषा के बाहर भी होते हैं/शब्दों और क्रियाओं के कई अर्थ।” इन्हीं शब्दों की खोज़ का इतिहास ही समकालीन कविता रचती है।

(20 जनवरी, 2017)

डॉ. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत

सहायक आचार्य

सरकारी ब्रण्णन कालेज, तलश्शेरी

कण्णूर, केरल- 670 106

ई-मेल- hebbarillath72@gmail.com

Mobile- 9446661250

[जनकृति पत्रिका के फरवरी-मार्च सयुंक्त अंक में प्रकाशित]

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