मेरे अल्फ़ाज़ खंज़र हो गए हैं
किसी दुश्मन बराबर हो गए हैं

नहीं महफ़ूज़ अब घर में ही बेटी
बहुत ही खौफ़ मंज़र हो गए हैं

किसी दरवेश का दिल था दुखाया
तभी खारे समंदर हो गए हैं

उगाए थे जो गुल हाथों में मैंने
मुक़द्दर से वो पत्थर हो गए हैं

मुहब्बत की फ़सल फलती नहीं अब
दिलों के खेत बंज़र हो गए हैं

लगे कूलर घरों की खिड़कियों में
परिंदे घर से बेघर हो गए हैं

गए थे सूख जो तालाब ‘माही’
इनायत से समंदर हो गए हैं

माही

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